श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें474 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/110-112 ] महासुखकी प्राप्ति होती है और आध्यात्मिकादि (त्रितापादि) चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास॥112॥ दुःखोंका सम्पूर्ण नाश हो जाता है॥110॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते अन्त्यखण्डे नित्य नवनवायमान हृत्कर्णरसायन श्रीचैतन्यलीलामृत :- विरह-प्रलाप-मुख-सङ्घर्षणादिवर्णनं नाम ऊनविंशः परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृत-नित्य नूतन। अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी शुनिते शुनिते जुड़ाय हृदय-श्रवण॥111॥ कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका अनुवाद-श्रीचैतन्यचरितामृत नित्य नवीन है। इसे वर्णन कर रहा है॥112॥ सुनते-सुनते हृदय और कर्ण शीतल हो जाते हैं॥111॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। श्रीचैतन्यचरितामृतके अन्त्यखण्डमें विरह-प्रलाप-मुख-सङ्घर्षणादि वर्णन नामक उन्नीसवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।