श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें'श्रीचैतन्यचरितामृत'-प्रकाशके बादमें श्रीमद् वृन्दावनदास ठाकुरके 'श्रीचैतन्यभागवत'ने भी एक विशेष भूमिकाका पालन किया। उक्त ग्रन्थ बङ्गलाभाषामें श्रीचैतन्यतत्त्व और लीला-विषयक प्रथम काव्य है और श्रील वृन्दावनदास ठाकुर ही श्रीचैतन्यलीलाके 'आदि-व्यास' हैं-“नित्यानन्द कृपापात्र-वृन्दावनदास। चैतन्यलीलाय तेंहो हयेन 'आदि व्यास'॥” (अन्त्य २०/८२)। उक्त ग्रन्थका रचनाकाल किसीके मतसे १४७० शक, और कोई कहते हैं १४५७ शक, और किसीके विचारसे १४९७ शक है। श्रील वृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थका नाम 'श्रीचैतन्य-मङ्गल' रखा था। उक्त नाम श्रील कविराज गोस्वामीके प्रकटकाल तक भी प्रचलित था-“वृन्दावनदास कैल चैतन्यमङ्गल” (आदि ८/३५) इत्यादि। किन्तु परवर्तीकालमें वह 'श्रीचैतन्यभागवत'के नामसे सुपरिचित हुआ। श्रीश्रील भक्तिविनोद ठाकुरकी लेखनीसे इसके रहस्यको जाना जाता है—“प्रेमविलासके रचयिताकी सभी बातोंका अवलम्बन नहीं किया जा सकता, तथापि उनकी इस बातमें कोई विरुद्ध मत नहीं देखा जाता। वह बात यह है-पहले 'चैतन्यमङ्गल' अन्यान्य उस समय प्रचलित गीतकाव्यके समान बीच-बीचमें पयार और बीच-बीचमें गीतके द्वारा परिपूरित था। बादमें श्रीवृन्दावनके पण्डित वैष्णवोंने इस ग्रन्थको समाजमें पाठ्य ग्रन्थ बनानेके लिये वृन्दावनदास ठाकुरके रचित गीतोंको पृथक् करके सभी पयार एकत्रित करके 'श्रीचैतन्यभागवत'-नाम दिया। ××एक प्रवाद यह चला आ रहा है-लोचनदास ठाकुरके 'श्रीचैतन्यमङ्गल' को देखकर वृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थका नाम परिवर्तन कर दिया। इस प्रवादका कोई आधार प्राप्त नहीं होता है। अपितु यह प्रवाद सम्पूर्ण रूपसे असत्य प्रतीत होता है।”* श्रीमन्नित्यानन्द-प्रभुके विशेष कृपापात्र श्रीवृन्दावनदास ठाकुर 'श्रीचैतन्यभागवत' रचनाकालमें विशेषरूपसे श्रीनित्यानन्द प्रभुकी लीलामें ही आविष्ट होनेके कारण श्रीचैतन्यदेवकी कई लीलाएँ उनके निकटसे विस्तार लाभका अवकाश नहीं पाकर केवल सूत्ररूपमें ही रह गयीं। विशेषतः श्रीचैतन्यदेवकी अन्त्यलीलाका वर्णन उक्त ग्रन्थमें एक प्रकारसे असम्पूर्ण ही रह गया। और उन्होंने उक्त ग्रन्थमें स्थान-स्थानपर लिखा है-“आगे व्यास करिबे वर्णने”-इस वाक्यसे उन्होंने परवर्ती महाजनोंके वर्णनके लिये अनेक विषयोंमें इच्छा करके भी वर्णन नहीं किया, ऐसी उपलब्धि होती है। इसमें एक और अन्तर्निहित रहस्य यह है-श्रीवृन्दावनदास ठाकुर 'श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका' के अनुसार ब्रजके 'कुसुमापीड़' नामक श्रीकृष्णसखा हैं। इसलिये भी उनकी श्रीचैतन्यदेवकी राधाभाव-आस्वादनमयी निगूढ़लीला परवर्ती महाजन और श्रीचैतन्यदेवके अन्तरङ्ग-जन श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीकी अपेक्षातासे ही स्पर्श ना करनेकी असम्भावना *श्रीलोचनदास ठाकुर-कृत 'श्रीचैतन्यमङ्गल'के प्रारम्भमें ही सूत्रखण्डमें देखा जाता है,-“वृन्दावनदास वन्दिब एकचित्ते। जगत मोहित याँर भागवत-गीते॥” इससे श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके ग्रन्थ रचनाके बाद श्रीलोचनदास ठाकुरका चैतन्यमङ्गल रचित हुआ, यह जाना जाता है, और श्रील कविराज गोस्वामीने भी श्रील वृन्दावनदास ठाकुरको 'चैतन्यलीलार आदि व्यास' कहा है, इसलिये श्रीलोचनदासको श्रील वृन्दावनदास ठाकुरके भी पूर्व ग्रन्थ-रचयिता माननेका अवकाश नहीं है। xxii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत