श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2538, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ शुइ-सिद्ध ] पद्य सूची 521 शुइया रहिला घरे कपाट 12/120 षड्दर्शने जगद्गुरु भागवतोत्तम 7/21 सबे एइ आस्वाद कर करि' 16/114 शुकाञा मैलेह कारे पानी 20/23 षोडशोपचार-पूजाय तत सुख 6/302 सब-लोके निस्तारिला जङ्गम 5/153 शुद्ध कृपा कर, गोसाञि 9/139 सबे कृपा करि' इँहारे 1/199 'शुद्धप्रेम' व्रजदेवीरे—कामगन्ध 7/39 स सबे कृष्ण भजन करे 13/133 'शुद्धवैष्णव' नहे, वैष्णवेर प्राय' 6/198 सबे गाय,—“जय जय 11/99 'शुद्धभक्ति' देह' मोरे, कृष्ण 20/30 सङ्कीर्त्तनयज्ञे कलौ कृष्ण 20/9 सबे चारि-दण्ड आहार 6/310 शुद्धभावे व्रजेश्वरी करेन 7/30 सङ्कीर्त्तन हैते पाप-संसार 20/13 सबे देखि—हय मोर कृष्ण 14/78 शुद्धभावे सखा करे स्कन्ध 7/30 संख्या-कीर्त्तन पूरे नाहि 11/19 सबे रामानन्द जाने, ताँर 5/7 शुनिते शुनिते जुड़ाय हृदय 19/111 संख्या-नाम-कीर्त्तन यावत् 3/113 समुद्रेर मध्ये येन एक 20/81 शुनि' नित्यानन्दप्रभुर आनन्दित 12/31 संख्या-नाम पूर्ण मोर 7/79 सर्वज्ञ, कृपालु तुमि—ईश्वर 4/74 शुनिया आनन्द हैल रघुनाथेर 6/51 संख्या-नाम-सङ्कीर्त्तन—एइ 3/238 सर्वत्र 'व्यापक' प्रभुर सदा 6/125 शुनि' शिवानन्देर पत्नी कान्दिते 12/21 संख्या लागि' दुइ-हाते 9/57 सर्वनाश हबे तोर, ना हबे 3/200 शुष्क-ब्रह्मते नाहि कृष्णेर 8/25 सकल जगते हय उच्च 3/71 सर्वभक्त-पदरेणु मस्तक-भूषण 11/54 श्रद्धा करि' एइ लीला 5/163 सकल मङ्गल ताहे, खण्डे 4/44 सर्वभावे भज, लोक, चैतन्य 17/69 श्रद्धा करि' शुन इहा, शुनिते 19/110 सखि हे, कृष्णगन्ध जगत् 19/93 सर्वलोक उद्धारिते गौर-अवतार 2/3 श्रद्धा करि' शुन सेइ चैतन्य 11/107 सचेतन रहु दूरे, अचेतन 16/124 सर्व-लोक निन्दा करे 8/25 श्रीकृष्णचरणे ताँर प्रेम उपजाय 20/26 सत्कुल-विप्र नहे भजनेर 4/66 सर्वशक्ति नामे दिला करिया 20/19 श्रीकृष्णचैतन्यप्रभु देशे देशे 5/153 सनातन ग्रन्थ कैला 4/219 सर्वशास्त्रे कृष्णभक्त्ये नाहि 7/18 श्रीकृष्णचैतन्य-लीला—अमृतेर 5/162 सनातन, देहत्यागे कृष्ण यदि 4/55 सर्व-शुभोदय कृष्णे प्रेमेर 20/11 'श्रीकृष्णचैतन्य'-शब्द करिते 11/56 सनातनद्वारा भक्तिसिद्धान्त 5/86 'सर्वोत्तम भजन एइ सर्वभक्ति 7/42 श्रीचैतन्यचरितामृत—नित्य 19/111 सनातनेर क्लेदे आमार घृणा 4/187 'सहज' धर्म कहे तैं हो 8/82 श्रीचैतन्यलीला एइ—अमृतेर 5/88 संन्यास करिया सदा सेवेन 19/14 सहजेइ पिपीलिका सर्वत्र 8/49 श्रीधर-उपरे गर्वे ये किछु 7/130 संन्यासी, पण्डितगणेर करिते 5/84 सहस्र-वदने यबे कहये 18/13 श्रीधरस्वामी नाहि मान',—एत 7/128 संन्यासी विरक्त तोमार का 9/68 सहस्रादि पूर्ण हैले, अङ्गे 9/57 श्रीधरस्वामी निन्दि' निज-टीका 7/128 संन्यासी मानुष आमार भूमिते 13/15 सहिते ना पारे प्रभु, मने 5/97 श्रीधरस्वामि-प्रसादे 'भागवत' 7/129 संन्यासीर तबे सिद्ध हय 8/64 सात्त्विक-सेवा एइ—शुद्धभावे 6/296 श्रीधरानुगत कर भागवत 7/132 संन्यासीर धर्म नहे 'इन्द्रिय 8/62 साधक ना पाय ता'ते 4/60 श्रीवास-कीर्त्तने आर राघव 2/34 संन्यासीरे एत खाओयाञा 8/14 'साधुकृपा'-'नाम' बिना 'प्रेम' 3/264 श्रीभागवत-शास्त्र—ताहाते 5/44 संन्यासी हञा करे मिष्टान्न 8/42 सावधाने प्रभुर कैला आज्ञार 6/312 श्रीमदनगोपाल मोरे लेखाय 20/99 सब जीव प्रेमे भासे 3/252 सामान्य भाग्य हैते तार 16/99 श्रीराधार प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते 19/107 सब त्यजि' भजि याँरे 19/51 साहजिक प्रेमधर्म 1/149 श्रीरूप-द्वारा व्रजेर रस-प्रेम 5/87 सब भक्तद्वारे ताँरे आशीर्वाद 6/144 सिंहद्वारे आसिं प्रभु पसारिर 11/73 श्रोतार पदरेणु करौं मस्तक 20/152 सब मुक्त करि' तुमि 3/78 सिंहद्वारे भिक्षा-वृत्ति—वेश्यार 6/284 षड्दर्शन-वेत्ता भट्टाचार्य-सार्वभौम 7/21 सब लोक मान्य करि' 7/131 सिद्ध-देह तुमि, साधने 11/24