श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
सम्भावना क्या लक्षित होती है? किन्तु उनमेंसे वे रूपानुग-प्रधान श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके ही साथ रूपानुगभजन-शिक्षा विषयमें विशेषरूपसे सम्पर्कयुक्त थे। इसलिये उन्होंने कहा,—“श्रीरघुनाथदास श्रीगुरु, श्रीजीवचरण” (अन्त्य २०/९७)। इसके अनुभाष्यमें श्रील प्रभुपादने बतलाया,–“ग्रन्थकार श्रीकविराज गोस्वामी प्रभुके भजनशिक्षागुरु ही श्रीरूपानुगश्रेष्ठ श्रीरघुनाथदास गोस्वामी प्रभु हैं।” अनेक लोग श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीको ही उनके मन्त्रगुरु रूपमें कहते हैं। किन्तु इस सम्बन्धमें श्रील प्रभुपाद कहते हैं- “कोई रघुनाथ भट्टको कविराज गोस्वामीके पाञ्चरात्रिक दीक्षागुरु रूपमें कहना चाहते हैं, परन्तु इसके प्रमाणका अभाव है। कविराज-शाखा-गुरुपरम्परामें रघुनाथ भट्टको दीक्षागुरु कहकर जो उल्लेख देखा जाता है, उसके विशिष्ट सत्यका परिचय नहीं है।” (अनुभाष्य आदि १०/१०३)। ग्रन्थकारके द्वारा 'मन्त्रगुरु' कहनेके बादमें किसीका भी नाम साक्षात् रूपमें उल्लेख नहीं करनेपर भी उनके विभिन्न पयारोंकी आलोचना करनेपर श्रीमन्नित्यानन्द-प्रभुको ही उनके मन्त्रगुरु-रूपमें विचार किया जा सकता है। जैसे,-“नित्यानन्दराय-प्रभुर स्वरूप-प्रकाश। ताँर पादपद्म वन्दो याँर मुञ्जि दास ॥” (आदि १/४०)। “यद्यपि आमार गुरु-चैतन्येर दास। तथापि जानिये आमि ताँहार प्रकाश॥” (आदि १/४४)। “जय जय नित्यानन्द-चरणारविन्द। याँहा हैते पाइनु श्रीराधागोविन्द ॥ जगाइ-मधाइ हैते मुञ्जि से पापिष्ठ। पुरीषेर कीट हैते मुञ्जि से लघिष्ठ ॥ एमन निर्गुण मोरे केबा कृपा करे। एक नित्यानन्द बिना जगत् भीतरे ॥” (आदि ५/२०४-२०५) आदि। उनकी इस प्रकार वन्दना एकमात्र श्रीनित्यानन्द प्रभुके अतिरिक्त अन्य किसीके प्रति भी नहीं देखी जाती। इसलिये जो भी हो, उन्होंने नित्यानन्द प्रभुके निकट मन्त्ररूप अनुग्रह लाभ किया था—ऐसा विचार करना दोषपूर्ण नहीं है। इन सब विषयोंमें इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण किये गये विचारोंके द्वारा परिमाप नहीं किया जा सकता—इसलिये अकृत्रिमभावसे आचार्यगणके निकट शरणागत होना कर्त्तव्य है। श्रीचैतन्यचरितामृतके प्रतिपाद्य विषयके सम्बन्धमें श्रीश्रील प्रभुपादने उनकी भूमिकामें जो बताया है, उसके अतिरिक्त और कुछ कहने योग्य नहीं है। संक्षेपमें ग्रन्थकी महिमा केवल यही कही जा सकती है, उस समयके वृन्दावनवासी गौरपार्षदगण और उनके आश्रित गौरभक्तोंके हृदयमें श्रीचैतन्यदेवकी मुख्य-आश्रयभाव-आस्वादनमयी लीलाकी आलोचनाके लिये जो प्रबल आर्त्ति उदय हुई थी और उसके अनुमोदन स्वरूपमें स्वयं विषय-विग्रह श्रीचैतन्यदेव-रूप श्रीमदनमोहनके गलेसे जो आज्ञामाला गिरी थी, उसके द्वारा प्रेरित होकर श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने उस समय (वृद्धावस्थाके कारण) बाह्य इन्द्रियाँ शिथिल होनेपर भी भागवती शक्तिका प्रकाश किया था—उसके फलस्वरूप असमोध्वं-तत्त्व श्रीचैतन्यदेवकी असमोर्ध्व-लीला असमोर्ध्व-रूपमें अक्षर-अक्षरमें वर्णित होकर वह जगद्-वरेण्य हुई है। सत्य ही श्रीचैतन्यदेव क्या वस्तु हैं, वे क्यों अवतीर्ण हुए हैं, उनकी दयाकी चमत्कारिता ही या किस प्रकारकी है—आदि श्रीचरितामृतके आलोकमें जिस प्रकार प्रकाशित हुए हैं, उसने अन्य सभी प्रकाशोंको जैसे निष्प्रभ कर दिया है—इस विषयमें किसीके भी मनमें कोई संशय उदित नहीं होता है। xxiv | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
इस ग्रन्थका किस प्रकार अनुशीलन करना होगा, उसकी पद्धति श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने (उनके द्वारा सम्पादित संस्करणके ‘प्रबोधनमें’) प्रदर्शित की है—‘‘पाठकवर्गसे मेरा यह अनुनय है, वे इस अपूर्व ग्रन्थको सामान्य काव्य इतिहासके जैसे पाठ नहीं करेंगे। वेदान्तशास्त्र और रसशास्त्र जिस प्रकार यत्नके साथ सद्गुरुके निकट पाठ करने होते हैं, उसी प्रकार इस महाग्रन्थका पाठ करेंगे। आजकल अनेक ही ना पढ़े लोग पाण्डित्यका अभिमान करते हैं, कोई-कोई तो उस प्रकारके पण्डितोंकी व्याख्याको बिना अनुसन्धानके स्वीकार करके स्वयं पण्डित-अभिमानी हो जाते हैं। इस ग्रन्थका अनुशीलन करते हुए निरपेक्षभावसे उन सब दोषोंका परित्याग करना चाहिये। इस ग्रन्थमें वेदान्त और रसशास्त्रमूलक शुद्धभक्तितत्त्व श्रीमन्महाप्रभुके चरित्र-वर्णनमें प्रदर्शित हुआ है। मायावाद-मत-दूषित और सहजिया बाउल लोगोंके द्वारा प्रचारित विकृत धर्मके साथ इस ग्रन्थका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस बातका सम्पूर्णरूपसे विश्वास करके और स्मरण करके महोदयगण इस ग्रन्थका पाठ करेंगे।” इस ग्रन्थमें श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिसे ‘अमृतप्रवाह भाष्य’ और ‘अनुभाष्य’के आनुगत्यमें ‘अमृतानुकणा’-नामसे एक भाष्य प्रदत्त हुआ है। श्रीरूप गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर आदिके विभिन्न भाष्य, श्रीभक्तिविनोद ठाकुरके ‘श्रीचैतन्य-शिक्षामृत’, ‘जैवधर्म’ आदि ग्रन्थ और प्रबन्ध, श्रील प्रभुपादकी श्रीमद्भागवत-व्याख्या, उनके प्रकटकालीन प्रकाशित साप्ताहिक ‘गौड़ीय’ और ‘दैनिक नदीया प्रकाश’ आदि ही मूलतः उक्त भाष्यके उपकरण हैं। इसमें विशेष कुछ साम्प्रदायिक विचार और भजनके आनुषङ्गिक विषय आदि साध्यमत परिष्कृत हुए हैं। आजकल असिद्धान्तपर विभिन्न विचारोंके उपद्रव उदित होकर कलिके धर्मकी वृद्धि कर रहे हैं। जैसे नित्यसिद्ध श्रीगौरपार्षद श्रील प्रबोधानन्द सरस्वतीपादका कोई काशीवासी मायावादी श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीके साथ एकीकरणके द्वारा अपराधका आह्वान कर रहे हैं, कोई ब्रह्मवैवर्त्तके ‘अश्वमेधं गवालम्भं’ श्लोकके द्वारा विवर्त्तग्रस्त होकर श्रीचैतन्य महाप्रभुके स्वयं आचरित संन्यास ग्रहणको शास्त्रीय विचारका अतिक्रम करके श्रीरूपादि गोस्वामीवर्गके पारमहंस्य वेशको ही सर्वसाधारणका अधिकार कहकर प्रतिष्ठित करनेमें व्यस्त हैं, कोई श्रीचैतन्यदेवके साथ उडुपीके तत्कालीन तत्त्ववादी आचार्योंके साथ वार्तालापको केन्द्रित करके श्रीचैतन्यदेवको श्रीमध्व-सम्प्रदायकी परम्परासे बाहर करके स्वतन्त्र सम्प्रदायके प्रतिष्ठाताके रूपमें स्थापित करनेका आग्रह करते हैं, कोई कहना चाहते हैं—विधिमार्गके प्रति अश्रद्धावान् होकर कृत्रिम लोभके द्वारा रागानुग-मार्ग ही कलियुगमें सभीके द्वारा अवलम्बनीय है और इस प्रकार सिद्धदेह-कल्पना ही शुद्ध हरिभजन है—यही श्रीसनातन-शिक्षा है, और कोई श्रीसनातन गोस्वामीके मस्तकपर किसी मायावादी संन्यासीके गेरुवा-वस्त्र धारणके लिये श्रीजगदानन्द पण्डितके तिरस्कार-दर्शनमें शास्त्रीय गैरिकवस्त्र-धारणकी विधिका उन्मूलन करनेमें व्रती हुए हैं। इन सब भावोंसे देखा जाता है, श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित परमशुद्ध शास्त्रीय वैदिक वैष्णवधर्म “कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता” (भाः ११/१४/३) श्लोकानुसार कालक्रमसे विभिन्न मनःकल्पित विचारोंके द्वारा शास्त्रविधि-उल्लङ्घन हेतु स्वेच्छाचारिताके आश्रयमें नष्ट होता जा रहा है। ऐसे दुःसमयमें इन प्रकारके नाना अपसिद्धान्त-शमनमूलक उक्त ‘अमृतानुकणा’ निवेदन | xxv
भाष्य विशेष एक सम्प्रदाय-संरक्षणकी भूमिका अवलम्बन करेगा, ऐसी आशाका हम पोषण करते हैं। श्रीचैतन्यचरितामृतकी एक असम्पूर्ण टीका श्रीमद् विश्वनाथ चक्रवर्तीपादने की थी, ऐसा जाना जाता है। जगद्गुरु श्रील प्रभुपादने उनके जीवनी-प्रबन्धमें भी यह जानाया है। किन्तु वर्तमान समयमें उनके नामसे जो टीका प्रचलित है, उसमें किसी-किसी अंशमें सिद्धान्त विषयमें संशयका क्षेत्र उदित हुआ है, ऐसा देखा जाता है। और भी किसी संस्करणमें उन सब अंशोंमें उक्त टीकाका प्रतिवाद भी देखा जाता है। श्रील चक्रवर्ती ठाकुरका अप्रतिवाद योग्य और सर्वजन-स्वीकार्य जो विचारवैशिष्ट्य उनकी अन्यान्य सभी टीकाओंमें उपलब्ध हैं, उसका अभाव वर्तमान टीकामें अनुभव होनेसे, उक्त टीका अन्य किसी चक्रवर्ती महाशयके द्वारा लिखी गयी है, ऐसा असम्भव नहीं है। श्रीरूपानुग-गुरु-वैष्णव-दासानुदास श्रीभक्तिवेदान्त वामन xxvi | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
सम्पादकीय निवेदन मेरे श्रीगुरुपादपद्म नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अन्तरङ्ग प्रियपार्षद मेरे ज्येष्ठ सतीर्थ नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराजके द्वारा प्रतिष्ठित 'श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति ट्र था। श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराजने अपनी प्रकट-लीला-अभिनयकालमें इस ग्रन्थका प्रकाश सम्पूर्ण किया था। मैने उनके ही उच्छिष्टको ही ग्रहण करके उनकी प्रचारधाराको अविरुद्ध प्रवाहित रखनेके लिये इस हिन्दी संस्करणको प्रकाशित करनेके लिये सङ्कल्प किया था। इसमें मेरी अपनी कोई भी वीरता अथवा दक्षता नहीं है। श्रीचैतन्यचरितामृत शुद्धभक्तिसिद्धान्त-सन्मणि-स्वरूप एक अपूर्व एक ग्रन्थरत्न है। भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने श्रीमद्भागवत महापुराणका महात्म्य वर्णन करते हुए श्रीमद्भागवतको सर्ववेदान्तसार कहा है। नदियोंके मध्य गङ्गा, देवताओंके मध्य विष्णु, वैष्णवोंके मध्य शम्भु और पुराणोंके मध्य श्रीमद्भागवत महापुराण जिस प्रकार सर्वोत्तम हैं, उसी प्रकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीके द्वारा प्रणीत यह श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थरत्न भी वेद-वेदान्त-इतिहास- पुराण-पञ्चरात्रादि सभी शास्त्रोंका सार-सर्वोत्तम मीमांसा ग्रन्थ है। श्रीवृषभानुराजनन्दिनी श्रीमती राधारानीने स्वप्नके द्वारा श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरको साक्षात् कहा था, — श्रील कविराज गोस्वामी उनकी नर्म-सहचरी हैं, वे उनके हृदयके सभी भावोंसे अवगत हैं। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने भी ग्रन्थमें लिखा है— "एइ ग्रन्थ लेखाय मोरे मदनमोहन। आमार लिखन येन शुकेर पठन॥" (अर्थात् श्रीमदनमोहन ही मुझसे यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं। मेरा लिखना तो शुकके पाठ करनेके जैसा है।) वास्तवमें उन्होंने जो सब निगूढ़ रससिद्धान्त उनके श्रीचैतन्यचरितामृत और श्रीगोविन्दलीलामृत ग्रन्थोंमें व्यक्त किये हैं, वे सर्वसाधारण लोगोंको बोधगम्य नहीं हैं। उन्होंने लिखा है,— "ए सब सिद्धान्त गूढ़—कहिते न युयाय। ना कहिले केह इहार अन्त नही पाय॥ अतएव कहि किछु करिया निगूढ़। बुझिबे रसिक भक्त, न बुझिबे मूढ़॥" (अर्थात् ये सब सिद्धान्त अतिगूढ़ हैं, इसलिये इनको कहना नहीं चाहिये। परन्तु यदि इनको नहीं कहूँगा, तो कोई इनको समझ नहीं पायेगा। इसलिये इसको निगूढ़ वचनोंके द्वारा कुछ कह रहा हूँ। रसिक भक्त इसे समझेंगे और मूढ़ व्यक्ति इसे नहीं समझ पायेंगे।) इसमें श्रील कविराज गोस्वामीने श्रीमन्महाप्रभुके शिक्षाष्टक, श्रीरूप-शिक्षा, श्रीसनातन-शिक्षा, श्रीराय-रामानन्द-संवाद, श्रीगोपीनाथ आचार्य और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके वार्त्तालापादि वर्णनके प्रसङ्गमें सात्वत-शास्त्रोंसे ही सार मीमांसा ज्ञापनकी है। इसमें सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन तत्त्व सुन्दररूपसे वर्णित हुए हैं। यह ग्रन्थ एक साधारण बङ्गला पद्य ग्रन्थके जैसा दिखनेपर भी इसके निगूढ़ भाव-गाम्भीर्यका अनुधावन करते महा-महा-विद्वत्-शिरोमणियोंके मस्तक भी घूमने लगते हैं। श्रील कविराज गोस्वामीने विशेष सावधानी सहित भजनके क्रमपन्था xxvii
अनुसरणका उपदेश प्रदान करते हुए हमें अनधिकार चर्चासे सावधान किया है। आत्म-कल्याणके आकाङ्क्षी साधक शुद्धभक्त-साधुसङ्गमें पुनः-पुनः श्रीचैतन्यचरितामृतका अनुशीलन करते रहनेसे क्रमशः ही इसके माधुर्यका आस्वादन करनेका सौभाग्य लाभ करेंगे। श्रीगुरु-वैष्णव-भगवान्में निष्कपट शरणागत भक्तिमान् निज परम-कल्याणार्थी भक्तोंके निकट यह ग्रन्थराज स्वयंको प्रकाश करते हुए उनको सिद्धान्तबोधका सौभाग्य प्रदान करेंगे। “यस्य देवे पराभक्ति यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” अर्थात् “जिसकी आराध्य देवमें जैसी भक्ति है, वैसी गुरुके प्रति भी होती है, तो उस व्यक्तिके हृदयमें सभी शास्त्रोंके मर्मार्थ स्वतः ही प्रकाशित होते हैं।” “याह भागवत पड़ वैष्णवेर स्थाने। एकान्त आश्रय कर चैतन्यचरणे॥ चैतन्येर भक्तगणेर नित्य कर सङ्ग। तबे त' जानिबा सिद्धान्त-समुद्र-तरङ्ग॥” “इसलिये शुद्ध वैष्णवके निकट जाकर भागवतका अध्ययन करो और श्रीचैतन्यदेवके चरणोंका एकान्त आश्रय करो। श्रीचैतन्यके भक्तोंका नित्यसङ्ग करो, तभी सिद्धान्त-समुद्रकी तरङ्गोंको जान सकोगे।” श्रीगुरु-वैष्णव-कृपालेशप्रार्थी— श्रीभक्तिवेदान्त नारायण xxviii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
