भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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सम्भावना क्या लक्षित होती है? किन्तु उनमेंसे वे रूपानुग-प्रधान श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके ही साथ रूपानुगभजन-शिक्षा विषयमें विशेषरूपसे सम्पर्कयुक्त थे। इसलिये उन्होंने कहा,—“श्रीरघुनाथदास श्रीगुरु, श्रीजीवचरण” (अन्त्य २०/९७)। इसके अनुभाष्यमें श्रील प्रभुपादने बतलाया,–“ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामी प्रभुके भजनशिक्षागुरु ही श्रीरूपानुगश्रेष्ठ श्रीरघुनाथदास गोस्वामी प्रभु हैं।” अनेक लोग श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीको ही उनके मन्त्रगुरु रूपमें कहते हैं। किन्तु इस सम्बन्धमें श्रील प्रभुपाद कहते हैं- “कोई रघुनाथ भट्टको कविराज गोस्वामीके पाञ्चरात्रिक दीक्षागुरु रूपमें कहना चाहते हैं, परन्तु इसके प्रमाणका अभाव है। कविराज-शाखा-गुरुपरम्परामें रघुनाथ भट्टको दीक्षागुरु कहकर जो उल्लेख देखा जाता है, उसके विशिष्ट सत्यका परिचय नहीं है।” (अनुभाष्य आदि १०/१०३)। ग्रन्थकारके द्वारा 'मन्त्रगुरु' कहनेके बादमें किसीका भी नाम साक्षात् रूपमें उल्लेख नहीं करनेपर भी उनके विभिन्न पयारोंकी आलोचना करनेपर श्रीमन्नित्यानन्द-प्रभुको ही उनके मन्त्रगुरु-रूपमें विचार किया जा सकता है। जैसे,-“नित्यानन्दराय-प्रभुर स्वरूप-प्रकाश। ताँर पादपद्म वन्दो याँर मुञ्जि दास ॥” (आदि १/४०)। “यद्यपि आमार गुरु-चैतन्येर दास। तथापि जानिये आमि ताँहार प्रकाश॥” (आदि १/४४)। “जय जय नित्यानन्द-चरणारविन्द। याँहा हैते पाइनु श्रीराधागोविन्द ॥ जगाइ-मधाइ हैते मुञ्जि से पापिष्ठ। पुरीषेर कीट हैते मुञ्जि से लघिष्ठ ॥ एमन निर्गुण मोरे केबा कृपा करे। एक नित्यानन्द बिना जगत् भीतरे ॥” (आदि ५/२०४-२०५) आदि। उनकी इस प्रकार वन्दना एकमात्र श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त अन्य किसीके प्रति भी नहीं देखी जाती। इसलिये जो भी हो, उन्होंने नित्यानन्द प्रभुके निकट मन्त्ररूप अनुग्रह लाभ किया था—ऐसा विचार करना दोषपूर्ण नहीं है। इन सब विषयोंमें इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण किये गये विचारोंके द्वारा परिमाप नहीं किया जा सकता—इसलिये अकृत्रिमभावसे आचार्यगणके निकट शरणागत होना कर्त्तव्य है। श्रीचैतन्यचरितामृतके प्रतिपाद्य विषयके सम्बन्धमें श्रीश्रील प्रभुपादने उनकी भूमिकामें जो बताया है, उसके अतिरिक्त और कुछ कहने योग्य नहीं है। संक्षेपमें ग्रन्थकी महिमा केवल यही कही जा सकती है, उस समयके वृन्दावनवासी गौरपार्षदगण और उनके आश्रित गौरभक्तोंके हृदयमें श्रीचैतन्यदेवकी मुख्य-आश्रयभाव-आस्वादनमयी लीलाकी आलोचनाके लिये जो प्रबल आर्त्ति उदय हुई थी और उसके अनुमोदन स्वरूपमें स्वयं विषय-विग्रह श्रीचैतन्यदेव-रूप श्रीमदनमोहनके गलेसे जो आज्ञामाला गिरी थी, उसके द्वारा प्रेरित होकर श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने उस समय (वृद्धावस्थाके कारण) बाह्य इन्द्रियाँ शिथिल होनेपर भी भागवती शक्तिका प्रकाश किया था—उसके फलस्वरूप असमोध्वं-तत्त्व श्रीचैतन्यदेवकी असमोर्ध्व-लीला असमोर्ध्व-रूपमें अक्षर-अक्षरमें वर्णित होकर वह जगद्-वरेण्य हुई है। सत्य ही श्रीचैतन्यदेव क्या वस्तु हैं, वे क्यों अवतीर्ण हुए हैं, उनकी दयाकी चमत्कारिता ही या किस प्रकारकी है—आदि श्रीचरितामृतके आलोकमें जिस प्रकार प्रकाशित हुए हैं, उसने अन्य सभी प्रकाशोंको जैसे निष्प्रभ कर दिया है—इस विषयमें किसीके भी मनमें कोई संशय उदित नहीं होता है। xxiv | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत