श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनहीं है। ‘श्रीचैतन्यभागवत’-ग्रन्थ वैष्णव-समाजमें सभी प्रकारसे आदरणीय होनेपर भी उक्त ग्रन्थमें श्रीचैतन्यलीलाकी असम्पूर्णता ही ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’के प्राकट्यका कारण हुआ है। इसलिये उक्त ग्रन्थ ‘श्रीचैतन्यभागवत’का ही परिशिष्ट कहकर विचारित हुआ है। श्रीश्रील सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर-कृत ‘श्रीकृष्णदास कविराज’ प्रबन्धमें उनके सम्बन्धमें इस प्रकार दिखायी देता है—“श्रील कविराज गोस्वामी प्रभु चैतन्य-सम्प्रदायके मध्य प्रधान पण्डित और परम भक्त थे। मैं इस वाक्यको प्रमाणित करनेकी चेष्टा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं समझता। कविराज गोस्वामीके ग्रन्थ ही (श्रीचैतन्यचरितामृत, श्रीगोविन्दलीलामृत और श्रीकृष्णकर्णामृतकी ‘सारङ्गरङ्गदा’-टीका) उसके सुन्दर प्रमाण हैं। अपार महिमाशाली कविराजकी दया देखते ही सभी विमोहित होंगे। उन्होंने संस्कृत-शास्त्रज्ञान-विहीन लोगोंके प्रति करुणा प्रकाश करके क्या सुन्दर ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’-ग्रन्थकी रचना की है। हमारा विचार करके यदि कविराज प्रभु इस प्रकार करुणा प्रकाश नहीं करते, तो दर्शनादि-शास्त्रज्ञान-परिशून्य मनुष्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके उपदिष्ट सनातन वैष्णवमत नहीं जान सकते थे और उनकी क्या गति होती, इस विषयमें कहा नहीं जा सकता। धन्य कविराज! आपने वैष्णव-सम्प्रदायके पण्डितों और मूर्खों, दोनोंको ऋणी कर रखा है। आपके गुणोंका मैं एक मुखसे कितना गान करूँगा? शुद्ध वैष्णवजगत् सदा ही आपके गुणोंका गान करता है। कविराज! आपके सिद्ध वाक्य स्मरण करके कौन पाषण्डी आपके चरणोंका आश्रय नहीं करना चाहेगा? आपने चरितामृतमें कहा है—“ये वा नाहि जाने केह, शुनिते शुनिते सेह, कि अद्भुत चैतन्यचरित। कृष्णे उपजिबे प्रीति, जानिबे रसेर रीति, शुनिलेइ बड़ हय हित॥” (मध्य २/८९)—आदि आपके इन सिद्धवाक्योंके गुणोंसे ही इस वैष्णव-सम्प्रदायके अनेक मूर्खोका चरितामृतमें उत्तम अधिकार देखा जाता है। आपके चरणोंमें मेरे असंख्य प्रणाम।” (सः तोः २/१०-११)। जगद्गुरु श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी ‘श्रीचरितामृत-भूमिका’में ग्रन्थकारका विषद परिचय प्रदान किया है। उसमें ग्रन्थकारके देश, काल, वर्ण, आश्रम, स्वजन, स्वभाव, दक्षतादिके सम्बन्धमें विस्तृत आलोचना देखी जाती है। इसलिये उस सम्बन्धमें पुनः आलोचनाकी कोई आवश्यकता नहीं है। उक्त भूमिकामें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीका आविर्भाव-काल अनुमानसे १४५२ शकाब्द जाना जाता है। इसलिये उनका अविर्भाव श्रीचैतन्य महाप्रभुके तिरोधानके कुछ वर्ष पूर्व हुआ था। उस प्रकारसे वे श्रीचैतन्यदेवके साक्षात् प्रकटकालीन भक्त ना होनेपर भी स्वरूपतः उनके नित्यलीला सङ्गी हैं। श्रीमद् विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर-कृत ‘मन्त्रार्थ-दीपिका’में दिखायी देता है,—श्रीमती राधारानीने स्वयं “कृष्णदास आमार प्रिय नर्मसहचरी, आमार सकल मर्मवेत्ता” आदि उक्तिके द्वारा श्रील कृष्णदास प्रभुके नित्यसिद्ध परिकरत्वकी घोषणा की है। श्रील कविराज गोस्वामीके ‘मन्त्रगुरु’के परिचयको लेकर कुछ विभ्रान्तियाँ देखी जाती हैं। उन्होंने ग्रन्थके प्रारम्भमें “मन्त्रगुरु आर यत शिक्षा-गुरुगण। ताँहार चरण आगे करिये वन्दन॥”—कहकर श्रीरूपादि षड्गोस्वामियोंको “एइ छयगुरु—शिक्षागुरु ये आमार” कहकर घोषणा की है। इस वाक्यसे उक्त षड्गोस्वामियोंके मध्य किसीकी भी उनके ‘मन्त्रगुरु’ होनेकी निवेदन | xxiii