श्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला पूर्वार्द्धमें उद्धृत प्रमाण-ग्रन्थ तालिका आदिपुराण—४/१८४, २१२, २१३, २१६; उज्ज्वलनीलमणि—४/७०; उपपुराण—३/८२; एकादशीतत्त्व—२/७४; कृष्णकर्णामृत—१/५७; गीतगोविन्द—४/२१९, २२४; गोविन्दलीलामृत—४/१२५; गौतमीय-तन्त्र—३/१०३; ४/१६३; तत्त्व-सन्दर्भ—३/८०; दानकेलिकौमुदी—४/१३१; पद्मपुराण—३/९०; ४/२१५; प्राचीनकृत श्लोक—१/५०, १०६; विदग्ध-माधव—१/४; ३/४; ४/११८; विष्णुपुराण—४/६३, ११६; ७/११९; बृहद्गौतमीयतन्त्र—४/८३; बृहन्नारदीयपुराण—७/७६; ब्रह्मसंहिता—२/१४, १०७; ४/७२; ५/२२, ७१, १५५; ब्रह्माण्डपुराण—५/३९; भक्तिरसामृतसिन्धु—४/४५, ११७, २०२, २०३; ५/३६, ५/३९, २२४; भगवद्गीता—१/४९; २/२०; ३/२२-२५; ४/२०, १७८; ७/११८ भागवत—१/४६, ४८, ५१-५६, ५९, ६०, ६२, ६३, ७१-७४, ९१; २/११, १७, २१, ३०, ५५, ६३, ६७, ९१, ९२; ३/३६, ३९, ५१, ६८, ११०; ४/२३, ३४, ६६, ८८, १५२, १५३, १५५, १५६, १७३, १७६, १८०, २०५-२०८; ५/३५, ७२, ७९, ८३, ८४, ८७, १३८, १३९, १४०, १४१, २१४; ६/२२, ५९-६०, ६३, ६६, ६७, ७०, ७२, ७३, १००; ७/९४; भावार्थ-दीपिका—१/९३; २/५३, ९५; महाभारत—३/४९; यामुनाचार्यकृत-श्लोक—३/८६, ८८; रूपगोस्वामीकृत-श्लोक—४/२६०; लघुभागवतामृत—१/७५, ७७; ३/२७; ४/१८४, २१२, २१३, २१५, २१६; ५/७७; ललितमाधव—४/१४६, २५९; सात्वत-तन्त्र—५/७७; स्तवमाला—३/५७, ६२, ६५; ४/५१, ५२, १९६, २७५; स्तोत्ररत्न—३/८६, ८८; स्वरूप-गोस्वामीकृत कड़चा—१/५-१४; ४/५५, २३०; ५/७, १३, ५०, ९३, १०९; ६/४, ५; ७/६; हरिभक्तिविलास—३/१०३; हरिभक्तिसुधोदय—७/९८;
अमृतप्रवाह भाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका अलङ्कार शास्त्र—२/६-९, ७४; उपपुराण—३/८३; ऋग्वेद—७/१११-११५; ऐतरेयोपनिषद्—७/१११-११५; कठोपनिषद्—७/१२८-१३२; क्रमसन्दर्भ—३/५१; भगवद्गीता—२/३६-३७; छान्दोग्योपनिषद्—७/१२०-१२७, १२८-१३२; तन्त्र—३/८३; तलवकार उपनिषद्—७/१११-११५; तैत्तिरीयोपनिषद्—७/१२०-१२७; नारदपञ्चरात्र—७/१११-११५; पद्मपुराण—७/११०; प्रश्नोपनिषद्—७/१११-११५; बृहदारण्यकोपनिषद्—७/१११-११५, १२८-१३२, १३८-१४०; वेदान्त—४/५६; ब्रह्मसूत्र—७/१२०-१२७; भागवत—३/८३; ५/३५, ८३; भागवतामृत—१/८१; महाभारत—३/५१, ८३; माण्डुक्योपनिषद्—७/१२०-१२७; श्वेताश्वतरोपनिषद्—७/१११-११५, १२०-१२७; शिवपुराण—७/११०; श्रीसम्प्रदायिवैष्णव-ग्रन्थ—५/२७-२८; सार्वभौम श्लोक—३/५१;
उद्धृत ग्रन्थ तालिका | xxix
अनुभाष्यमें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका अथर्ववेद-५/९८-१०१; अथर्वशिखा-७/१२८; अनन्त-संहिता-२/२२; उज्ज्वलनीलमणि-४/४६, १०८, १६२, १६५, २१७; उपदेशामृत (श्रीरूपगोस्वामीकृत) - २/११७; ७/१६-१७; ऋक्संहिता-२/२४; ५/९८-१०१; कठोपनिषद् - ७/१०; कलिसन्तरणोपनिषद् - ३/४०; कृष्णयामल-२/२२; कृष्णसन्दर्भ-५/१४-१८, १२०; कार्ष्णायण-श्रुति-५/२८; गीता-५/९०; ७/११५, १२८; गीता-भाष्य (मध्वाचार्य) - ५/२८; गोविन्दभाष्य-६/१४-१५; गौरगणोद्देशदीपिका-४/१०५; ६/३९; चैतन्यचन्द्रामृत-७/२७, १४९; चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक-७/४५; चैतन्योपनिषद्-२/२२; चैतन्यभागवत-२/११०; छान्दोग्योपनिषद् - ७/१२८, १२९; नरोत्तमदास ठाकुरकी प्रार्थना-५/२०४; ७/१६-१७; तत्त्वसन्दर्भ-२/५; तैत्तिरियोपनिषद्-७/१२०, १२८; नवद्वीपशतक - ७/१४९; नामार्थ-सुधाभिधभाष्य (बलदेव) - ३/४९; नामाष्टक (श्रीरूपगोस्वामी) - ७/७२-७४; नारदपञ्चरात्र-२/११८; ६/४३-४४; ७/७२-७४; नारायण-संहिता-३/४०; नारायणार्थशिरोपनिषद्-२/२४; नारायणोपनिषद्-२/२४; पद्मपुराण-३/७८; ५/४०, ४१-४८, ११०-११२, २२३, २२५-२२६; ६/४३-४४; ७/१०८-१०९; परमात्म-सन्दर्भ-५/५८; ७/१२१-१२६; लघुभागवतामृत-भाष्य (बलदेव) -६/७७-७८; प्रपन्नामृत-५/२८; प्रमेयरत्नावली-६/३९; प्रीति-सन्दर्भ-४/६०; ७/८८; वायुपुराण-१/४६; २/२२; ६/७७-७८; विष्णुपुराण-१/१०७; ५/७६, ५/११०-११२; ७/१०६; विलापकुसुमाञ्जली-५/२०३; वृन्दावन-शतक-७/१४९; बृहदारण्यकोपनिषद् - ७/१२०; बृहद्भागवतामृत-५/३६; वेदान्तसार (सदानन्द योगी) - ७/१०१, १११-११३; वेदान्ततत्त्वसार (श्रीरामानुज) - ७/१२०; वेदान्तसूत्र या ब्रह्मसूत्र-५/४१-४८; ६/१५; ७/१०६, १२१; वेदार्थसंग्रह (श्रीरामानुज) - ७/१४०; व्यासयोग-५/२८; ब्रह्मयामल-२/२२; ब्रह्मसंहिता-२/८९; ५/८१, ९४-९५, ९८-१०१; ६/७७-७८; ब्रह्माण्डपुराण-५/११०-११२, १२९-१३२; भक्तिरत्नाकर-६/३९; ७/१४९; भक्तिरसामृतसिन्धु-२/११७; ६/४३-४४; ७/९२; भक्तिसन्दर्भ-१/३५, ४६; ५/२२५-२२६; ७/७२-७४; भगवत्-सन्दर्भ-२/१०, ९६; ३/८०; ४/६२, ६६; ५/२८, ८४; ७/१२८; भागवत-२/२२, २४, ११७; ३/१८; ४/३३; ५/३५-३६, ५९-६१, ६५-६६, ८०, ८२, ८९, ९६, ९८-१०१, १०२-१०३, १०४, ११०-११२, १२०, १२४, १७०, २२३, २२५-२२६; ६/४३-४४, ७७-७८, ९८; ७/३४, ७१, ७३, ९२; भागवत-तात्पर्य (मध्व) - ५/८४; भावार्थ-दीपिका-५/४१-४८, १६१; ६/४३-४४; मनःशिक्षा (दास गोस्वामी) - १/४६; ४/३३; मनुसंहिता-१/४६; महाभारत-१/१०७; ३/४७; ५/१०२-१०३, ११०-११२; माण्डुक्योपनिषद्-७/१२८; मुकुन्दमालास्तोत्र-४/३३; ६/४३-४४; मुक्तिकोपनिषद्-७/१०८-१०९; मुण्डकोपनिषद्-२/१२, २२; मुण्डकोपनिषद्भाष्य (मध्वाचार्य) - ३/४०; ७/७२-७४; राधारससुधानिधि-७/१४९; लघुभागवतामृत-१/६९-७०; २/११४; ५/३६, ४०, ४१-४८, ७६, xxx | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
८१, ८४, ८६, १०४, ११०-११२, १२०, १२६-१३२, १५३-१५४, २२३; ६/७७-७८; श्वेताश्वतरोपनिषद्—२/२२, १०३; ६/१५; ७/५, ९५-९६; शङ्कराचार्य-कृत ब्रह्मसूत्र-भाष्य—५/४१-४८; ७/१२१; शङ्कराचार्य-वाक्य—७/४१; शुक्ल यजुः—५/९८-१०१; श्रीभाष्य (श्रीरामानुज)—५/४१-४८; श्रीभाष्य-श्रुतप्रकाशिका टीका (सुदर्शनाचार्य)—५/४१-४८; श्रीवल्लभ-दिग्विजय—१/५७; श्रुतिवाक्य—७/७१; सङ्गीत-माधव—७/१४९; सज्जनतोषणी पत्रिका—५/३५-३६; सर्वज्ञसूक्त—४/६३; सर्वसम्वादिनी—३/८०; ७/१२१; सामवेद—५/९८-१०१; सांख्य-दर्शन—६/१५; सारार्थदर्शिनी—२/११७; सिद्धान्त-शिरोमणि—५/११०-११२; सीतोपनिषद्—५/२८; सूर्यसिद्धान्त—३/७-८, २९; स्कन्दपुराण—३/७८; ७/१०६; स्तवामृतलहरी (विश्वनाथ)—१/४६; हनुमद्वाक्य—६/४३-४४; हयशीर्ष-पञ्चरात्र—२/२४; ६/४३-४४; हेमचन्द्र-कोष—७/१०६; अमृतानुकणिकामें उद्धृत ग्रन्थादि-तालिका अलङ्कार-कौस्तुभ—७/१०८; उज्ज्वलनीलमणि—४/२६, ३५, ४६, ६८, १२७; गरुड़पुराण—२/६६; गीतगोविन्द—४/२६; गीता—२/५, १०३; ३/१३-१६; ४/१०-१४, २०, ३५, १६५-१६६, २३६; ५/१४२; ६/८३; गोपालतापनी—२/९; चैतन्यचन्द्रामृत—४/१६५-१६६; चैतन्यचरितामृतम् महाकाव्य—७/६५; तैत्तिरीयोपनिषद्—२/५-९, ४/२३९; नारदपञ्चरात्र—४/७५, ८९; नृसिंहतापनी (शङ्करभाष्य)—३/१३; ७/८४; पद्मपुराण—३/१३-१६, ७८; ४/८९-९१, १६५-१६६, २३५; ६/५९; पुरुषबोधनी (अथर्ववेद)—४/७५; बृहद्गौतमीय-तन्त्र—२/५; बृहद्भागवतामृतम्—३/१३, १८; ५/१७; बृहदारण्यकोपनिषद्—४/१६५-१६६; ब्रह्मयामल—३/११०; ब्रह्मसूत्र—२/११७; ७/८४; ब्रह्मसंहिता—२/११; ४/१०५; ५/१७, १४२; भक्तिरसामृतसिन्धु—३/१३-१६, १८, १०७, ११०; ४/१५; भक्तिसन्दर्भ—३/१३-१६; भागवत—१/५८, ९१; २/६६; ३/१३-१६, १९, २७, ३७-३८, ७८, ९५; ४/१०-१४, २६, ३५, ४१, ४६, ११६, १६५-१६६, २३५; ५/८, १०३, १४२; ६/६४, ७४; ७/६५, ८४, १०६; भार्गवीय मनुसंहिता—२/११७; महाभारत—६/८३; लघुभागवतामृत—२/६; ४/११५; वासनाभाष्यधृत श्रीभगवत्-परिशिष्ट-वचन—३/९५; विदग्ध-माधव—३/४; विष्णुपुराण—४/१०-१४; ७/१०६; विष्णुयामल—१/१०७; सर्वसम्वादिनी—७/८४; सौपर्णोपनिषद्—७/८४; उद्धृत ग्रन्थ तालिका | xxxi
