श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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500 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला 20/147-154 ] चैतन्यमयी नित्यानन्द-कृपाके आनुगत्यमें ही जिह्वा अथवा वचनोंका श्रीचैतन्यलीलाके कीर्तनका सामर्थ्य :- सबार चरण-कृपा-गुरु 'उपाध्यायी'। तार वाणी-शिष्या, तारे बहुत नाचाइ ॥ 147 ॥ अनुवाद-इन सभीके चरणोंकी कृपा ही गुरुकी उपाधिसे युक्त है और उनकी वाणी उस कृपाकी शिष्या है, कृपारूपी गुरुने वाणीरूपी शिष्याको बहुत नचाया है ॥ 147 ॥ अनुभाष्य - 'उपाध्यायी',- 'उपेत्य अधीयते अस्मात्'; 'एकदेशस्तु वेदस्य वेदाङ्गान्यपि वा पुनः। योऽध्यापयति वृत्त्यर्थमुपाध्यायः स उच्यते॥' [अर्थात् 'निकट जाकर जिनसे अध्ययन किया जाता है।' मनुसंहिता - 'जो जीवनधारणके लिये वेदके एकदेश, पुनः वेदोंके छह अङ्गोंका (शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिषका) अध्यापन करते हैं, वे उपाध्याय कहलाते हैं।'] उपाध्याय अर्थात् कलाविद्या-शिक्षक। पाठान्तरमें-'मोर वाणी शिष्या' अर्थात् मेरी वाणी शिष्या है ॥ 147 ॥ शिष्यार श्रम देखि' गुरु नाचान राखिला। 'कृपा' ना नाचाय, 'वाणी' बसिया रहिला ॥ 148 ॥ अनिपुणा वाणी आपने नाचिते ना जाने। यत नाचाइला, नाचि' करिला विश्रामे ॥ 149 ॥ अनुवाद-शिष्याका परिश्रम देखकर गुरुने शिष्याके नचानेको स्थगित कर दिया। कृपाके नहीं नचानेपर वाणी शान्त होकर बैठ गयी है। अनिपुण वाणी स्वयं नाचना नहीं जानती, उसे गुरुने जितना नचाया, वह उतना नाचकर विश्राम करने लगी ॥ 148-149 ॥ श्रोताओंकी वन्दना और कृपा-प्रार्थना :- सब श्रोतागणेर करि चरण-वन्दन। याँ-सबार चरण-कृपा-शुभेरे कारण ॥ 150 ॥ अनुवाद-मैं समस्त श्रोताओंके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जिनके चरणकमलोंकी कृपा समस्त शुभका कारण है ॥ 150 ॥ चैतन्यचरितामृत येइ जन सुने। ताँर चरण धुञा करों मुञि पाने ॥ 151 ॥ श्रोतार पदरेणु करों मस्तक-भूषण। तोमरा ए-अमृत पिले सफल हैल श्रम ॥ 152 ॥ अनुवाद-जो भी व्यक्ति चैतन्यचरितामृतका श्रवण करता है, मैं उसके चरणोंको धोकर उनके चरणामृतका पान करता हूँ। मैं श्रोताओंके चरणकमलोंकी धूलिको अपने मस्तकके आभूषणके रूपमें धारण करता हूँ, आपके इस चैतन्यचरित्ररूपी अमृतका पान करनेसे मेरा परिश्रम सफल हुआ है ॥ 151-152 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 153 ॥ अनुवाद-श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ 153 ॥ ग्रन्थकारकी दैन्यपूर्ण उक्ति :- चरितममृतमेतच्छ्रीलचैतन्यविष्णोः शुभदमशुभनाशि श्रद्धयास्वादयेद् यः। तदमलपदपद्मे भृङ्गतामेत्य सोऽयं रसयति रसमुच्चैः प्रेममाध्वीकपूरम् ॥ 154 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य देखें ॥ 154 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जो श्रद्धापूर्वक भगवान् श्रीचैतन्यदेवके इस अमृतके समान शुभ प्रदान करनेवाले एवं अशुभका नाश करनेवाले चरित्रका आस्वादन करते हैं, ये लेखक (ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामी) उनके अमल चरणकमलोंके भ्रमर बनकर प्रेमरूपी मदिरासे पूर्ण रसका अतिशय आस्वादन करते हैं ॥ 154 ॥