भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 2468, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 2468

[ 19/15-23 उन्नीसवाँ अध्याय 451 नवद्वीप और शान्तिपुरमें रहनेके बाद विदायी-हेतु प्रार्थना :- आचार्यादि-भक्तगणे मिलिला प्रसाद दिया। माता-ठाञि आज्ञा लइला मासेक रहिया ॥ 16 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डितने नवद्वीपमें जाकर श्रीशचीमातासे मिलकर उन्हें महाप्रभुका प्रणाम निवेदन किया और उनका सन्देश सुनाया। फिर वे श्रीअद्वैताचार्य आदि भक्तोंसे मिले और उन्होंने सभीको महाप्रभुके द्वारा भेजा गया श्रीजगन्नाथजीका प्रसाद दिया। उन्होंने एक मास तक नवद्वीपमें रहनेके पश्चात् श्रीशचीमातासे जानेके लिये आज्ञा ली॥ 15-16॥ आचार्येर ठाञि गिया आज्ञा मागिला। आचार्य-गोसाञि प्रभुरे सन्देश कहिला ॥ 17 ॥ पण्डितके माध्यमसे महाप्रभुके निकट श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा पहेली भेजना :- तरजा-प्रहेली आचार्य कहेन ठारे-ठोरे। प्रभुमात्र बुझेन, केह बुझिते ना पारे ॥ 18 ॥ “प्रभुरे कहिह आमार कोटि नमस्कार। एइ निवेदन ताँर चरणे आमार ॥ 19 ॥ महाप्रभुके अवतारके उद्देश्यकी सिद्धि एवं लीलाको सङ्गोपन करनेके लिये इङ्गित करना :- बाउलके कहिह,—लोक हइल बाउल। बाउलके कहिह,—हाटे ना बिकाय चाउल ॥ 20 ॥ बाउलके कहिह,—काये नाहिक आउल। बाउलके कहिह,—इहा कहियाछे बाउल ॥” 21 ॥ अनुवाद—उन्होंने श्रीअद्वैताचार्यसे भी जानेके लिये आज्ञा माँगी। तब श्रीअद्वैताचार्य गोसांईने महाप्रभुके लिये एक सन्देश दिया। वह सन्देश एक तरजा-पहेलीके रूपमें था, जिसे एकमात्र महाप्रभु ही समझ सकते थे, अन्य कोई भी नहीं। श्रीअद्वैताचार्यने श्रीजगदानन्द पण्डितसे कहा,—“महाप्रभुको मेरा करोड़ों बार प्रणाम कहना। उनके श्रीचरणकमलोंमें मेरा यही निवेदन है,—'पागलसे कहना—लोग पागल हो गये हैं। पागलसे कहना—हाटमें अब चावल नहीं बिक रहे हैं। पागलसे कहना—पागलका अब कोई कार्य नहीं है। पागलसे कहना—यह बात एक पागलने कही है॥'” 17-21 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(श्रीअद्वैतप्रभुने पण्डित श्रीजगदानन्दके द्वारा यह कहकर भिजवाया,–) महाप्रभुको कहना कि लोग प्रेममें उन्मत्त हो गये हैं, और प्रेमके हाटमें प्रेमरूपी चावलको बेचनेका स्थान नहीं है। महाप्रभुको कहना कि आउल अर्थात् प्रेमोन्मत्त बाउलको और कोई सांसारिक कार्य नहीं है। महाप्रभुको कहना कि प्रेममें उन्मत्त होकर ही अद्वैतने यह बात कही है। तात्पर्य यह है कि महाप्रभुके आविर्भूत होनेका जो तात्पर्य था, वह सम्पूर्ण हो गया है, अब महाप्रभुकी जैसी इच्छा, वैसा हो॥ 20-21 ॥ अनुभाष्य—पाठान्तरमें,—‘बाउलके कहिओ, लोक हइल आउल।' आउल शब्दका अर्थ आतुर अर्थात् प्रेमपूर्ण है। कोई-कोई उसका ‘शिथिल', ‘असंलग्न' अर्थ भी करते हैं; आउल-शब्दसे ‘निष्किञ्चन', ‘आर्त्त' और ‘आतुर' आदि भी समझा जाता है। ‘काये नाहिक आउल',—कोई-कोई व्याख्या करते हैं कि प्रेम-प्रचार-कार्यमें और उच्छृङ्खलता नहीं है॥ 20-21 ॥ उसे सुनकर श्रीजगदानन्दका हँसना और पुरीमें आकर महाप्रभुके समक्ष उसका वर्णन :- एत शुनि' जगदानन्द हासिते लागिला। नीलाचले आसि' तबे प्रभुरे कहिला ॥ 22 ॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीअद्वैताचार्यकी पहेलीको सुनकर हँसने लगे। उन्होंने नीलाचलमें आकर महाप्रभुको श्रीअद्वैताचार्यकी पहेलीको सुनाया॥ 22 ॥ उसे सुनकर महाप्रभुका हँसना और मौन धारण करना :- तरजा शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिला। “ताँर येइ आज्ञा”—बलि' मौन धरिला ॥ 23 ॥