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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

यह ग्रन्थ १५१२ शकाब्दमें रचित हुआ था। अतएव १५१२ शकाब्दके बादमें ही उनके ग्रन्थकी रचना हुई। श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकका रचनाकाल १४९८ शकाब्द है। राढ़ीय श्रीनिवासके (?) १४८९ शकाब्दके बाद तथा राघवानन्दके 'दिनचन्द्रिका' १५२१ शकाब्दसे पहले 'अष्टाविंशतितत्त्व'-प्रणेता स्मार्त्त रघुनन्दनके द्वारा रचित 'एकदशीतत्त्व', 'मलमासतत्त्व'से उद्धृत-वचन आदिका उल्लेख भी उनके ग्रन्थमें देखा जाता है। इसलिये इन सभी ग्रन्थोंके परवर्ती कालमें ही श्रीचैतन्यचरितामृत लिखा गया है। श्रीगौरसुन्दरके पार्षद-प्रवर श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने अपने 'दानचरित' ग्रन्थके अन्तमें श्रीकृष्णदासका नाम उल्लेख किया है। श्रीकृष्णदास द्वारा रचित 'श्रीगोविन्दलीलामृत' ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें वृन्दावनवासी गोस्वामी-गोपालभट्ट आदिकी समसामयिकता प्रकटित हुई है। इन सभी तथ्यों तथा अन्यान्य समसामयिक कार्योंसे ऐसा अनुमान होता है कि उनका प्रकटकाल अनुमानतः १४५२ से १५३८ शकाब्द तक होनेकी सम्भावना है। १४३२ शकाब्दके बाद श्रीवृन्दावनदास ठाकुरका आविर्भाव काल है। यह महाग्रन्थ—उनके द्वारा रचित ग्रन्थका परिशिष्टस्वरूप है। और फिर, १४३५ शकाब्दसे पहले ही श्रीजीवगोस्वामी प्रभुका आविर्भाव काल है। ग्रन्थरचना-कालके वृन्दावनवासी समसामयिक भक्तोंकी तालिकासे जाना जाता है कि उस समय गदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य अनन्ताचार्यके शिष्य श्रीगोविन्ददेवकी सेवाके अध्यक्ष पण्डित श्रीहरिदास, काशीश्वर गोस्वामीके शिष्य गोविन्दके प्रिय सेवक गोविन्द-गोस्वामी, श्रीरूपगोस्वामीके सङ्गी यादवाचार्य गोस्वामी, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य भूगर्भ गोस्वामीके शिष्य गोविन्ददेवके पुजारी चैतन्यदास, मुकुन्दानन्द-चक्रवर्ती, प्रेमविग्रह कृष्णदास, श्रीअद्वैतप्रभुके शिष्य शिवानन्द-चक्रवर्ती, गोसाञिदास पुजारी आदि वैष्णवगण वर्तमान थे। ग्रन्थ-रचनाके समय श्रीजीव, श्रीगोपालभट्ट, श्रीरघुनाथदास, श्रीरघुनाथभट्ट, श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामी—ये छह गोस्वामी अथवा श्रीभूगर्भ गोस्वामी आदि कोई भी वर्तमान नहीं थे। यदि उनमेंसे कोई प्रकट होते, तो उनसे अनुमति-ग्रहण करने आदिका उल्लेख अवश्य होता। “ग्रन्थकारका वर्ण अथवा जाति” ग्रन्थकारके वर्ण निरूपणमें भी अनेक मतभेद देखे जाते हैं। श्रीकृष्णदास 'श्रीगोविन्दलीलामृत'-नामक एक अति बृहद् संस्कृत काव्यग्रन्थकी रचना करके वैष्णवसमाजमें 'कविराज' नामसे प्रसिद्ध हुए। गौड़देशमें ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य—ये तीन जातियाँ बहुत दिनोंसे सुशिक्षित-श्रेणीके नामसे परिचित हैं। नवशाखा* और उनके वर्णसमूहका विद्यानुशीलनमें अधिक दक्षता प्रदर्शित न करनेपर भी उनकी सामाजिक-मर्यादाके मध्यम-स्तरके विषयमें कोई प्रतिवाद नहीं हो सकता। इस जातिके लोग विद्या-व्यवसायके स्थानपर वस्तुओंके क्रय-विक्रय और सामाजिक अनुष्ठानके सहायक कर्मोंमें नियुक्त हैं। उनके वस्तु-द्रव्यरूपी व्यवसाय और श्रम-कर्मजीवनकी आनुष्ठानिक *खाद्य मसालोंके व्यापारी, माला बनानेवाले, बुनकर या जुलाहे, ग्वाले, नाई, पनवाड़ी, लोहार, कुम्हार और हलवाई—ये नौ हिन्दु जातियाँ 'नवशाखा'के नामसे जानी जाती हैं। iv | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

