श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2526, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रयोजनीय अंशकी पद्य-सूची [वर्णक्रमानुसार प्रथम और द्वितीय चरण] अ अङ्गे काँटा लागिल, किछु 13/82 अचिरात् पाबे तबे कृष्णेर 3/136, 4/65, 7/133 अचिरात् पाबे तुमि कृष्ण 6/295 अचिरात् मिले ताँरे तोमार 9/76 अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण 13/121 अचेतन देह, नासाय श्वास 14/64 अचेतन पड़ियाछेन, - येन 17/17 अज्ञ मूर्ख सेइ, ताँरे दुःख 3/132 अतएव 'अद्वैत-आचार्य' ताँर 7/18 अतएव ऐश्वर्य हइते 'केवल' 7/35 अतएव कृष्ण कहे, - 'आमि 7/42 अतएव गूढ़ अर्थ किछुइ 3/48 अतएव नाम लय, नामेर 7/104 अतएव भक्तगण 'मुक्ति' नाहि 3/194 अतएव शुक-व्यास करे 7/31 अतस्त्वज्ञ 'तत्त्व' वर्णे, तार 5/120 अति उच्च-नासा तार 3/207 अति दैन्ये पुनः मागे 20/31 अदृश्य, अस्पृश्य मोरे 11/28 अद्भुत-दयालु चैतन्य-अद्भुत 17/68 अद्वैताचार्य-गोसाञि-साक्षात् 7/17 अधरेर एइ रीति, आर 16/130 अनन्त चैतन्यलीला ना याय 15/98 अनिपुणा वाणी आपने नाचिते 20/149 अनिष्टाशङ्का बिना कार मने 18/39 'अनुवाद' हैते स्मरे ग्रन्थ 20/140 अनुरागेर लक्षण एइ,- 'विधि' 10/6 अनेक नाचाइला मोरे प्रसाद 11/30 अनेक लोकेर वाञ्छा अनेक 20/17 अनेक 'सुकृते' इहा हजाछे 16/114 अन्तरे 'अनुग्रह', बाह्ये 7/164 'अन्तर्दशा', 'बाह्यदशा' 8/77 अन्तर्दशार किछु घोर, किछु 18/78 'अन्तर्धान हइला प्रभु',-निश्चय 18/38 अन्तर्यामी प्रभु जानिबेन मोर 7/94 अन्य ऐछे हय, आमार नाहि 16/29 अन्यकथा, अन्यमन, बाहिरे 17/37 अन्य कथा नाहि, सुखे 6/286 अन्योपदेशे पण्डित, कहे 3/11 अपराध कैनु, क्षम, लइनु 7/126 अपराध छाड़ि' कर कृष्ण 7/133 अपराध हउक, किबा नरके 10/95 अपार सौन्दर्ये हरे जगत्रेन्न 15/56 अप्राकृत देह तोमार प्राकृत 4/173 'अप्राकृत' देह भक्तेर 4/191 अप्राकृत-देहे ताँर चरण 4/193 अवश्य पूरिबे, प्रभु, मोर 11/42 अविद्या-नाशक' - 'बन्धुहन्' 5/145 अवैष्णव-जगत् केमने हइबे 3/221 अभिमान छाड़ि' भज कृष्ण 7/132 अभिमान-पङ्क धुजा भट्टेरे 7/163 अमानी मानद हञा कृष्णनाम 6/237 अमृत-गुटिकादि, पानादि 10/125 अमृत हइते पाक ताँर 6/116 अयोग्य हञा ताहा केह 16/137 अयोग्येर देओयाय कृष्ण 16/138 अरण्ये रोदित हैल स्त्रीभाव 3/244 'अर्थव्यस्त' लिखन सेइ, लोके 7/130 'अर्द्धबाह्यें, इति-उति करेन 18/76 'अर्द्धबाह्ये' कहेन प्रभु प्रलाप 18/79 अर्द्धरात्रित्रे प्रभु करेन उच्च 17/9 अलौकिक कृष्णलीला, दिव्य 19/103 अलौकिक-गन्ध-स्वाद अन्य 16/113 अलौकिक प्रभुर 'चेष्टा' 19/106 अल्पसेवा बहु माने आत्म 1/107 असद्व्यय ना करिह,-याते 9/144 अस्थिग्रन्थि भिन्न, चर्म्मे आछे 14/65 आ आकण्ठ पूराजा सबाय 11/88 आकाश-अनन्त, ताते यैछे 20/79 आँचल पातिया प्रसाद 11/73 'आचार', 'प्रचार'-नामेर 4/103 आचार्य कहे,- "आगे तोमार 7/101 आचार्य-सम्बन्धे बाह्ये करे 2/91 आजन्म कृष्णकीर्त्तन, प्रभुर 2/158 आजन्म ना दिला जिह्वाय 6/311 आजि केने एतक्षण आछिस् 10/92 आजि भिक्षा दिबा आमाय 12/122 आजि मोरे भृत्य करि' 12/27 आजि लाग् पाञाछि, दण्डिमु 6/50 आजि हैते एइ मोर आज्ञा 2/113 आज्ञा-पालने कृष्णेर यैछे 10/8