भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 2489

472 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/108 ] “हे श्रीमन् जलधर, तुम निश्चय ही लोगोंके तापजनित दुःखको हरण करनेके लिये श्रीकृष्णके सखा हुए हो और उसी कारण उनके प्रेममें आसक्तचित्त होकर हमारे समान श्रीवत्सलाञ्छन श्रीकृष्णको स्मरण करके और निरन्तर स्मरणके कारण हमारे समान मलिनचित्तसे अति उत्कण्ठित भावसे पुनः पुनः धारारूपमें नयनजलराशि विसर्जन कर रहे हो। हाय! तुमने किसलिये उनके साथ सख्य-सम्बन्ध स्थापित किया था? क्योंकि उनका घनिष्ठ सङ्ग अतिशय दुःख प्रदान करता है॥” 6॥ शुन, मेघ, कृष्णमित्र, चिन्तिछ श्रीवत्स-चित्र, प्रेमबद्ध महिषीर न्याय। कृष्णसङ्ग ध्यान करि’, उत्कण्ठाय दुःखे मरि’, सिञ्चितेछ वाष्पधारा-प्राय॥6॥ [हे कृष्णमित्र मेघ! सुनो, क्या तुम भी प्रेममें बद्ध महिषियोंकी भाँति श्रीवत्सादि चिह्नोंसे सुशोभित कृष्णका चिन्तन कर रहे हो? क्या तुम कृष्णके सङ्गका ध्यान करके, उत्कण्ठासे दुःखमें मृतप्राय होनेके कारण ही जलधाराका (अश्रुओंका) विसर्जन कर रहे हो?] “प्रियारावपदानि भाषसे मृतसञ्जीवनिकयानया गिरा। करवाणि किमद्य ते प्रियं वद मे वल्गितकण्ठ कोकिल॥”7॥ “हे रमणीयकण्ठ-कोयल, तुम इस मृतसञ्जीवनी वाक्यसे प्रियम्वद श्रीकृष्णके शब्दके समान मधुर शब्दोंका उच्चारण कर रही हो, इसलिये अब हम तुम्हारा कौनसे प्रिय कार्य साधन करें, यह आदेश करो॥”7॥ सुकण्ठ कोकिल, शुन, अनुकारे सुनिपुण, मृतसञ्जीवनी तव कथा। तव-प्रिय आचरण, महिषीर सुकरण, सेइरूप साधि, बल तथा॥7॥ [हे सुकण्ठी कोयल! तुम (कृष्णकी वाणीका) अनुकरण करनेमें सुनिपुण हो। तुम्हारी वाणी कृष्णके शब्दोंकी भाँति मधुर होनेके कारण मृतसञ्जीवनी स्वरूप है। तुम हमें बतलाओ, हम महिषियाँ तुम्हारा क्या प्रिय कार्य करें, हम वही करेंगी।] “न चलसि न वदस्युरदारबुद्धे क्षितिधर चिन्तयसे महान्तमर्थम्। अपि बत वसुदेवनन्दनाङ्घ्रिं वयमिव कामयसे स्तनैर्विधर्तुम्॥”8॥ “हे महामते पर्वत, जिस कारणसे तुम मौन और निस्पन्दनरूपसे अवस्थान करते हो, उसे विचार करके हमें लगता है कि तुम किसी विशेष प्रयोजनीय विषयमें चिन्ता कर रहे हो। ऐसा होनेपर क्या तुम भी हमारे समान उन्नत स्तन-सदृश शिखरोंके द्वारा श्रीकृष्णके चरणकमलोंको धारण करनेके इच्छुक ऐसा है, तो परिणाममें तुम्हारी भी हमारे समान अवस्था होगी॥”8॥ उदारधी क्षितिधर, अचञ्चल मौनवर, महदर्थ-चिन्ताय मगन। तुमि आमादेर मत, हृदये राखिते व्रत, वसुदेव-तनय-चरण॥8॥ [हे महामति पर्वत! तुम स्थिर और मौन हो, ऐसा प्रतीत होता है कि किसी महद्-अर्थकी चिन्तामें निमग्न हो और तुमने भी हमारी भाँति श्रीवसुदेवनन्दनके चरणकमलोंको हृदयमें धारण करनेका व्रत लिया है।] “शुष्यद्ध्रदाः कर्शिता बत सिन्धुपत्न्यः सम्प्रत्यपास्तकमलश्रिय इष्टभर्त्तुः। यदद्द्रयं मधुपतेः प्रणयावलोक- मप्राप्य मुष्टहृदयाः पुरुकर्शिताः स्म॥”9॥ “हे सिन्धुपत्नी नदियों, अभी इस ग्रीष्मकालमें प्रियतम समुद्र मेघके द्वारा अमृत वर्षणसे तुम्हें आनन्द प्रदान नहीं कर रहा है। अहो! इसलिये ही हम जिस प्रकार प्रियतम पति श्रीकृष्णकी प्रणयदृष्टिके अभावसे अति क्षीणत्वको प्राप्त हुई हैं, उसी प्रकार तुम्हारा भी चित्त अपहृत होकर ह्रदसमूह शुष्क, कमल-शोभा