श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें496 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/100-112 ] है, मैं जो कुछ भी चैतन्य-लीलाको लिख पाया हूँ, यह उसीका फल है॥ 100-101 ॥ भागवतमें वर्णित व्यासकी रीतिके अनुसरणसे संक्षेपमें अन्त्यलीलाके अध्यायोंका वर्णन करते हुए पुनरावृत्ति :- एबे अन्त्यलीलागणेर करि अनुवाद। 'अनुवाद' कैले पाइ लीलार 'आस्वाद' ॥ 102 ॥ अनुवाद-अब मैं अन्त्यलीलाके अध्यायोंका संक्षेपमें पुनः वर्णन करता हूँ, संक्षेपमें वर्णन करनेसे लीलाओंका पुनः आस्वादन हो जायेगा ॥ 102 ॥ प्रथम परिच्छेदे-रूपेर द्वितीय-मिलन। तार मध्ये दुइ नाटकेर विधान-श्रवण ॥ 103 ॥ तार मध्ये शिवानन्द-सङ्गे कुक्कुर आइला। प्रभु तारे कृष्ण कहाञा मुक्त करिला ॥ 104 ॥ अनुवाद-पहले अध्यायमें श्रीरूप गोस्वामीका महाप्रभुके साथ द्वितीय-मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीरूप गोस्वामीके द्वारा रचित दो नाटकोंका (विदग्ध-माधव और ललित-माधवका) श्रवण, एक कुत्तेका श्रीशिवानन्द सेनके साथ नीलाचल आना और महाप्रभुके द्वारा उसके मुखसे कृष्ण कहलवाकर उसे मुक्त कर देना-ये प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 103-104 ॥ द्वितीये-छोट हरिदासे कराइला शिक्षण। तार मध्ये शिवानन्देर आश्चर्य दर्शन ॥ 105 ॥ अनुवाद-दूसरे अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा छोटे हरिदासको शिक्षा प्रदान करना और श्रीशिवानन्द सेनके आश्चर्यचकित हो जानेका वर्णन है ॥ 105 ॥ तृतीये-हरिदासेर महिमा प्रचण्ड। दामोदर-पण्डित कैला प्रभुरे वाक्यदण्ड ॥ 106 ॥ प्रभु 'नाम' दिया कैला ब्रह्माण्ड-मोचन। हरिदास करिला नामेर महिमा-स्थापन ॥ 107 ॥ अनुवाद-तीसरे अध्यायमें श्रीहरिदास ठाकुरकी प्रभावशाली महिमा, श्रीदामोदर पण्डितके द्वारा महाप्रभुको दिया गया वाक्यदण्ड, महाप्रभुके द्वारा 'नाम' प्रदान करके ब्रह्माण्डका उद्धार और श्रीहरिदास ठाकुरके द्वारा नामकी महिमाको स्थापित करना-ये प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 106-107 ॥ चतुर्थे-श्रीसनातनेर द्वितीय-मिलन। देहत्याग हैते ताँर करिला रक्षण ॥ 108 ॥ ज्येष्ठ-मासे प्रभु ताँरे कैला परीक्षण। शक्ति सञ्चारिया पुनः पाठाइला वृन्दावन ॥ 109 ॥ अनुवाद-चौथे अध्यायमें श्रीसनातन गोस्वामीके महाप्रभुके साथ द्वितीय-मिलन, महाप्रभुके द्वारा श्रीसनातनकी देह त्याग करनेसे रक्षा करना और ज्येष्ठ मासमें उनकी परीक्षा एवं उनमें शक्ति सञ्चारित करके उन्हें पुनः वृन्दावन भेजना-इन सबका वर्णन हुआ है॥ 108-109 ॥ अनुभाष्य-पाठान्तरमें, - "ज्येष्ठमासे धूपे ताँरे।" अर्थात् 'ज्येष्ठ मासमें धूपमें उनकी ॥' 109 ॥ पञ्चमे-प्रद्युम्नमिश्रे प्रभु कृपा करिला। राय-द्वारा कृष्णकथा ताँरे शुनाइला ॥ 110 ॥ तार मध्ये 'बाङ्गाल'-कविर नाटक-उपेक्षण। स्वरूप-गोसाञि कैला विग्रहेर महिमा-स्थापन ॥ 111 ॥ अनुवाद-पाँचवें अध्यायमें महाप्रभुके द्वारा श्रीप्रद्युम्न मिश्रपर कृपा करके उन्हें श्रीरामानन्द रायसे कृष्णकथाका श्रवण करवाना, श्रीस्वरूप दामोदरके द्वारा बङ्गालके कविके द्वारा रचित नाटककी उपेक्षा और विग्रहकी महिमाको स्थापित करनेके प्रसङ्ग वर्णित हुए हैं॥ 110-111 ॥ षष्ठे-रघुनाथ-दास प्रभुरे मिलिला। नित्यानन्द-आज्ञाय चिड़ा-महोत्सव कैला ॥ 112 ॥