क्रियाएँ आदि कभी भी निन्दनीय द्रव्य अथवा कर्मके रूपमें विवेचित नहीं हुई हैं। परन्तु निन्दनीय द्रव्य-व्यवसायी और हीनकर्मोंसे जीविका उपार्जन करनेवाले निम्न-व्यवसायावलम्बियोंकी सामाजिक स्तरकी श्रेष्ठता हिन्दु समाजमें स्वीकृत नहीं हुई है। श्रीकृष्णदासके वर्णके सम्बन्धमें विभिन्न मतोंका पोषण करनेवाले व्यक्ति तीन (ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य) उच्च वर्णोंमेंसे किसी एक कुलमें उनके आविर्भूत होनेके विषयमें अपना-अपना विचार प्रदर्शित करते हैं। साहित्य और अलङ्कारादि कलापुष्ट काव्यशास्त्रके विद्वान लोकविचारसे अपनी पारदर्शिताके फलस्वरूप 'कविराज'-नामसे ख्याति प्राप्त करते थे। चिकित्साशास्त्र-कुशल सम्प्रदायमें भी अनेक स्थानोंपर 'कविराज'-संज्ञा प्रदान होने से, कोई-कोई श्रीकृष्णदासको 'वैद्य' भी कहते हैं। दर्शनशास्त्रमें इनकी अगाध दक्षता और श्रुति-स्मृति-न्याय-तीन प्रस्थानोंमें इनका असामान्य अधिकार और प्रतिभा देखकर इनको ब्राह्मणकुलमें आविर्भूत समझना भी प्रतिवाद करने योग्य नहीं है। पूर्वाश्रममें वास करते हुए [महाप्रभुकी आज्ञासे पिताजीकी सम्पत्तिकी देखभाल करते समय] श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके बुद्धि-कौशलादि मर्यादापूर्ण वाक्योंसे और वैषयिक कूटबुद्धिके निजश्रेणी-सम्पर्कित-ज्ञानसे [अर्थात् विषयोंमें लिप्त दुर्बुद्धिके कारण ग्रन्थकार श्रीकृष्णदासको अपने समान मानकर] आदरकी शिथिलताके विचारसे भी उनको कायस्थ कुल भास्कर प्रतिभावित कुलचन्द्रके रूपमें अर्थात् कायस्थकुलके सूर्यरूपी श्रीरघुनाथदास गोस्वामीसे प्रतिभावित कायस्थकुलके चन्द्ररूपमें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीको धारण करना भी नितान्त असङ्गत नहीं है। 'साहित्यदर्पण'-नामक प्रसिद्ध अलङ्कार-ग्रन्थके प्रणेता त्रैलङ्गदेशीय श्रीनरहरितीर्थके पूर्वाश्रमस्थ कुलचन्द्र विश्वनाथ-कविराज आन्ध्र पञ्च-ब्राह्मण समाजके ही एक व्यक्ति हैं; और 'काव्यप्रकाश'-नामक अलङ्कार शास्त्रके अध्यापक शूद्र रामदास, बङ्गला भाषामें महाभारतके विवरणकी रचना करने वाले काशीरामदास और भरतमल्लिकादि गौड़ीय साहित्यिकजनोंके वर्ण निरूपणमें भी ऐसा मतभेद देखा जाता है।

“ग्रन्थकारका आश्रम”

ग्रन्थकारके आश्रम विचारसे हम उनको श्रीमदनगोपालके सेवकरूप कुलमें ही स्थित जानते हैं। उनकी कुलोचित विष्णुभक्ति-जो उनके भाईके परिचयसे अभिव्यक्त हुई है, उसके द्वारा भाईके साथ उनका संसारमें एकत्र रहनेका विच्छेद हुआ था। वे झामटपुरमें अपने घरपर रहते समय गृहस्थ थे या नहीं, इस विषयमें उन्होंने कुछ भी उल्लेख नहीं किया है। अपने कनिष्ठ भ्राताको श्रीनित्यानन्दके प्रति श्रद्धाविहीन देखकर उसके भावी सर्वनाशको देखा। सर्वनाश-शब्दसे भक्तिहीनता अर्थात् मायावादी बन जाना लक्षित होता है। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञासे उनका समस्त अनर्थोंसे निवृत्त होकर वृन्दावन-गमन ही आश्रमान्तर-प्राप्तिका उज्ज्वल दृष्टान्त है। पूर्वाश्रममें अवस्थान करते समय उनके आश्रम-निर्णयमें भी मतभेद देखा जाता है। कोई-कोई कहते हैं कि ब्रह्मचर्यसे सहसा श्रीवृन्दावन जानेवाले पथका यात्री बनना सहज है; अन्यथा काँटोंसे पूर्ण संसारके बन्धनको छिन्न-भिन्न करनेके प्रसङ्गमें हमें कविराज गोस्वामीसे अनेक बातें

