भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2492, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2492

बीसवाँ अध्याय कथासार—महाप्रभुने दैन्य-उद्वेगादि उत्कण्ठाके साथ शिक्षाष्टकके आस्वादनमें श्रीस्वरूप-रामानन्दके साथ रात्रियाँ व्यतीत कीं। समय-समयपर महाप्रभु (जयदेवके द्वारा रचित) श्रीगीतगोविन्द, श्रीमद्भागवत, (श्रीराय- रामानन्दके द्वारा रचित) श्रीजगन्नाथवल्लभ नाटक, (श्रीबिल्वमङ्गलके द्वारा रचित) श्रीकृष्णकर्णामृतसे श्लोक पाठ करके भावमें आविष्ट हो जाते थे,—आदि इस अध्यायमें वर्णित है। इस प्रकार बारह वर्ष रसास्वादन करते हुए अड़तालीस वर्षकी आयुमें महाप्रभुने लीला समाप्त की, इस बातका ग्रन्थकारने आभास दिया है। इसके बाद उन्होंने अन्त्यलीलाके विवरणका संक्षिप्त अनुवाद देकर इस ग्रन्थको समाप्त किया है। —(अमृतप्रवाह भाष्य) जातप्रेम भक्तोंकी ही महाप्रभुके विप्रलम्भभावके अनुसरणमें योग्यता :— प्रेमोद्भावितहर्षेर्ष्यादैन्यार्त्तिमिश्रितम्। लपितं गौरचन्द्रस्य भाग्यवद्भिनिषेव्यते॥१॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य देखें॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भाग्यवान् व्यक्ति ही श्रीगौरचन्द्रके प्रेममें उत्पन्न हर्ष, ईर्ष्या, उद्वेग, दैन्य और आर्त्तिसे मिश्रित विलापका आस्वादन करते हैं॥१॥ अनुभाष्य— भाग्यवद्भिः (प्रेमसम्युल्लब्धैः महात्मभिः एव) गौरचन्द्रस्य प्रेमोद्भावितहर्षेर्ष्याद्वेगदैन्यार्त्तिमिश्रितं (प्रेम्णः उद्भाविता जाताः चित्तोल्लासासहिष्णुतास्थिरता-निजक्षुद्रमननकातरतादिभावाः ताभिः मिश्रितं) लपितं (प्रलापं) निषेव्यते (आस्वाद्यते)। श्लोक-भावानुवाद—प्रेमसम्पत्ति प्राप्त महात्मागण ही श्रीगौरचन्द्रके प्रेमसे उत्पन्न चित्तमें उल्लास, असहिष्णुता, अस्थिरता, स्वयंको क्षुद्र मानकर कातरतादि भावोंसे मिश्रित प्रलापका आस्वादन करते हैं॥१॥ जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद—श्रीगौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो और श्रीगौर भक्तोंकी जय हो॥२॥ पुरीमें निरन्तर विप्रलम्भभावमें व्याकुल महाप्रभु :— एइमत महाप्रभु वैसे नीलाचले। रजनी-दिवसे कृष्ण-विरहे विह्वले॥३॥ महाप्रभुके परमप्रिय अन्तरङ्ग दो नित्य-सङ्गी :— स्वरूप, रामानन्द-एइ दुइजन-सने। रात्रि-दिने रस-गीत-श्लोक आस्वादने॥४॥ आठ सात्त्विक और तैंतीस व्यभिचारी भावोंका उदय :— नाना-भाव उठे प्रभुर-हर्ष, शोक, रोष। दैन्योद्वेगादि, उत्कण्ठा, सन्तोष॥५॥ स्वयं अथवा दो भक्तोंके साथ उन-उन भावोंके उद्दीपक श्लोकोंका पाठ अथवा श्रवण :— सेइ सेइ भावे निज-श्लोक पड़िया। श्लोकेर अर्थ आस्वाद्ये दुइ बन्धु लञा॥६॥ कोन दिने, कोन भावे श्लोक-पठन। सेइ श्लोक आस्वादिते रात्रि-जागरण॥७॥ अनुवाद—इस प्रकार महाप्रभु नीलाचलमें रात-दिन कृष्णविरहमें विह्वल रहते थे। वे रात-दिन श्रीस्वरूप दामोदर और श्रीरामानन्द रायके साथ (मधुर) रस-सम्बन्धीय गीतों एवं श्लोकोंका आस्वादन करते थे। महाप्रभुमें