श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (पूर्वाद्ध) अध्याय-विवरण पहला अध्याय (पृ. १-४१)— तीन प्रकार मङ्गलाचरण, अवतारका मूल प्रयोजन, श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैततत्त्व, पञ्चतत्त्व और सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन-अधिदेवताके प्रणाममूलक सतरह श्लोक, उनके मध्य नमस्कारात्मक प्रथम दो श्लोकोंकी व्याख्यामें गुरुतत्त्व, चतुःश्लोकी भागवत, पञ्चतत्त्व-व्याख्या और श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-स्वरूप एवं महात्म्य-कथन। दूसरा अध्याय (पृ. ४२-८७)— श्रीचैतन्यतत्त्व-निरूपणात्मक तृतीय श्लोककी व्याख्यामें ब्रह्म, परमात्म और भगवत्-विचार, श्रीकृष्णस्वरूप और उनकी तीन शक्तियोंका ज्ञान। तीसरा अध्याय (पृ. ८८-१४५)— आशीर्वाद-मङ्गलाचरणमें चैतन्यावतारके सामान्य कारण वर्णनमें अवतारके काल, कारण, वर्ण और लक्षणादिका विचार, अवतारके सम्बन्धमें प्रमाण-वचन, अवतारके प्रकट प्रमाण, अङ्ग-उपाङ्ग-अस्त्र-पार्षद और युगधर्म-कथन, स्वयंरूप-अवतारके पूर्व गुरुवर्गरूप सेवकगणोंका प्राकट्य, अवतारके पूर्व सामाजिक अवस्था, श्रीअद्वैतकी जीवोंपर दयाका चिन्तन और श्रीकृष्ण-आराधना आदि कथन। चौथा अध्याय (पृ. १४६-२४७)— श्रीचैतन्यावतारके मुख्य तीन उद्देश्योंके वर्णनके प्रसङ्गमें युगधर्म-प्रवर्त्तन, असुर-मारण और श्रीअद्वैतादि भक्तोंके आराधनको अवतारका बाह्य कारणमात्र कहकर “अवतारी श्रीकृष्णमें अवतारोंकी स्थिति, विधिभक्तिके प्रचारके लिये विष्णु और रागभक्तिके प्रचारार्थ स्वयं श्रीकृष्णका गौरावतार, रासलीला श्रवणमें मुक्तपुरुषका ही अधिकार, आचार-प्रचार, शान्तके अतिरिक्त चारों रसोंके आश्रयवर्गकी श्रीकृष्ण-प्रीतिकी ही कामना, रसोत्कर्ष-विचार, तटस्थ विचारसे मधुर रसकी श्रेष्ठता, स्वकीया और परकीयारूपमें मधुर रसकी दो प्रकारसे स्थिति, श्रीराधाकृष्ण-मिलिततनु श्रीगौरसुन्दर, श्रीराधातत्त्व और श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध, एक ही चित्-शक्तिके तीन रूप, शक्तिमान् और शक्तिका परस्पर अविच्छेद्य सम्बन्ध, शुद्धसत्त्वसे ही भगवान्का प्राकट्य, महाभाव, तीन प्रकारकी श्रीकृष्णकी कान्ताएँ, अंशिनी श्रीराधा, श्रीराधाके पाँच नाम, श्रीराधाके नामोंके अर्थ, श्रीराधा महाभावमें मग्न श्रीगौरसुन्दर, श्रीकृष्णके तीन प्रकारके वयस-धर्म और xxxii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
१. आदि-लीला: श्री चैतन्य महाप्रभु का आविर्भाव, बाल्य-लीला एवं संन्यास
वयस-भेदसे लीला-भेद, श्रीराधाका प्रेमबल, श्रीकृष्णमें जिस प्रकार परस्पर विरुद्ध धर्मोंका सामञ्जस्य वर्तमान है, श्रीराधामें भी उसी प्रकार है, विषय और आश्रयजातीय सुख, श्रीस्वरूप ही श्रीगौरावतारके गूढ़ रहस्यवेत्ता, गोपीप्रेमकी 'रूढ़भाव'-संज्ञा, काम और प्रेम, शुद्धभक्ति-प्रकारभेदसे श्रीकृष्ण-प्राप्तिके तारतम्यका विचार, गोपियोंके श्रीकृष्णप्रेमका परिचय, श्रीराधिका ही गोपियोंमें सर्वश्रेष्ठता, श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका सम्पर्क, सम्भोग-रसविग्रह नन्दनन्दन ही विप्रलम्भ-रसविग्रह-श्रीगौर, रससिद्धान्तके अधिकारी, श्रीराधा-श्रीकृष्णका तुलना-विचार" आदि विषयोंकी अवतारणा।
पाँचवाँ अध्याय (पृ. २४८-३२९)- श्रीनित्यानन्द-तत्त्व निरूपणात्मक पाँच श्लोकोंकी व्याख्याके प्रसङ्गमें "श्रीबलदेव-तत्त्व, श्रीबलदेवकी पाँच रूपोंसे श्रीकृष्णसेवा, उसमेंसे शेषरूपसे दस-देहसे श्रीकृष्णसेवा, परव्योम और उसके ऊपरमें तीन कृष्णलोक, चिन्मय व्रजधामका श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रपञ्चमें प्रकाश, चर्मचक्षुओंसे श्रीधाममें प्रपञ्च-दर्शन, आदि-चतुर्व्यूह, कृष्णलोकमें श्रीकृष्णकी द्विभुज और परव्योम-वैकुण्ठमें चतुर्भुजलीला, श्री-भू-नीला शक्तियाँ, सायुज्यसे भिन्न चार प्रकारकी मुक्तियोंसे वैकुण्ठकी प्राप्ति, निर्विशेषवादीका ही सायुज्य स्थान-सिद्धलोक, निर्विशेष ब्रह्म, द्वितीय चतुर्व्यूह, कारणार्णव (कारण-समुद्र), गङ्गा कारणजलकी एक कणा, महत्स्रष्टा आदि-पुरुषावतार, प्रकृति जड़रूपा-जगत्की सृष्टिकी 'गौणकारण', श्रीकृष्ण ही मूल जगत्कारण, मूल सङ्कर्षण, महासङ्कर्षण और तीन पुरुषावतारोंका सम्बन्ध, मत्स्यादि समस्त अवतारोंके अंशी कारणाब्धिशायी, तीनों पुरुषावतारोंके कार्य, ईक्षणादि कार्योंके द्वारा मायासे सम्बन्ध होनेपर भी वस्तुतः पुरुष मायातीत, ईश्वर अचिन्त्यशक्तिमान्, ईश्वरमें और जगत्में भेदाभेद सम्बन्ध, ब्रह्माण्डका परिमाण, चौदह लोकोंकी उत्पत्ति, गर्भ-समुद्रमें वैकुण्ठधामप्रकाश, अनन्तशय्या, ब्रह्माका जन्म, सृष्टि-स्थिति-लय, सप्तसमुद्र, श्वेतद्वीप, विष्णुका शेषरूप, शेषकी दस देह, श्रीकृष्णको विष्णु-नामसे कहना दोषयुक्त नहीं-क्योंकि उनमें सब कुछ सम्भव है, श्रीकृष्ण ईश्वर और सब उनके दास, गुरुवर्गादि सभी उनकी लीलाके सहायक, ज्येष्ठ-कनिष्ठ अभिमान, मीनकेतन रामदास, गुर्णार्णव मिश्रके आचरणसे रामदासको क्रोध, निताइके बिना गौर और गौरके बिना निताइमें विश्वास भक्तिविरोधमात्र, श्रीकविराज गोस्वामी ठाकुरकी दैन्यज्ञापक आत्म-कहानी, अप्राकृत विग्रहमें प्राकृत शिलादि-बुद्धि महापराध" आदि वर्णन।
छठा अध्याय (पृ. ३३०-३७७)- श्रीअद्वैत-तत्त्व निरूपणात्मक दो श्लोकोंकी व्याख्यामें "श्रीअद्वैतका तत्त्व और महिमा, मायाके दो रूप-निमित्त और उपादान, कारणशायीकी दो मूर्तियोंसे सृष्टि-स्वयं 'निमित्त' और श्रीअद्वैत प्रभु 'उपादान' (अन्तर्यामी), सांख्यमतका खण्डन, श्रीअद्वैतकी दो मूर्तियाँ, श्रीअद्वैत महाविष्णुके अङ्ग या अंश होनेपर भी मायातीत, अङ्ग और अंशके तात्पर्य अर्थ, 'अद्वैताचार्य' और 'कमलाक्ष'-नामकी सार्थकता, वैकुण्ठमें विष्णु और वैष्णवका सारूप्य, आचार्यकी हुङ्कारसे श्रीचैतन्यावतार, श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैत महाप्रभुके अङ्ग, श्रीवासादि उपाङ्ग, श्रीअद्वैतके प्रति
