श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 2537, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें520 श्रीचैतन्यचरितामृत अन्त्यलीला रातू-शीघ्र ] रातुल वस्त्र देखि' पण्डित 13/52 रात्रिकाले बाड़े प्रभुर विरह 6/7 रात्र्ये राय-स्वरूप-सने 11/12 राधिकादि गोपीगण-सङ्गे 18/81 राधिकार भावे प्रभुर सदा 14/14 रामचन्द्र खाँन अपराध-बीज 3/143 रामदास कहे, —“आमि शूद्र 13/97 'राम' दुइ अक्षर इहा नहे 3/58 रामानन्देर कृष्णकथा, स्वरूपेर 6/6 राय कहे, —“ईश्वर तुमि 1/203 राय कहे, —“कह सहज 1/149 राय कहे, —“रूपेर काव्य 1/180 राय, भट्टाचार्य बोले, —'तोमार 1/115 रासस्थलीर बालु, आर 13/67 रूप-गोसाञि कहे, —'साहजिक 1/149 रौरव हइते मोरे वैकुण्ठे 11/28 ल लइते ना पारि ताँर व्याख्यान 7/109 लक्ष्मी-आदि करि' कृष्णप्रेमे 3/262 लालकेर लाल्ये नहे दोष 4/184 'लाल्यामेध्य' लालकेर चन्दन 4/187 लीलामृत-वरिषणे, सिञ्चे चौद्द 15/68 लीला सम्वरिबे तुमि, —लय 11/31 लोकहित लागि' तोमार सब 2/136 व वन्द्याभावे 'अनम्र' —'स्तब्ध' 5/141 वाक्यदण्ड करि' करे मर्यादा 3/45 'वाचाल' कहिये—'वेदप्रवर्त्तक' 5/140 वायु यैछे सिन्धुजलेर हरे 18/20 विदग्ध-आत्मीय-वाक्य शुनिते 5/107 विद्यापति, चण्डीदास, श्रीगीत 17/6 विद्युत्प्राय देखा दिया हय 14/78 विप्रेर श्राद्धपात्र खाइनु 'म्लेच्छ' 11/30 “विवाह ना करिह” बलि' 13/112 विरह-वेदनाय प्रभुर राखये 6/6 विश्वास करिया कर ए 16/62 विश्वास करिया शुन करिया 3/226 विषय लागि' तोमाय भजे 9/69 विषय-सुख दिते प्रभुर नाहि 9/114 'विषयी' हञा संन्यासीरे उपदेशे 5/80 विषयीर अन्न खाइले मलिन 6/278 विषयीर अन्न हय 'राजस' 6/279 विषयीर द्रव्य लञा करि 6/274 विषयीर भाल मन्द वार्त्ता 9/93 वृक्ष येन काटिलेह किछु 20/23 वृद्ध-जरातुर आमि अन्ध 20/93 वृद्ध माता-पितार याइ' करह 13/113 वृद्धा तपस्विनी आर परमा 2/104 वेणुनाद-अमृत-घोलेले, अमृत 17/38 वेश्यागणे आनि' करे छिद्रेर 3/103 वेश्यार भितरे तारे करिये 7/111 वैरागी करिबे सदा नाम 6/223 वैरागी हञा एत खाय 8/14 वैरागी हञा करे जिह्वार 6/225 वैरागी हञा येबा करे 6/224 वैरागीर कृत्य-सदा नाम 6/226 वैराग्येर कथा ताँर अद्भुत 6/311 वैष्णवधर्म निन्दा करे, वैष्णव 3/146 वैष्णव-पाश भागवत कर 13/113 वैष्णव हञा येबा शारीरक 2/95 वैष्णवेर उच्छिष्ट खाइते तँहो 16/8 वैष्णवेर कर्त्तव्य याँहा पाइये 4/221 'वैष्णवेर' तेज देखि' भट्टेर 7/60 वैष्णवेरे निन्द्य-कर्म नाहि 13/133 वैष्णवेर शेष-भक्षणेर एतेक 16/57 व्यवहार लागि' तोमा भजे 9/68 व्यवहारे-परमार्थे तुमि-तार 4/159 व्यवहित हैले ना छाड़े आपन 3/59 'व्याकरण' नाहि जाने, ना 5/104 व्रज छाड़ि' कृष्ण कभु 1/66 व्रजवधु-सङ्गे कृष्णेर रासादि 5/45 व्रजलीला-प्रेमरस येन वर्णे 1/199 व्रजे राधाकृष्ण-सेवा मानसे 6/237 व्रजेश्वर-शुद्धप्रेम, —येन जाम्बुनद 20/62 श शङ्कर-पण्डिते प्रभुर सङ्गे 19/67 शङ्करानन्द-सरस्वती वृन्दावन 6/288 शङ्ख-घण्टा आदि सह आरति 16/88 शचीर मन्दिरे, आर नित्यानन्द 2/34 शत-जनेरे भक्ष्य प्रभु दण्डेके 10/127 शब्द ना पाञा स्वरूप कपाट 14/60 शरीर सुस्थ हय मोर, असुस्थ 11/22 शाक-पत्र-फल-मूले उदर 6/226 शाखा-चन्द्र-न्याय करि' 17/65 'शास्ति'-छले कृपा कर 12/28 शास्त्र करि' कतकाल 'भक्ति' 4/235 शास्त्रलोकातीत येइ येइ 14/82 शास्त्रे कहे, —नामाभास-मात्रे 3/193 शास्त्रे येइ दुइ धर्म करियाछे 8/75 शिखि-माहिति—तिन, ताँर 2/106 शिवानन्देर पत्नी ताँरे कहेन 12/22 शिरेर पाथर येन पड़िल 8/95 शिला दिया गोसाञि समर्पिला 6/307 शिलारे कहेन प्रभु, —'कृष्ण 6/292 शिश्नोदर-परायण कृष्ण नाहि 6/227 शिष्य हञा गुरुके कहे 8/18 शीघ्र आसिह, ताँहा ना रहिह 13/39