श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2488, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 19/108 उन्नीसवाँ अध्याय 471 ] माला, जिससे महिषियाँ सन्तुष्ट होती है, क्या तुम उस मालाको अपने सिरपर धारण करनेके लिये ही रोदन कर रही हो। हे चक्रवाकि! तुम स्पष्ट रूपसे सब बतलाओ जिससे कि हम महिषियाँ तुम्हारे उद्देश्यको समझ सकें।] “भो भोः सदा निष्टनसे उदन्व- न्नलब्धनिद्रोऽधिगतप्रजागरः। किंवा मुकुन्दापहतात्मलाञ्छनः प्राप्तां दशां त्वञ्च गतो दुरत्ययाम्॥” ३॥ “हे जलनिधे, क्या तुम्हें स्वभावतः ही निद्रा नहीं आती जो सदा जागकर गर्जन करते रहते हो? अथवा सम्भोगकालमें श्रीकृष्णने जिस प्रकार हमारे कुङ्कुमादि चिह्नोंको हरण किया है, उसी प्रकार तुम्हारी लक्ष्मी, कौस्तुभ आदि चिह्नोंको हरण करनेपर क्या तुम्हारी इस प्रकार दशा हुई है?”॥ ३॥ जलनिधे, रात्रिकाले, ना लिखेछे तब भाले, निरन्तर निद्रा-सुखसङ्ग। जागिया रोदन-कर्म, पाइयाछ एइधर्म, आमादेर मत चित्तभङ्ग॥ कुङ्कुमादि-चिह्न नाश, मुकुन्देर सुप्रयास, महिषीवृन्देर प्रति यथा। पाइया से व्यवहार, समदशा कि तोमार, जलधि कि लभियाछ तथा?? ३॥ [हे जलनिधे (समुद्र)! क्या तुम्हारे भाग्यमें रात्रिकालमें भी निरन्तर निद्रा-सुख-सङ्ग नहीं लिखा है? हमारी भाँति हृदयके खण्डित होनेके कारण सारी रात्रि जागकर रोना, क्या तुम्हारा भी यही धर्म है? जिस प्रकार मुकुन्दने यत्नपूर्वक हम महिषियोंके कुङ्कुमादि चिह्नोंका हरण किया था, हे जलधि! क्या तुम्हारे साथ भी वैसा ही व्यवहार हुआ है, क्या तुम्हारी भी हमारे समान दशा है?] “त्वं यक्ष्मणा बलवतासि गृहीत इन्दो क्षीणस्तमो न निजदीधितिभिः क्षिणोषि। कच्चिन्मुकुन्दगदितानि यथा वयं त्वं विस्मृत्य भोः स्थगितगीरुपलक्ष्यसे नः॥” ४॥ “हे चन्द्र, तुम क्या प्रबल क्षयरोगसे पीड़ित होकर क्षीण हुए हो और अपनी किरणोंके द्वारा अन्धकारका नाश नहीं कर पा रहे हो? अथवा क्या तुम भी हमारे समान श्रीकृष्णकी समस्त रहस्योक्तियोंको भूलनेके कारण हमें ऐसे प्रतीत हो रहे हो जैसे तुम्हारी वाणी स्तब्ध हो गयी है?”॥ ४॥ अतिशय यक्ष्माक्रान्त, अशक्त नाशिते ध्वान्त, शशधर स्वीय कान्तिबले। किंवा कृष्ण-गाने भ्रान्त, वाक्य-व्यये रह क्षान्त, देखि' मोरा आमादेर दले॥ ४॥ [हे शशधर (चन्द्र)! क्या तुम अतिशय क्षयरोगसे आक्रान्त हो जो अपनी कान्तिके द्वारा अन्धकारका नाश नहीं कर पा रहे हो? अथवा श्रीकृष्णके गानसे भ्रान्त होकर, तुम्हारी वाणी बन्द हो गयी है? ऐसा प्रतीत हो रहा है कि तुम भी हमारे ही दलमें हो।] “किं न्वाचरितमस्माभिर्मलयानल तेऽप्रियम्। गोविन्दापाङ्गनिर्भिन्ने हृदीरयसि नः स्मरम्॥” ५॥ “हे मलय-पवन, हमने तुम्हारा क्या अनिष्ट किया है, जिस कारणसे श्रीकृष्णके कटाक्षपातरूपी बाणके द्वारा हमारा चित्त विदीर्ण होनेपर भी तुम हमारे चित्तमें कामको प्रवृत्त कर रहे हो?”॥ ५॥ आमादेर आचरण, अनुचित कि एमन, शुन, हे मलयसमीरण। गोविन्दकटाक्षबिद्ध, कन्दर्प-प्रेरणे सिद्ध, प्रतिशोधग्रहण-कारण॥ ५॥ [हे मलय-समीर! सुनो, हमने ऐसा कौन-सा अनुचित आचरण किया है, जिसका प्रतिशोध लेनेके लिये तुम गोविन्द-कटाक्षसे बिद्ध हमारे (महिषियोंके) पास कन्दर्पको भेज रहे हो?] “मेघ श्रीमंस्त्वमसि दयितो यादवेंद्रस्य नूनं श्रीवत्साङ्कं वयमिव भवान् ध्यायति प्रेमबद्धः। अत्युत्कण्ठः शबलहृदयोऽस्मद्विधो बाष्पधाराः स्मृत्वा स्मृत्वा विसृजसि मुहुर्दुःखदस्तत्प्रसङ्गः॥” ६॥