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श्रीगौरका गुरुतुल्य व्यवहार, श्रीअद्वैतका श्रीकृष्णदास-अभिमानसे भक्तिप्रचार, श्रीकृष्ण-दास्यके सामने करोड़ों ब्रह्मसुख भी तुच्छ, लक्ष्मीकी भी कृष्णदास्य-प्रार्थना, श्रीनित्यानन्द-अद्वैतादि सभीकी ही श्रीगौरदास्यकी प्रार्थना, सख्य-वात्सल्य-मधुर रसमें यहाँ तक कि श्रीराधामें भी श्रीकृष्णदास्य, स्वयं-प्रकाशमें भी श्रीकृष्णदासाभिमान, श्रीकृष्ण ही सर्वसेव्य, भक्तावतारकी सर्वश्रेष्ठ मर्यादा, श्रीकृष्णके निकट भक्तका ही सर्वश्रेष्ठ सम्मान, श्रीकृष्ण-साम्यसे माधुर्यास्वादन असम्भव, श्रीसङ्कर्षण श्रीकृष्णके आदि भक्तावतार” आदि विषय-वर्णन। सातवाँ अध्याय (पृ. ३७८-४५१)— पञ्चतत्त्व निरूपण प्रसङ्गमें “प्रेमकी बाढ़, महाप्रभुके संन्यास ग्रहणका कारण, प्रेमसे वञ्चित दलोंका उद्धार, काशीके मायावादी, महाप्रभुका वृन्दावन-गमन, मार्गमें काशीमें अवस्थान, मायावादियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा, महाप्रभुके द्वारा उनकी उपेक्षा और मथुरागमन, मथुरा देखकर पुनः काशीमें आगमन और चन्द्रशेखरके घर ठहरना, सनातन गोस्वामीसे मिलन, प्रकाशानन्द-सभामें महाप्रभु, महाप्रभुका नाम-महात्म्यका कीर्तन, प्रेम-पञ्चम पुरुषार्थ, प्रेमका स्वभाव, श्रीकृष्णनामानन्द-सिन्धुके आगे ब्रह्मानन्द गोखुरके समान, वेदान्त सम्बन्धमें महाप्रभुका मत और व्याख्या, ईश्वर-वाक्य दोषशून्य, मुख्यवृत्ति और गौणवृत्ति-विचार, मायावाद या शाङ्करके मतके निराधार होनेका स्थापन, ब्रह्म-शब्दका मुख्यार्थ, मायावादसे विष्णुनिन्दा, शक्ति और शक्तिमान्, जीवतत्त्व, वस्तु-परिणामवाद, विवर्त्तवाद, विवर्त्तवाद-खण्डन, प्रणव, तत्त्वमसि, अभिधा और लक्षणा-वृत्ति, स्वतःप्रमाण वेदका अन्य कोई भी प्रमाणाभाव, महाप्रभुकी सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनात्मक ब्रह्मसूत्रके मुख्यार्थकी व्याख्या, संन्यासियोंका मति-परिवर्तन, महाप्रभुकी उनके ऊपर कृपा, महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंकी भीड़, सनातन गोस्वामीको वृन्दावन भेजना, महाप्रभुका नीलाचलमें आगमन, स्वयं और प्रचारकोंके द्वारा भारतमें सर्वत्र नामप्रेमप्रचार और लोगोंका उद्धार, सेतुबन्ध तक भक्तिप्रचार” आदि विषयोंका कथन। xxxiv | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रो विजयतेताम् श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदि-लीला पहला अध्याय पहले अध्यायका सार—इस अध्यायके प्रथम चौदह श्लोकोंमें परमतत्त्वका निर्णय किया गया है। अगले तीन (पन्द्रहसे सत्रह) श्लोकोंमें श्रीवृन्दावन स्थित श्रीश्रीराधामदनमोहन, श्रीश्रीराधागोविन्द और श्रीश्रीराधागोपीनाथका मङ्गलाचरण दिया गया है। उक्त चौदह श्लोकोंके प्रथम श्लोकमें सामान्य रूपसे परमतत्त्वकी छह प्रकारकी अभिव्यक्तियोंकी वन्दना की गयी है और सम्पूर्ण प्रथम अध्यायमें उनकी विशेष व्याख्या प्रस्तुत हुई है। गुरु-शब्दके द्वारा दीक्षागुरु और शिक्षागुरु—दोनोंको ही ग्रहण करना होगा। शिष्यमें यह अभिमान होना चाहिये कि दोनों प्रकारके गुरु श्रीकृष्णके प्रकाश हैं। ईशभक्त अर्थात् भगवान्के भक्त सिद्ध और साधकके भेदसे दो प्रकारके हैं। स्वयंरूप-श्रीकृष्ण और उनके कायव्यूह ईश-तत्त्वके अन्तर्गत हैं। अंशावतार, गुणावतार और शक्त्यावेशावतार—ये तीन प्रकारके अवतार हैं। इसी (अवतार) प्रसङ्गमें श्रीकृष्णके प्रकाशतत्त्व और विलासतत्त्वका विचार किया गया है। श्रीकृष्णकी तीन प्रकारकी शक्तियाँ हैं—वैकुण्ठादिमें लक्ष्मियाँ, द्वारकामें महिषियाँ और व्रजमें गोपियाँ। व्रजगोपियाँ इन तीनों शक्तियोंमें सर्वोत्तम हैं। श्रीकृष्ण और श्रीकृष्णके कायव्यूह ईशतत्त्व हैं और समस्त भक्तगण आवरण-तत्त्व हैं [अर्थात् ईशतत्त्वके चारों ओर उनको आवृत किये हुए स्थित हैं], इसलिये उनकी शक्ति-विशेष हैं। शक्ति-शक्तिमान्में अभेद-बुद्धिसे नित्य अभेद और शक्तिमान्से शक्तिकी पृथक्-बुद्धिसे उनमें नित्य भेद प्रतीत होता है। इस प्रकार एक अखण्ड-तत्त्व अपनी अचिन्त्य-शक्तिके द्वारा प्रतिपादित होता है। इस सिद्धान्तका नाम वेदान्त-सम्मत अचिन्त्यभेदाभेद-तत्त्व है। इस अध्यायके अन्तिम भागमें श्रीचैतन्यचन्द्र और श्रीनित्यानन्दका स्वरूप और माहात्म्य कहा गया है। (अमृतप्रवाह भाष्य) 🪷 —मङ्गलाचरणारम्भ— 🪷 श्रीकृष्णचैतन्यतत्त्वको सामान्य नमस्कार :— वन्दे गुरुनीशभक्तानीशमीशावतारकान्। तत्प्रकाशांश्च तच्छक्तीः कृष्णचैतन्यसंज्ञकम् ॥ १ ॥ अनुवाद—समस्त गुरुवर्ग, भगवद्भक्तों, भगवान्के अवतारों, भगवान्के प्रकाश, भगवान्की शक्तियों तथा श्रीकृष्णचैतन्य नामक स्वयं-भगवान्, इन अभिन्नावरणात्मक छह तत्त्वोंकी मैं, ग्रन्थकार कृष्णदास कविराज, वन्दना करता हूँ॥ १॥ अमृताणुकणिका—ग्रन्थकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने इस ग्रन्थके प्रथम श्लोकमें वन्दनात्मक मङ्गलाचरणके अन्तर्गत अपने इष्टदेवकी अहैतुकी कृपा प्राप्तिके लिये प्रार्थना की
[ १/१-४ है। श्रीराधाभावद्युति सुवलित श्रीकृष्णस्वरूप, रसराजमहाभावके मूर्त्तिविग्रह श्रीकृष्णचैतन्यदेव ही उनके इष्टदेव हैं। श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी वन्दनाके साथ-साथ ग्रन्थकारने इस श्लोकमें गुरुवर्ग, भक्तों, अवतारों, प्रकाश और शक्तियोंको भी समान भावसे नमस्कार किया है, इसलिये इसे 'सामान्य' नमस्काररूप मङ्गलाचरण कहा गया है॥ १॥ इष्टदेव-युगलके प्रति विशेष नमस्कार; एक साथ चन्द्र-सूर्यवत् निताइ-गौरका उदय और जीवोंपर दया :- वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यनित्यानन्दौ सहोदितौ। गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमोनुदौ ॥ २ ॥ अनुवाद-मैं श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीनित्यानन्दकी वन्दना करता हूँ, जो सबका मङ्गल करनेके लिये और अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेके लिये गौड़देशरूपी क्षितिजपर एक साथ चन्द्र एवं सूर्यके समान आश्चर्यजनक रूपसे उदित हुए हैं॥ २ ॥ अमृतानुकणिका-यहाँपर केवल इष्टदेवको ही नमस्कार किया है और उसके साथ अन्य किसीको नमस्कार नहीं किया है, इसलिये यह 'विशेष' नमस्काररूप मङ्गलाचरण है। यहाँपर श्रीकृष्णचैतन्यके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुकी वन्दना होनेपर भी इस श्लोकको विशेष-वन्दनात्मक मङ्गलाचरण कहा गया है, क्योंकि श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुमें स्वरूपतः कोई भी भेद नहीं है, वे दोनों एक ही तत्त्व हैं॥ २॥ ग्रन्थकी प्रतिपाद्य तत्त्ववस्तुका निर्देश; अद्वितीय परमतत्त्व एक ही श्रीगौर-कृष्णका तीन प्रकारसे प्रतीति-भेद :- यदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनुभा य आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांशविभवः। षडैश्वर्यैः पूर्णो य इह भगवान् स स्वयमयं न चैतन्यात् कृष्णाज्जगति परतत्त्वं परमिह ॥ ३ ॥ अनुवाद-उपनिषदोंमें जिनको अद्वैत ब्रह्म कहा जाता है, वे मेरे प्रभुकी अङ्गकान्ति हैं। जिनको योगशास्त्रोंमें आत्मान्तर्यामी पुरुष या परमात्मा कहते हैं, वे मेरे प्रभुके अंशस्वरूप हैं। जिनको ब्रह्म और परमात्माका आश्रय एवं अंशिस्वरूप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् कहा जाता है, मेरे प्रभु वे स्वयं-भगवान् हैं। इसलिये श्रीकृष्णचैतन्यकी अपेक्षा जगत्में और कोई परतत्त्व अर्थात् श्रेष्ठ तत्त्व नहीं है॥ ३॥ अमृतानुकणिका-इस श्लोकमें वस्तु निर्देशरूप मङ्गलाचरण किया गया है॥ ३॥ आशीर्वाद और गौरावतारके बाह्यकारणके वर्णनमें औदार्यविग्रह महावदान्य श्रीगौरका अतुल्य दान :- (विदग्धमाधव १/२)- अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्। हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः ॥ ४ ॥ २ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
