भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 2487

470 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 19/108 निजेन्द्रियतर्पण-परायण महामहा-अक्षजज्ञानी स्वयंको पण्डित माननेवाले जड़विद्यामें मत्त व्यक्तियोंकी भी अप्राकृत विप्रलम्भ रसको समझनेमें असमर्थता :- महिषीर गीत येन 'दशमे'र शेषे। पण्डिते ना बुझे तार अर्थविशेषे ॥ 108 ॥ अनुवाद—श्रीमद्भागवतके दशम स्कन्धके अन्तमें महिषी-गीत है जिसका विशेष अर्थ है। इसको परम विद्वान व्यक्ति भी नहीं समझ पाते॥ 108॥ अनुभाष्य—(ख) महिषीर गीत-येन दशमेर शेषे (अर्थात् दशम स्कन्धके अन्तमें महिषी गीत)—भाः 10/90/15-24 श्लोक देखें; जैसे— “कुररि विलपसि त्वं वीतनिद्रा न शेषे स्वपिति जगति रात्र्यामीश्वरो गुप्तबोधः। वयमिव सखि क्वचिद्गाढ़निर्षिद्धचेता नलिननयनहासोदारलीलेक्षितेन ॥”1॥ “महिषियाँ कह रही हैं,—हे कुररि, अज्ञाततत्त्व ईश्वर श्रीकृष्ण जगत्में रात्रिकालमें सो रहे हैं, तुम निद्राशून्य होकर उनकी निद्रा भङ्ग करनेके लिये विलाप कर रही हो, परन्तु सोती नहीं हो, यह उचित नहीं है। अथवा हे सखि, नलिन-नयन श्रीकृष्णके हास्यसहित उदार लीलादृष्टिपातसे हमारे समान तुम्हारा चित्त भी क्या अतिशय बिद्ध हुआ है ? ॥”1॥ जलक्रीड़ा समापिया, कृष्णचिन्ता-पर हिया, चिन्तामग्न महिषीर गण। हे सखि कुररि, एबे, निशाय निद्रित देवे, मोरा करि' कृष्णे जागरण॥ ताँर निद्रासुख-भङ्ग, आमादेर देखि' रङ्ग, तुमि करितेछ विलापन। नाइ केन निद्रा तोर, कृष्णचिन्ता सुविभोर, किंवा बिंधियाछे हास्येक्षण?? कृष्णेर मधुर स्मित, कृष्णदृष्टिबिद्धचित्त, महिषीगणेर भावचय। आमादेर मत तव, अवस्था घटेछे सब, महिषीर तति तारे कय॥1॥ [जलक्रीड़ाको समाप्त करनेके पश्चात् हृदयमें श्रीकृष्णका चिन्तन करती हुई चिन्तामग्न महिषियाँ कह रही हैं,—हे सखि कुररि, इस समय रात्रिमें देव (श्रीकृष्ण) तो सोये हैं, किन्तु हम श्रीकृष्णके लिये जागरण कर रही हैं। श्रीकृष्णके निद्रा-सुखको भङ्ग करके और हमें देखकर तुम हमारा उपहास करते हुए विलाप कर रही हो। तुम्हें नींद क्यों नहीं आ रही, क्या तुम भी कृष्णकी चिन्तामें अत्यधिक विभोर हो? क्या तुम्हें भी श्रीकृष्णके हास्य-ईक्षणने बेध दिया है? श्रीकृष्णकी मधुर मुस्कान और कटाक्षसे बींधे गये चित्तवाली महिषियाँ अपने हृदयमें उदित भावोंके वशीभूत होकर कुररिसे कह रही हैं कि (क्या) तुम्हारी अवस्था भी हमारे समान ही हो गयी है।”] “नेत्रे निमीलयसि नक्तमदृष्टबन्धु- स्त्वं रोरवीषि करुणं बत चक्रवाकि। दास्यं गता वयमिवाच्युतपादजुष्टां किंवा स्रजं स्पृहयसे कबरेण वोढुम् ॥”2॥ “हे चक्रवाकि, तुम रात्रिकालमें प्रियतमको नहीं देखकर क्या करुणस्वरसे अतिशय रोदन कर रही हो और अपने नयनयुगलको बन्द नहीं करती हो? अथवा हमारे समान श्रीकृष्णकी दासी होकर उनकी श्रीचरणसेवित मालाको अपने केशपाशमें धारण करनेकी स्पृहासे इस प्रकार रोदन कर रही हो? ॥”2॥ रात्रे बन्धु ना देखिया, चक्षुद्वंय ना मेलिया, चक्रवाकि, तुमि दुःखभरे। कारुण्ये रोदन कर, किंवा तुमि किंवा स्मर, स्पृहा कर धरिबार तरे॥ अच्युतचरणजुष्ट, महिषी याहाते तुष्ट, सेइ माला शिरेते धरिते। रोदन-कारण तव, स्पष्ट करि' कह सब, चक्रवाकि, महिषी बुझिते॥2॥ [हे चक्रवाकि! रात्रिमें अपने प्रियतमको नहीं देखकर दुःखसे भरे हृदयसे करुण रोदन कर रही हो और नयनयुगलको नहीं मूँद रही हो। तुम किसको अथवा क्या स्मरण कर रही हो, तुम किसे धारण करनेकी स्पृहा कर रही हो? अच्युतकी चरणसेवित