भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2494, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2494

[ 20/12-19 बीसवाँ अध्याय 477

सर्वतोभावेन आत्मनो वा स्नपनं यस्मात् तत्) परं (केवलमद्वितीयं) श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनं विजयते (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तते)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 12॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- सङ्कीर्त्तन हैते पाप-संसार नाशन। चित्तशुद्धि, सर्वभक्तिसाधन-उद्गम॥ 13॥ कृष्णप्रेमोद्गम, प्रेमामृत-आस्वादन। कृष्णप्राप्ति, सेवामृत-समुद्रे मज्जन॥"14॥ अनुवाद-श्रीकृष्णसङ्कीर्त्तनसे जन्म-जन्मान्तरके पाप और उससे प्राप्त पुनः-पुनः जन्म-मृत्युरूप संसारका नाश, अनर्थ-निवृत्तिसे चित्त-शुद्धि, भक्तिके सभी साधनोंका उदय, कृष्णप्रेमका उदय और प्रेमामृतका रसास्वादन, श्रीकृष्ण-प्राप्ति और अन्तमें सेवामृतरूपी समुद्रमें निमज्जित हो जाना होता है॥ 13-14॥ अशोक, अभय, अमृतका आधार श्रीनाम :- उठिल विषाद, दैन्य, पड़े आपन-श्लोक। याहार अर्थ शुनि' सब याय दुःख-शोक॥ 15॥ अनुवाद-यह कहते हुए महाप्रभुमें विषाद और दैन्य उत्पन्न हो आया और वे स्वरचित एक श्लोक पढ़ने लगे, जिसके अर्थको सुनकर समस्त दुःख और शोक दूर हो जाते हैं॥ 15॥ नामसाधनके सुलभ होनेका कारण अथवा श्रीकृष्णकी महावदान्यता; दुर्देवरूपी अपराधमयी अवस्थामें जीवके द्वारा शुद्धनामके उच्चारणका अभाव :- (पद्यावलीके 19वें अंकमें उद्धृत शिक्षाष्टकका दूसरा श्लोक) “नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्ति- स्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः। एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्देवमीदृशमिहाजनि नानुरागः ॥ 16॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 16॥

अमृतप्रवाह भाष्य-हे भगवन्, आपका नाम ही जीवोंके समस्त मङ्गलका विधान करता है, इसलिये अपने 'कृष्ण', 'गोविन्द' आदि अनेक नामोंका आपने विस्तार किया है। उन नामोंमें आपने अपनी समस्त शक्ति अर्पित की है और आपने उन नामोंके स्मरणमें कालादिका भी नियम (विधि अथवा विचार) नहीं रखा। हे प्रभो, जीवोंके प्रति ऐसी कृपा करके आपने अपने नामको सुलभ बनाया है, तथापि मेरे नामापराधरुपी दुर्भाग्यने ऐसा किया है कि वह आपके सुलभ नाममें भी मेरा अनुराग उत्पन्न नहीं होने देता॥ 16॥ अनुभाष्य- हे भगवन्, (प्रभो कृष्ण,) [भवता अहैतुक्या कृपया] नाम्नां बहुधा (बहुप्रकारः) अकारि (प्रकटितवान्) तत्र (नाम्नि) निजसर्वशक्तिः (आत्मनः अनन्ता शक्तिः) अर्पिता (निहिता), [अतः तस्य] स्मरणे कालः अपि न नियमितः (न विहितः, अपेक्षितः; सर्वकालेऽपि न कोऽपि विधिः)-तव एतादृशी कृपा; [किन्तु तथापि] मम अपि ईदृशं दुर्देवं यत् इह (नाम्नि) अनुरागः न अजनि (न जातः)। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥ 16॥ श्लोकके अर्थकी व्याख्या :- अनेक लोकेर वाञ्छा अनेक प्रकार। कृपाते करिल अनेक-नामेर प्रचार॥ 17॥ खाइते शुइते यथा तथा नाम लय। काल, देश, नियम नाहि, सर्वसिद्धि हय॥ 18॥ सर्वशक्ति नामे दिला करिया विभाग। आमार दुर्देव, —नामे नाहि अनुराग॥ 19॥ अनुवाद-इस जगत्में लोगोंके हृदयमें नाना प्रकारकी कामनाएँ रहती हैं, इसलिये हे भगवन्! आपने कृपा करके अपने अनेक नामोंको प्रकटित किया है। उन नामोंके उच्चारण करनेमें देश, काल और पात्रादिका कोई विशेष नियम भी नहीं रखा है। खाते-पीते-सोते समयमें जिस किसी प्रकारसे भी श्रीकृष्णनाम करनेसे

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