१/४-८ ] अनुवाद-सुवर्ण कान्तिसमूहके द्वारा देदीप्यमान शचीनन्दन श्रीगौरहरिकी सदा तुम्हारे हृदय-कन्दरामें स्फूर्ति हो। जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वल-रसका दान चिरकालसे किसी भी अवतारने जगत्को नहीं दिया था, निजभक्तिकी शोभारूपी उसी सम्पत्तिका दान करनेके लिये वे परमकरुणावशतः कलियुगमें अवतीर्ण हुए हैं॥४॥ श्रीगौरावतारके मूल-प्रयोजनके निर्देशमें श्रीराधा, श्रीकृष्ण और उनके मिलित तनु श्रीगौरका तत्त्व-वर्णन :- श्रीस्वरूपगोस्वामि-कड़चा- राधा कृष्णप्रणयविकृतिर्ह्लादिनी शक्तिरस्मा- देकात्मानावपि भुवि पुरा देहभेदं गतौ तौ। चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्द्वयं चैक्यमाप्तं राधाभावद्युतिसुवलितं नौमि कृष्णस्वरूपम् ॥५॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके प्रणयकी विकार अर्थात् प्रेमविलासरूपा ह्लादिनी शक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण स्वरूपतः एक आत्मा होते हुए भी विलासतत्त्वकी नित्यताके कारण श्रीराधा-श्रीकृष्ण नित्यरूपसे दो स्वरूपोंमें विराजमान हैं। वही दो तत्त्व अब एक स्वरूपमें चैतन्य-तत्त्वरूपमें प्रकट हुए हैं, इसलिये श्रीराधाकी भाव और कान्तिके द्वारा सुवलित उन्हीं श्रीकृष्णस्वरूप श्रीगौरसुन्दरको मैं प्रणाम करता हूँ॥५॥ श्रीगौरावतारके मूल प्रयोजनात्मक तीन गुह्य कारण :- श्रीराधायाः प्रणयमहिमा कीदृशो वानयैवा- स्वाद्यो येनाद्भुतमधुरिमा कीदृशो वा मदीयः। सौख्यञ्चास्या मदनुभवतः कीदृशं वेति लोभा- त्त्तद्भावाढ्यः समजनि शचीगर्भसिन्धौ हरीन्दुः॥६॥ अनुवाद-श्रीमती राधिकाके अलौकिक प्रेमकी महिमा कैसी है? वह मेरी अद्भुत मधुरिमा कैसी है, जिसका श्रीमती राधिका आस्वादन करती हैं? मेरी मधुरिमाकी अनुभूतिसे श्रीमती राधिकाको कौनसा अनिर्वचनीय सुख मिलता है? इन तीन विषयोंके प्रति लोभ उत्पन्न होनेपर श्रीकृष्णरूप चन्द्रने शचीगर्भरूप समुद्रसे जन्म ग्रहण किया॥६॥ स्वयंप्रकाश भगवान् श्रीबलदेवस्वरूप श्रीनित्यानन्दतत्त्व और उनको प्रणाम; उनके पाँचरूप :- सङ्कर्षणः कारणतोयशायी गर्भोदशायी च पयोब्धिशायी। शेषश्च यस्यांशकलाः स नित्यानन्दाख्यरामः शरणं ममास्तु॥७॥ अनुवाद-सङ्कर्षण, कारणोदशायी विष्णु, गर्भोदशायी विष्णु, क्षीरोदशायी विष्णु और शेष जिनके अंश और कला हैं, उन्हीं श्रीनित्यानन्द नामक श्रीबलरामकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥७॥ (१) वैकुण्ठमें सङ्कर्षण-रूप :- मायातीते व्यापिवैकुण्ठलोके पूर्णैश्वर्ये श्रीचतुर्व्यूहमध्ये। रूपं यस्योद्भाति सङ्कर्षणाख्यं तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये॥८॥ पहला अध्याय | ३
[ १/८-११
अनुवाद—मायासे अतीत सर्वव्यापक वैकुण्ठलोकमें वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—उस पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त चतुर्व्यूहमें जो सङ्कर्षणरूपसे विराजमान हैं, उन श्रीनित्यानन्दस्वरूप श्रीबलरामके श्रीचरणकमलोंमें मैं शरणागत होता हूँ॥८॥ (२) प्रकृतिपर ईक्षण-कर्त्ता, जीव और जगत्के कारण परमात्मा, कारणोदशायी प्रथम पुरुष :- मायाभर्त्ताजाण्डसङ्घाश्रयाङ्गः शेते साक्षात् कारणाम्भोधिमध्ये। यस्यैकांशः श्रीपुमानादिदेव- स्तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥ ९॥ अनुवाद—जिनके एक अंशस्वरूप मायाके स्वामी, आदि पुरुषावतार, ब्रह्माण्डोंके आश्रयरूप कारणोदशायी विष्णु हैं, उन श्रीनित्यानन्द-बलरामको मैं प्रणाम करता हूँ॥९॥ (३) ब्रह्माण्डान्तर्यामी समष्टि विष्णु, पद्मयोनिके पिता, गर्भोदशायी द्वितीय पुरुष :- यस्यांशांशः श्रील गर्भोदशायी यन्नाभ्यब्जं लोकसंघातनालम्। लोकस्रष्टुः सूतिकाधामधातुस्तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥ १०॥ अनुवाद—जिनके नाभिकमलकी नाल लोकस्रष्टा ब्रह्माजीका सूतिकागृह (जन्मस्थान) और समस्त लोकोंका विश्रामस्थल है, वे गर्भोदशायी विष्णु जिनके अंशके अंश हैं, उन्हीं श्रीनित्यानन्द-बलरामको मैं प्रणाम करता हूँ॥१०॥ (४) विश्व-पालनकर्त्ता क्षीरोदशायी तृतीय पुरुष (५) पृथ्वीधारी शेष :- यस्यांशांशांशः परात्माखिलानां पोष्ठा विष्णुर्भाति दुग्धाब्धिशायी। क्षौणीभर्त्ता यत्कला सोऽप्यनन्त- स्तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥ ११॥ अनुवाद—जिनके अंशांशके अंश सब जीवोंके परमात्मा और पालनकर्त्ता क्षीरोदशायी विष्णु हैं तथा जिन क्षीरोदशायीकी कला पृथ्वीको धारण करनेवाले 'अनन्त' हैं, उन श्रीनित्यानन्द-बलरामको मैं प्रणाम करता हूँ॥११॥ अमृतानुकणिका—ब्रह्माके द्वारा व्यष्टि जीवोंकी सृष्टिके बाद गर्भोदशायी विष्णु अपने एक अंशसे एक-एक रूपमें प्रत्येक जीवके अन्तःकरणमें प्रवेश करते हैं। प्रति जीवके हृदयमें स्थित यह स्वरूप ही प्रत्येक जीवके अन्तर्यामी परमात्मा हैं। गर्भोदशायीकी नाभिसे उत्पन्न नालमें स्थित चौदह भुवनोंमें जो पृथ्वी हैं, उसमें एक क्षीर-समुद्र है और उसमें ये एक स्वरूपसे शयन करते हैं, इसलिये इन्हें क्षीरोदशायी कहा जाता है। ये गर्भोदशायीके अंश होनेसे श्रीनित्यानन्द प्रभुके अंशके अंशके अंशके अंश हैं। क्षीरोदशायी विष्णुका चतुर्भुज रूप है, ये सत्त्व-गुणावतार हैं। धर्मकी स्थापना और अधर्मके नाशके लिये ये ही युगावतार-मन्वन्तरावतारके रूपमें अवतीर्ण होकर जगत्की रक्षा करते हैं, इसलिये इन्हें 'पोष्टा' कहा गया है। इनको तृतीय पुरुष भी कहते हैं॥११॥
४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
