श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2512, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 20/92–101 बीसवाँ अध्याय 495 'आमि लिखि',—इह मिथ्या करि अनुमान। आमार शरीर—काष्ठपुतली-समान ॥ 92 ॥ अनुवाद—'मैंने चैतन्यलीलाको लिखा है'—मेरा ऐसा मानना मिथ्या विचार है। मेरा शरीर तो कठपुतलीके समान है ॥ 92 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं कठपुतलीके समान कार्य करनेमें असमर्थ हूँ; मैंने यह ग्रन्थ लिखा है—ऐसा विचार करना व्यर्थ है। तात्पर्य यह है, भगवान् और भक्तगण ही मुझसे यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं ॥ 92 ॥ स्वयंको यन्त्र-मानकर अपनी अयोग्यताका वर्णन :— वृद्ध-जरातुर आमि अन्ध, बधिर। हस्त हाले, मनोबुद्धि नहे मोर स्थिर ॥ 93 ॥ अनुवाद—मैं वृद्ध और जर्जरित हूँ, मैं प्राय अन्धा और बहरा हूँ। मेरे हाथ काँपते हैं और मेरा मन और बुद्धि भी स्थिर नहीं है ॥ 93 ॥ नाना-रोगग्रस्त,—चलिते बसिते ना पारि। पञ्चरोग-पीड़ा-व्याकुल, रात्रि-दिने मरि ॥ 94 ॥ अनुवाद—मैं अनेक प्रकारके रोगोंसे ग्रस्त हूँ—मैं न तो चल पाता हूँ और न ही बैठ पाता हूँ। मैं पाँचों इन्द्रियोंके रोगोंकी पीड़ासे दुःखित रहता हूँ, रात्रि अथवा दिनमें मैं कभी भी शरीर त्याग कर सकता हूँ ॥ 94 ॥ पूर्वे ग्रन्थे इहा करियाछि निवेदन। तथापि लिखिये, शुन इहार कारण ॥ 95 ॥ अनुवाद—यद्यपि इस बातको मैंने पहले भी इसी ग्रन्थमें लिखा है, तथापि मैं कैसे लिखता जा रहा हूँ, इसका कारण सुनिये ॥ 95 ॥ अपने उपास्य-विग्रहोंका वर्णन :— श्रीगोविन्द, श्रीचैतन्य, श्रीनित्यानन्द। श्रीअद्वैत, श्रीभक्त, आर श्रीश्रोतृवृन्द ॥ 96 ॥ श्रीस्वरूप, श्रीरूप, श्रीसनातन। श्रीरघुनाथ-दास श्रीगुरु, श्रीजीवचरण ॥ 97 ॥ मदनमोहन-कृपा लाभरूपी अपने सौभाग्यका वर्णन :— इँहा-सबार चरण-कृपाय लेखाय आमारे। आर एक हय—तँहो अतिकृपा करे ॥ 98 ॥ अनुवाद—श्रीगोविन्ददेव, श्रीचैतन्यदेव, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीभक्तगण और समस्त श्रीश्रोतागण, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीगुरुदेव—श्रीरघुनाथदास गोस्वामी और श्रीजीव गोस्वामी—इन सबके चरणकमलोंकी कृपा ही मुझसे लिखवाती है। इनके अतिरिक्त एक और भी हैं, जो मुझपर बहुत अधिक कृपा करते हैं ॥ 96–98 ॥ अनुभाष्य—'श्रीरघुनाथदास श्रीगुरु'—ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामी प्रभुके भजन-शिक्षा गुरु ही श्रीरूपानुगश्रेष्ठ श्रीरघुनाथदास गोस्वामी प्रभु हैं। परवर्ती 145 संख्या और आदिलीलाके पहले अध्यायके प्रारम्भमें अनुभाष्यमें श्रीरूपानुग-आम्नाय अथवा गुरु-परम्परा देखें ॥ 97 ॥ श्रीमदनगोपाल मोरे लेखाय आज्ञा करि'। कहिते ना युयाय, तबु रहिते ना पारि ॥ 99 ॥ अनुवाद—श्रीमदनगोपाल मुझे आदेश प्रदान करके मुझसे लिखवा रहे हैं। यद्यपि यह सब कहना उचित नहीं है, तथापि मैं कहे बिना रह नहीं पा रहा हूँ ॥ 99 ॥ ना कहिले हय मोर कृतघ्नता-दोष। दम्भ करि' बलि, श्रोता, ना करिह रोष ॥ 100 ॥ श्रोताओंकी वन्दना :— तोमा-सबार चरण-धूलि करिनु वन्दन। ताते चैतन्य-लीला हैल ये किछु लिखन ॥ 101 ॥ अनुवाद—मैं अभिमान करके यह कह रहा हूँ, हे श्रोताओं! ऐसा मानकर आप मेरे प्रति रोष मत करना, क्योंकि ऐसा नहीं कहनेपर मुझपर कृतघ्नताका दोष लगेगा। मैंने आप सबके चरणोंकी धूलिकी वन्दना की