श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ पिक-फला पद्य सूची 517 पिकस्वर-कण्ठ, ताते रागे 13/128 | प्रभु कहे,—“कृष्णकृपा बलिष्ठ 6/193 | प्रभुर गम्भीर लीला ना पारि 20/77 पिछे निन्दा करे, आगे बहुत 8/15 | प्रभु कहे,—“कृष्णनामेर बहु 7/81 | प्रभुर विच्छेदे कार देहे 18/39 पिपिलिका मैले पृथिवीर 11/41 | प्रभु कहे,—“कोन व्याधि 11/23 | प्रभुर विरहोन्माद-भाव—गम्भीर 14/5 पुत्र ‘वातुल’ हइल, राखह 6/38 | प्रभु कहे,—“गोविन्द, आजि 13/85 | प्रभुर यतेक गुण स्पर्शिते 8/41 पुत्र-भृत्य-रूपे तुमि कर 6/202 | प्रभु कहे,—“तुमि ‘पण्डित’ 7/127 | प्रभुर ‘शिक्षाष्टक’-श्लोक येइ 20/65 पुनः पुनः सर्वशास्त्रे फुकारिया 16/61 | प्रभु कहे,—“तोमार देह मोर 4/76 | प्रभुर सङ्गे यत महान्त 6/150 पुनरपि सेइ पथे बाहुड़ि’ 13/84 | प्रभु कहे,—“वृद्ध हइला 11/24 | प्रभु लेखा करे यारे 2/105 ‘पुरीदास’ बलि’ नाम धरिह 12/47 | प्रभु कहे,—“वैरागी करे 2/117 | प्रभु हासि’ कहे,—“स्वामी ना 7/111 पुरीर स्वभाव,—यथेष्ठ आहार 8/71 | प्रभु कहे,—“वैष्णव-देह 4/191 | प्रश्रय-प्रागल्भ्य शुद्ध-वैदग्धी 12/60 पुष्पगन्ध लञा बहे मलय 19/81 | प्रभु कहे,—“भागवतार्थ बुझिते 7/78 | प्रसन्न ना हय इहाय, जानि 6/274 पूजाकाले देखे शिलाय 6/300 | प्रभु कहे,—“भाल कैल 6/284 | प्रसाद-कड़ार-सह बान्धि’ 13/134 पूजा-निर्वाहण हैले पाछे करेन 19/27 | प्रभु कहे,—“मोर वश नहे 2/124 | प्रसाद मागिये भिक्षा देह त’ 11/74 पूजा लागि’ कतकाल करेन 19/26 | प्रभु कहे,—‘रामानन्द विनयेरे 5/77 | प्रसिद्धा वैष्णवी हैल परम 3/141 पूजिते चाहिये आमि सबार 6/150 | प्रभु कहे,—“रूपे कृपा कर 1/56 | ‘प्राकृत’ हैलेह तोमार वपु 4/174 पूर्ण-षड़ैश्वर्य चैतन्य—स्वयं 5/119 | प्रभु कहे,—“शक्ति नाहि अङ्ग 10/86 | प्राण-रक्षा लागि’ येबा करेन 6/313 पूर्णानन्द-चित्स्वरूप जगन्नाथ 5/118 | प्रभु कहे,—“संन्यासीर तैले 12/108 | प्राण-राज्य करों प्रभुपदे 9/96 पूर्वप्राय यथावत् शरीर हइल 14/71 | प्रभु कहे,—“समुद्र एइ 11/64 | प्रीति-स्वभावे काँहा कोन 4/171 पूर्वे आमि ‘रामनाम’ पाञाछि 3/254 | प्रभु कहे,—‘हरिदास, ये तुमि 11/37 | प्रेमधन बिना व्यर्थ दरिद्र 20/37 पूर्वे येन रघुनाथ सब अयोध्या 3/80 | प्रभु कहेन,—“उद्वेगे घरे ना 19/63 | प्रेम-परकाश नहे कृष्णशक्ति 7/14 पृथिवीते विज्ञवर नाहि ताँर 1/200 | प्रभु कहेन,—“कृष्णकथा आमि 5/7 | प्रेमवश गौरप्रभु, याँहा प्रेमोत्तम 2/81 पृथिवीते भक्त नाहि उद्धव 7/44 | प्रभु-कृपापात्र, आर क्षेत्रेर 2/158 | प्रेमवाची ‘हा’-शब्द ताहाते 3/58 पेटाङ्गि-गाय करे दण्डवत् 12/37 | प्रभुगणे याँ’र देखे अल्प 3/45 | प्रेम बिना कृष्णप्राप्ति अन्य 4/58 पेटेर भितर हस्त-पाद—कूर्मेर 17/16 | प्रभु ताँर उपर करेन पाद 19/68 | प्रेमाविष्ट हय—प्रभुर सहज 2/35 प्रकृति-दर्शन कैले एइ 2/165 | प्रभु ना खाइले केह ना 11/85 | प्रेमावेशे पड़िला तँहो समुद्रेर 18/65 प्रकृति-दर्शने स्थिर हय 5/36 | प्रभु पड़ि’ आछेन दीर्घ हात 14/64 | प्रेमार विकार वर्णिते चाहे येइ 18/19 प्रकृति-सम्भाषी वैरागी ना करे 2/124 | प्रभु-पादतले शङ्कर करेन 19/68 | प्रेमी भक्त वियोगे चाहे देह 4/61 प्रचार करेन केह, ना करेन 4/102 | ‘प्रभु-पादोपाधान’ बलि’ ताँर 19/69 | प्रेमे आज्ञा भाङ्गिले हय 10/8 ‘प्रतिध्वनि’ नहे, सेइ करये 3/70 | प्रभु बोले,—“निति निति 6/324 | प्रेमे कृष्ण मिले, सेह ना 4/61 प्रतीत करिते कहि कारण 3/259 | प्रभु-भङ्गी एइ, पाछे जानिबा 2/159 | प्रेमेर स्वभाव, याँहा प्रेमेर 20/28 प्रभु कहे,—“अङ्ग आमि नारि 10/87 | प्रभुमात्र बुझेन, केह बुझिते 19/18 | प्रेमेर ‘स्वरूप’ जाने, पाय 12/154 प्रभु कहे,—“अज्ञ बालक मुञ 8/67 | प्रभुर अत्यन्त प्रिय पण्डित 19/4 | प्रभु कहे,—“एइ ये दिला 16/97 | प्रभुर ‘अन्तरङ्ग’ बलि’ याँरे 6/11 | फ प्रभु कहे,—“एइ शिला कृष्णेर 6/294 | प्रभु आगे आङ्गिनाते फेलिला 12/119 | प्रभु कहे,—“कर वा ना कर 10/88 | प्रभुर आज्ञाय कृष्णकथा शुनिते 5/58 | ‘फलाभास’ एइ,—याते विषय’ 9/137