१/१२-१४ ] श्रीअद्वैततत्त्व और उनको प्रणाम :- महाविष्णुर्जगत्कर्त्ता मायया यः सृजत्यदः। तस्यावतार एवायमद्वैताचार्य ईश्वरः॥१२॥ अद्वैतं हरिणाद्वैतादाचार्य भक्तशंसनात्। भक्तावतारमीशं तमद्वैताचार्यमाश्रये॥१३॥ अनुवाद—जो जगत्कर्त्ता महाविष्णु मायाके द्वारा इस जगत्की सृष्टि करते हैं, श्रीअद्वैताचार्य-ईश्वर उनके ही अवतार हैं। जो हरिसे अभिन्न तत्त्व होनेके कारण 'अद्वैत' और भक्तिके प्रचारक होनेके कारण 'आचार्य' कहलाते हैं, उन भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्य ईश्वरका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ॥१२-१३॥ पञ्चतत्त्वका स्वरूप और उनको प्रणाम :- पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं भक्तरूपस्वरूपकम्। भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्तशक्तिकम्॥१४॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके भक्तरूप, भक्तस्वरूप, भक्तावतार, भक्त और भक्तशक्ति, इन पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ॥१४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, प्रेमके मूल श्रीअद्वैताचार्य, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी, श्रीराय रामानन्द, श्रीवंशीवदनानन्द, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरूप-सनातन गोस्वामी भ्राताद्वय, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी, श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्रीशिवानन्द सेन, श्रीकविकर्णपूर, श्रीकृष्णदास कविराज, श्रीनरोत्तमदास ठाकुर, श्रीश्रीनिवासाचार्य, श्रीरामचन्द्र कविराज, श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती, श्रीबलदेव विद्याभूषणादि ईश्वर और ईश्वरके भक्तोंको यत्नपूर्वक प्रणाम करते हुए मैं, भक्तिविनोद ठाकुर, श्रीचैतन्यचरितामृतके सार 'अमृतप्रवाह भाष्य' का वर्णन कर रहा हूँ; भक्तगण इसपर विचार करें। गौरकथारूपी समुद्रमें बहते हुए श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी उस अमृतसिन्धुकी एक धार लाये हैं। इस काव्यामृतका पान करनेसे वैष्णवोंके प्राण शीतल होते हैं और इसको बार-बार पान करनेकी उत्कण्ठा जाग्रत हो जाती है। इसका भाष्य लिखनेके लिये इस दीन-अकिञ्चन (भक्तिविनोद) को सभी लोगोंने आदेश दिया, इसलिये साधु लोगोंके आदेशको शीशपर धारण करते हुए इस भाष्यको यत्नके साथ लिखकर साधुओंके हाथोंमें मैंने अर्पित किया है॥१४॥ अनुभाष्य—श्रीराधाकृष्णसे अभिन्न श्रीचैतन्य महाप्रभु रूपानुग जनोंके जीवन हैं। उन महाप्रभु विश्वम्भरके प्रिय श्रीस्वरूपदामोदर हैं। श्रीस्वरूपदामोदरके मित्र श्रीरूप-सनातन (गोस्वामी) हैं। श्रीरूपके प्रिय श्रीरघुनाथ (दास गोस्वामी) हैं और श्रीरघुनाथके प्रिय कवि श्रीकृष्णदास हैं। श्रीकृष्णदास (कविराज गोस्वामी) के प्रिय श्रीनरोत्तम (दास ठाकुर) हैं। श्रीविश्वनाथ (चक्रवर्ती ठाकुर) श्रीनरोत्तमके चरणोंकी आशा करते हैं। भक्तराज श्रीविश्वनाथके प्रति श्रीजगन्नाथ (दास बाबाजो महाराज) श्रद्धावान् हैं। श्रीजगन्नाथके प्रिय श्रीभक्तिविनोद (ठाकुर) हैं। श्रीभक्तिविनोदके प्रिय महाभागवतवर श्रीगौरकिशोर (दास बाबाजी महाराज) हैं, जो सदैव हरिभजनमें ही आनन्दित रहते हैं। ये सब हरिजन गौराङ्ग महाप्रभुके निजजन हैं। उनके उच्छिष्टकी मैं अर्थात् पहला अध्याय | ५
[ १/१४-१६ श्रीवार्षभानवीदयितदास (श्रीवृषभानु महाराजकी पुत्री श्रीराधाजीके प्रिय श्रीकृष्णका दास, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद) कामना करता हूँ। हरिभक्तजनोंकी सेवाकी आशा और भक्तिवृद्धिकी अभिलाषासे मैं अमृतप्रवाह भाष्यके अनुगत होकर, गौरजनोंके शास्त्रोंको देखकर उनके अनुसार रूपानुगमत 'अनुभाष्य' लिख रहा हूँ। ग्रन्थके मङ्गलाचरणके उद्देश्यसे ग्रन्थकारने प्रारम्भमें चौदह श्लोक लिखे हैं, उनमें ग्रन्थकी प्रतिपाद्य वस्तुका निर्देश, श्रोताओंको आशीर्वाद और इष्टदेवको नमस्कार किया है। आदिलीलाके पहले सात अध्यायोंमें क्रमशः इनकी विस्तृत व्याख्या की गयी है॥१४॥ अपने अभीष्ट सम्बन्ध-अधिष्ठाता-देवको प्रणाम :- जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम मन्दमतेर्गती। मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ राधामदनमोहनौ ॥ १५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य- मैं पङ्गु और मन्दमति हूँ; जो मेरी एकमात्र गति हैं और जिनके चरणकमल ही मेरा समस्त धन हैं, वे परम कृपालु श्रीश्रीराधा-मदनमोहन जययुक्त हों ॥ १५ ॥ अनुभाष्य- यह ग्रन्थकारके द्वारा स्वरचित श्लोक है- पङ्गो (स्वपद्भ्यां निजबलेन स्थानान्तरगमनेऽसमर्थस्य) मन्दमतेः (विषयाविष्टस्याल्पधियः अन्याभिलाष-कर्मज्ञानादि साधनोद्यमरहितस्यैकान्तिनः) मम गती ('गम्यते' इति गतिः आश्रयः तथाभूतौ) मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ (मम सर्वस्वरूपे पदाम्भोजे ययोस्तौ), सुरतौ (दयालू मिथोऽत्यन्तनुरक्तौ वा) राधामदनमोहनौ (तत्तदभिधदेवौ) जयतां (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तेताम्) । श्लोक-भावानुवाद- जो मुझ अपने पैरोंसे निजबलपर चलकर जानेमें असमर्थ, श्रीकृष्णसेवासे इतर अभिलाष और कर्म-ज्ञानादि साधनोंके उद्यमसे रहित ऐकान्तिक भक्तिको त्यागकर विषयोंमें आविष्ट अल्पबुद्धिवालेके आश्रय हैं और जिनके चरणकमल मेरे सर्वस्व हैं, वे परम दयालु और परस्पर अत्यन्त अनुरक्त श्रीराधा-मदनमोहन सर्वोत्कृष्ट रूपसे विराजमान हों ॥ १५ ॥ अपने अभीष्ट अभिधेय-अधिष्ठाता-देवको प्रणाम :- दीव्यद्वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः श्रीमद्रत्नागारसिंहासनस्थौ। श्रीश्रीराधा-श्रीलगोविन्ददेवौ प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि ॥ १६ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ज्योतिर्मय-शोभायुक्त वृन्दावनके कल्पवृक्षके नीचे रत्नमन्दिरमें स्थित सिंहासनके ऊपर विराजमान श्रीश्रीराधागोविन्दकी प्रियसखियाँ उनकी सेवा कर रही हैं। मैं उनका स्मरण करता हूँ ॥ १६ ॥ अनुभाष्य-दीव्यद्वृन्दारण्य-कल्पद्रुमाधः (दीव्यति परमोत्कृष्टे मनोहरे वृन्दाविपिने कल्पवृक्षस्य अधोमूले) श्रीमद्रत्नागारसिंहासनस्थौ (परमशोभमयरत्नालयाभ्यन्तरे रत्नसिंहासनावस्थितौ) प्रेष्ठालीभिः (सेवापराभिः श्रीरूपमञ्जर्यादि-परिवृत-श्रीललितादिप्रियनर्मसखीभिः) सेव्यमानौ श्रीश्रीराधा-श्रीलगोविन्ददेवौ [अहं] स्मरामि। श्लोक-भावानुवाद- परमोत्कृष्ट मनोहर वृन्दावनमें कल्पवृक्षके तले, परम शोभामय रत्नालयके भीतर रत्नसिंहासनपर विराजमान (सेवापरायण श्रीरूपादि मञ्जरियों और श्रीललितादि प्रियनर्मसखियों) से परिवेष्टित सेव्यमान् श्रीश्रीराधा-श्रीलगोविन्ददेवका मैं स्मरण करता हूँ ॥ १६ ॥ ६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
