श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ महा-राज्य ] [ पद्य सूची ] [ 519 ]
| | | | | | |---|---|---|---|---|---| | महा-महा विप्र एथा कुलीन | 3/217 | यत नाचाइला, नाचिं करिला | 20/149 | याहा हैते पाइबा कृष्णप्रेम | 17/69 | | महा-मादक हय एइ कृष्ण | 16/113 | यति हञा जिह्वा-लाम्पट्य | 8/83 | येइ चतुर, सेइ करे राजार | 9/33 | | महिषीर गीत येन 'दशमे'र | 19/108 | यतिर धर्म,—प्राण राखिते | 8/83 | येइ जन कहे, सुने करिया | 5/45 | | मागिया खाञा करे जीवन | 6/223 | यथायोग्य उदर भरे, ना | 8/64 | येइ भजे, सेइ बड़, अभक्त | 4/67 | | मागिले वा केने दिबे दुइलक्ष | 9/40 | 'यद्वा-तद्वा' कविर वाक्ये | 5/102 | येइ महाप्रभु कह़ान, सेइ | 1/211 | | मातार यैछे बालकेर 'अमेध्य' | 4/186 | यद्यपि अन्यत्र सङ्केते हय | 3/55 | येइ ये मागये, तारे देय | 20/24 | | मातृभक्तगणेर प्रभु हन | 19/14 | यद्यपिओ तुमि हओ जगत् | 4/129 | ये कराइते चाहे ईश्वर, सेइ | 4/96 | | मानसेइ कृष्णचन्द्रे अर्पिला | 16/33 | यद्यपि काहार 'ममता' बहुजने | 4/171 | ये-गोपी मोर करे द्वेषे | 20/56 | | माया-दासी 'प्रेम' मागे,—इथे | 3/264 | यद्यपि प्रभु—कोटिसमुद्र | 20/66 | ये ना खाय, तारे खाओयाय | 8/71 | | मायावाद शुनिवारे उपजिल | 2/94 | यद्यपि ब्रह्मण्य करे ब्राह्मणेर | 6/198 | ये वंशेर उपरे तोमार हय | 4/44 | | मायावाद-श्रवणे चित्त अवश्य | 2/96 | यद्यपि मासेकेर बासि मुकुता | 10/125 | येमन अपराध भृत्येरे, योग्य | 12/27 | | मायावादी संन्यासी आमि, ना | 7/16 | यवनसकलेर मुक्ति हबे | 3/53 | ये मुक्ति भक्त ना लय | 3/185 | | माहितिर भगिनीर नाम—माधवी | 2/104 | यमुनाते जलकेलि गोपीगण | 18/32 | येरूपे लइले नाम, प्रेम | 20/20 | | 'मुक्ति' तुच्छ-फल हय | 3/185 | यमुनार जले महारङ्गे करेन | 18/81 | यैछे कहाय, तैछे कहि | 5/73 | | मुक्ति-हेतु तारक हय | 3/255 | याँहा गुण शत आछे, ना | 8/79 | यैछे तैछे करे मात्र उदर | 8/62 | | मुखर जगतेर मुख पार | 3/14 | याँहा प्रीति ताँहा आइसे | 3/7 | यैछे नाचाओ, तैछे नाचि | 4/74 | | मुखे फेन, पुलकाङ्ग, नेत्रे | 17/16 | याहार चरित्रे प्रभु पायेन | 19/4 | योग्य जन नाहि पाय, लोभे | 16/137 | | मुञि कोन् क्षुद्र,—येन खद्योत | 1/173 | याते विवरिते पारेन कृष्णरस | 1/57 | | | | मुद्रा देह' विचारिया योग्य | 6/151 | यावत् कीर्त्तन समाप्त नहे | 3/239 | र | | | मोर द्रव्य लइते चित्त ना | 6/275 | यावत् बुद्धिर गति, ततेक | 20/81 | रक्तवस्त्र वैष्णवेर' परिते ना | 13/61 | | मोर पादजल येन ना लय | 16/43 | यार कृष्णकथाय रुचि, सेइ | 5/9 | रघुनाथ कहे मने,—'कृष्ण | 6/194 | | मोर मुखे कथा इँहा करे | 5/74 | यार यत शक्ति, तत करे | 20/79 | रघुनाथदासेर तेंहो हय ज्ञाति | 16/8 | | मोर मुखे कथा कहेन आपने | 5/73 | यारे कृपा करेन, तार | 19/109 | रघुनाथेर नियम,—येन पाषाणे | 6/309 | | 'मोर सखा', 'मोर पुत्र',—एइ | 7/31 | यारे चाहि छाड़िते, से शुञा | 17/56 | रघुनाथेर पादपद्मे बेचियाछौं | 4/40 | | मोर सुख—सेवने, कृष्णेर | 20/59 | यारे मिले सेइ माने | 12/101 | रथे देह छाड़िमु,—एइ परम | 4/12 | | मोरे 'चैतन्य' देह' गोसाञि | 6/132 | यारे यैछे नाचाओ, से | 4/86 | 'रस', 'रसाभास' यार नाहिक | 5/103 | | मोरे दिते मनःपीडा, मोर | 20/51 | याह, भागवत पड़ वैष्णवेर | 5/131 | 'रसाभास' हय यदि | 5/97 | | मोरे पियाओ गौरवस्तुति | 4/163 | याहा देखि' प्रीत हन गौर | 6/220 | राघवेर घरे रान्धे राधा | 6/115 | | मोरे मुख ना देख़ाबि | 8/22 | याहार दर्शने मुनिर हय | 3/236 | राजदण्ड्य हय सेइ शास्त्रेर | 9/90 | | मोरे यदि दिया दुःख, ताँर | 20/52 | याहार श्रवणे भागे 'अज्ञान | 3/46 | राज-द्रव्य शोधि' पाय | 9/33 | | मोरे शिक्षा देह',—एइ भाग्य | 8/67 | याहार श्रवणे हय विश्वास | 3/259 | राजहंस-मध्ये येन रहे बक | 7/98 | | | | याहा हैते अन्य पुरुषसकल | 5/144 | राजार वर्त्तन खाय, आर | 9/90 | | य | | याहा हैते अन्य 'विज्ञ' | 5/141 | 'राज्य-विषय'-फल एइ | 9/109 | | यत दुःख, यत सुख, यतेक | 18/16 | याहा हैते पाइबा वाञ्छित सब | 16/58 | | |