१/१७-१९ ] अपने अभीष्ट प्रयोजन-अधिष्ठाता-देवको प्रणाम :- श्रीमान् रासरसारम्भी वंशीवटतटस्थितः । कर्षन् वेणुस्वनैर्गोपीर्गोपीनाथः श्रियेऽस्तु नः॥१७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रासरसके प्रवर्तक वंशीवटके तटपर स्थित होकर श्रीमद्गोपीनाथ वेणुध्वनिके द्वारा गोपियोंको आकर्षित कर रहे हैं। वे हमारे मङ्गलका विधान करें॥१७॥ अनुभाष्य-वेणुस्वनैः (वंशीध्वनिभिः) गोपीः (व्रजगोपवधूः) कर्षन् (कृष्णेतरवासनाः शिथिलीकुर्वन् गृहात् वंशीनिनादरूप प्रेमरज्जुबलेन आनयन्) श्रीमान् (परमशोभामयविग्रहः) रासरसारम्भी (रासरसप्रवर्त्तकः) वंशीवटतटस्थितः (वंशीवटतरोर्मूले अवस्थितः सन् स्वच्छन्दं विहरति सः) गोपीनाथः नः (अस्माकं) श्रिये (प्रेमसम्पत्त्यै) अस्तु (भवतु)। श्लोक-भावानुवाद-अपनी वंशीध्वनिके द्वारा गोपियोंकी कृष्णेतरवासनाको शिथिल करते हुए अर्थात् वंशीनादरूपी प्रेमरज्जुके बलसे घरसे उन्हें अपने निकट लाते हुए परमशोभामय विग्रह, रासरसको आरम्भ (आस्वादन) करनेवाले, वंशीवटवृक्षके मूलदेशमें अवस्थित स्वच्छन्द विचरण करनेवाले वे श्रीगोपीनाथ हमारी प्रेमसम्पत्ति हों॥१७॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ १८ ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥ १८॥ अनुभाष्य-कुछ अन्य संस्करणोंमें यह पद्य नहीं पाया जाता॥ १८॥ गौड़ीय-वैष्णवोंके अभीष्ट आराध्य-तीन विग्रह :- एइ तिन ठाकुर गौड़ीयाके करियाछेन आत्मसात् । ए तिनॆर चरण वन्दौं, तिनॆ मोर नाथ ॥ १९ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमदनमोहन, श्रीगोविन्ददेव और श्रीगोपीनाथ-ये तीन ठाकुर वृन्दावनके अधिदेवता हैं। इन तीनोंने गौड़ीय भक्तोंको अपनी-अपनी सेवामें अधिकार प्रदानकर अपने निजजनके रूपमें अङ्गीकार किया है। (मैं इन तीनोंके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, क्योंकि वे ही मेरे नाथ हैं) ॥१९॥ अनुभाष्य-गौड़ीय वैष्णवोंके सेव्य अष्टादशाक्षर मन्त्र (गोपाल-मन्त्र) में निर्दिष्ट श्रीकृष्ण ही श्रीमदनमोहन, गोविन्द ही श्रीगोविन्ददेव और गोपीजनवल्लभ ही श्रीगोपीनाथ हैं। श्रीमदनमोहन-कृष्णका अनुभव ही ‘सम्बन्ध' है, श्रीगोविन्ददेवकी सेवा ही 'अभिधेय' है और श्रीगोपीजनवल्लभके द्वारा आकृष्ट होना ही 'प्रयोजन' है। श्रीमन्महाप्रभुके उपदेशानुसार तीन तत्त्व सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनतत्त्वके आश्रय भगवद्विग्रह स्वरूप ये तीन ठाकुर श्रीवृन्दावनके अधिदेवता हैं। 'गौड़ीय' शब्दका अर्थ है गौड़-देशसे सम्बन्धित। हिमालयके दक्षिण और विन्ध्याचलके उत्तरमें स्थित भारतवर्षका भाग 'आर्यावर्त्त' कहलाता है। यह पाँच गौड़-देशोंमें विभाजित पहला अध्याय | ७
[ १/१९-२४
है—सारस्वत, कान्यकुब्ज (लक्ष्मणावती-उत्तरप्रदेश स्थित लखनऊ), मध्यगौड़, मैथिल और उत्कलप्रदेश (उड़ीसा)। बङ्गालको भी कई लोग गौड़देश कहते हैं, विशेषतः पूर्वकालमें बङ्गालकी राजधानीका नाम 'गौड़' था। वही पहले गौड़पुर और बादमें श्रीमायापुरके नामसे प्रसिद्ध हुई। जिस प्रकार उत्कलदेशके (उड़ीसाके) भक्तोंको उड़ीया भक्त और द्राविड़देश (दक्षिण भारतके) भक्तोंको द्राविड़ी भक्त कहा जाता है, उसी प्रकार बङ्गालके भक्तोंको भी गौड़ीयभक्तके नामसे जाना जाता है। आर्यावर्त्तके समान दक्षिण भारत भी पाँच द्रविड़ोंमें विभाजित है। कलियुगमें चारों वैष्णव-सम्प्रदायोंके प्रथम आचार्योंने द्रविड़देशमें ही जन्म ग्रहण किया था। श्रीरामानुजाचार्य दक्षिण-आन्ध्रप्रदेशके महाभूतपुरीमें (वर्तमानमें चेन्नईके निकट पेरुम्बुदूर), श्रीमध्वाचार्य मैंगलोर जिलेके विमानगिरिके निकट (वर्तमानमें कर्नाटक राज्यमें उडुप्पी) 'पाजकम्' क्षेत्रमें, निम्बादित्याचार्य दक्षिणापथके मूङ्गेरपत्तन ग्राममें और श्रीविष्णुस्वामी पाण्ड्यदेशमें आविर्भूत हुए थे। यद्यपि श्रीमन्महाप्रभुने श्रीमध्व-सम्प्रदायको स्वीकार किया है, तथापि श्रीमध्वाचार्य-मतके 'तत्त्ववाद' की शाखाका अवलम्बन करनेवाले वैष्णवाचार्य द्राविड़ी हैं। इसलिये श्रीगौरहरिके चरणाश्रित सम्प्रदायको गौड़ीय कहा जाता है। विशेषतः 'श्रीआनन्दतीर्थ पूर्णप्रज्ञ मध्वाचार्य' का एक अन्य नाम श्रीगौड़पूर्णानन्द भी था, इसलिये भी श्रीगौर-भक्तोंको माधव-गौड़ीय-नामसे जाना जा सकता है॥१९॥
प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे स्वकृत मङ्गलाचरणकी व्याख्या :- ग्रन्थेर आरम्भे करि 'मङ्गलाचरण'। गुरु, वैष्णव, भगवान्—तिनेर स्मरण॥२०॥
तीनों आराध्योंके स्मरणसे अभीष्ट सिद्धि :- तिनेर स्मरणे हय विघ्नविनाशन। अनायासे हय निज वाञ्छितपूरण॥२१॥ से मङ्गलाचरण हय त्रिविध प्रकार। वस्तुनिर्देश, आशीर्वाद, नमस्कार॥२२॥ अनुवाद—इस ग्रन्थके प्रारम्भमें श्रीगुरु, वैष्णवों और श्रीभगवान्—इन तीनोंको स्मरणकर 'मङ्गलाचरण' कर रहा हूँ। इन तीनोंका स्मरण समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाला और अनायास ही समस्त इच्छाओंकी पूर्ति करनेवाला है। इस मङ्गलाचरणमें ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषयका निर्धारण, आशीर्वाद प्रदान और नमस्कार, ये तीन क्रियाएँ अन्तर्हित हैं॥२०-२२॥
चौदह श्लोकोंमें ग्रन्थकारके द्वारा मङ्गलाचरण :- प्रथम दुइ श्लोके इष्टदेव-नमस्कार। सामान्य-विशेष-रूपे दुइ त' प्रकार॥२३॥ तृतीय श्लोकेते करि वस्तु निर्देश। याहा हैते हय परतत्त्वेर उद्देश॥२४॥
८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
१/२३-३३ ] चतुर्थ श्लोकेते करि जगते आशीर्वाद। सर्वत्र मागिये कृष्णचैतन्य-प्रसाद ॥ २५ ॥ सेइ श्लोके कहि बाह्यावतार-कारण। पञ्च षष्ठ श्लोके कहि मूल-प्रयोजन ॥ २६ ॥ एइ छय श्लोके कृष्णचैतन्येर तत्त्व। आर पञ्च श्लोके नित्यानन्देर महत्त्व ॥ २७ ॥ आर दुइ श्लोके अद्वैत-तत्त्वाख्यान। आर एक श्लोके पञ्चतत्त्वेर व्याख्यान ॥ २८ ॥ एइ चौद्द श्लोके करि मङ्गलाचरण। तँहि मध्ये कहि सब वस्तुनिरूपण ॥ २९ ॥ सब श्रोता-वैष्णवेरे करि' नमस्कार। एइ सब श्लोकेर करि अर्थ-विचार ॥ ३० ॥ सकल वैष्णव, शुन करि' एकमन। चैतन्य-कृष्णेर शास्त्रे येमत-निरूपण ॥ ३१ ॥ अनुवाद-मैंने प्रथम दो श्लोकोंके द्वारा सामान्य और विशेष-दो प्रकारसे इष्टदेव (श्रीकृष्णचैतन्य) को नमस्कार किया है। तृतीय श्लोकमें प्रतिपाद्य विषय-वस्तुको निर्देश किया है, जिसका उद्देश्य परमतत्त्वका निरूपण है। चतुर्थ श्लोकमें श्रीकृष्ण-चैतन्यके चरणोंमें कृपाभिक्षा करते हुए समस्त जगत्को आशीर्वाद प्रदान करनेकी प्रार्थना कर रहा हूँ। इसी श्लोकमें उनके अवतारके बाह्य-कारणको भी बतलाया है। पाँचवें और छठे श्लोकमें उनके अवतारके मुख्य-कारण (आन्तरिक प्रयोजन) का उल्लेख किया है। इस प्रकार इन छह श्लोकोंके द्वारा मैंने श्रीचैतन्य महाप्रभुके तत्त्वका निरूपण किया है और अगले पाँच श्लोकोंमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाका वर्णन किया है। अन्य दो श्लोकोंमें श्रीअद्वैततत्त्व और अगले एक श्लोकमें श्रीपञ्चतत्त्वकी व्याख्या प्रस्तुत की है। इस प्रकार मङ्गलाचरणरूपी चौदह श्लोकोंमें सम्पूर्ण परमवस्तुका निरूपण किया है। समस्त वैष्णव श्रोताओंको प्रणामकर इन सब श्लोकोंके गूढ़ार्थके विचारमें प्रवृत्त हो रहा हूँ। सभी वैष्णवजनोंके चरणोंमें यह प्रार्थना है कि वे एकाग्रचित्तसे श्रीकृष्णचैतन्यका शास्त्रोचित निरूपण श्रवण करें ॥ २३-३१ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चैतन्यस्वरूप श्रीकृष्णके सम्बन्धमें शास्त्रोंमें जिस प्रकार निरूपण किया गया है ॥ ३१ ॥ पूर्वोक्त चौदह श्लोकोंकी व्याख्या आरम्भ; प्रथम श्लोककी व्याख्या :- कृष्ण, गुरुद्वय, भक्त, अवतार, प्रकाश। शक्ति-एइ छयरूपे करेन विलास ॥ ३२ ॥ एइ छय तत्त्वेर करि चरण वन्दन। प्रथमे सामान्ये करि मङ्गलाचरण ॥ ३३ ॥ पहला अध्याय ९