भूमिका | V

ही सुननेको मिलतीं। अन्य विचारसे ऐसी युक्ति भी प्रदर्शित होती है कि सांसारिक विषयोंका वर्णन विशेषतः अपनी भोगमयी धारणाकी स्मृति भजनपथके पथिकके लिये उचित नहीं है, इसलिये कविराजने अपनी दुस्तज्य सांसारिक बातोंकी चर्चा नहीं की। जो भी हो, श्रीवृन्दावन-गमनके बादमें वे गृहकथाके प्रति उदासीन होकर हरिकथामें मग्न थे; वह तृतीय (वानप्रस्थ) या चतुर्थ (संन्यास) आश्रमोचित हरिभजन परायण जीवन है। आश्रमातीत निष्किञ्चन पारमहंस्य-अवस्थामें ही ग्रन्थकारके द्वारा इस ग्रन्थकी रचना हुई है। “ग्रन्थकारके स्वजन” श्रीकृष्णदास-वे अपने पारमार्थिक आत्मीय-समाजमें ‘कविराजगोस्वामी’-नामसे प्रसिद्ध हैं। ठाकुर श्रीनरोत्तमदासने उनको वृन्दावनके रसिक भक्तोंका ‘केन्द्र’ कहकर अभिहित किया है। श्रीचरितामृतके प्रत्येक अध्यायके अन्तमें उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके नितान्त अनुगतजनके रूपमें अपना आत्म-परिचय दिया है। श्रीकविराज गोस्वामी अपने प्रकटकालमें ‘श्रीरूपानुगवर’के नामसे प्रसिद्ध थे। अन्तरङ्ग भक्तमण्डलीके वे गुरुदेव हैं। श्रीनरोत्तमदास ठाकुरमें श्रीकृष्णदासका आनुगत्य सुन्दर रूपसे प्रतिफलित हुआ है। ब्रजवासी षड्गोस्वामियोंको उन्होंने अपना ‘गुरु’ कहकर निर्देश किया है। श्रीनित्यानन्द प्रभु-जगद्गुरु हैं तथा श्रीकृष्णदासको ‘श्रीराधागोविन्द’की सेवा प्रदान करने वाले हैं। उन्हींकी कृपासे उन्होंने श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीरघुनाथदास और श्रीजीवकी कृपा प्राप्तकी थी। वे तात्कालिक वृन्दावनवासी भक्तोंके प्राणस्वरूपमें वर्तमान थे। श्रीकृष्णदास श्रीचैतन्यदेवके द्वितीय स्वरूप श्रीदामोदरस्वरूपके एकान्त अन्तरङ्ग श्रीदासगोस्वामी प्रभुके प्रति नितान्त अनुरक्त थे। यौन-सम्बन्ध और प्राकृत परिचयके सम्बन्धमें उन्होंने केवलमात्र गुरुद्रोही भ्राता-सङ्गके त्यागकी घटनाका ही उल्लेख किया है, अन्य सभी विषयोंमें वे मौन हैं। श्रीचैतन्यचन्द्रके भक्तोंके अतिरिक्त उनमें अन्य किसीके भी प्रति अपने आत्मीय-स्वजन होनेका ज्ञान नहीं था। “ग्रन्थकारका स्वभाव” श्रीकृष्णदासके वैष्णवोचित स्वभावकी तुलना नहीं है। वैराग्यके चरम आदर्श श्रीदासगोस्वामी प्रभुको वे जिस प्रकार सहृदय आराध्य रूपसे मानते थे, वह बात श्रीदासगोस्वामीकी स्नेहसिक्त-लेखनीमें और श्रीकृष्णदासकी अपनी रचनाओंमें स्वर्णाक्षरोंमें देदीप्यमान है। पाण्डित्य-प्रतिभामें प्रचुर परिमाणमें समृद्ध होनेपर भी कायमनोवाक्यसे उनके दैन्यके आदर्शने जगत्के उस प्रकारके सभी आदर्शोंको ही निर्विवाद भावसे पराभूत किया है। जब भी श्रीचैतन्यचरितामृतके पाठक ग्रन्थकारके असामान्य निज परिचयकी बातकी आलोचना करते हैं, तब उन पाठकोंकी जितनी भी अहंकारसे पुष्ट बुद्धि क्यों न हो, तो भी यह निश्चित रूपसे कहा जा सकता है कि सभी प्रकारके पाठकोंमें ही सिर झुकाकर दैन्य ग्रहण करनेकी स्पृहा बलवती होगी। vi | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

श्रीचैतन्यदेव-कथित 'तृणादपि'-श्लोकमें सुदीक्षित इन महत्तम ग्रन्थकारके द्वारा रचित कुछ पंक्तियोंको उद्धृत करनेका लोभ मैं सम्वरण नहीं कर पाया। उन्होंने लिखा है— “जगाइ माधाइ हैते मुञिसे पापिष्ठ। पुरीषेर कीट हैते मुञिसे लघिष्ठ॥ मोर नाम सुने येइ, तार पुण्य क्षय। मोर नाम लय येइ, तार पाप हय॥” (आदि ५/२०५-२०६) ग्रन्थकार श्रीचैतन्यके ऐकान्तिक भक्त हैं, इसलिये परम-वैष्णव हैं। वैष्णवोंके शरीरमें सभी महान् गुण सदैव विराजमान रहते हैं अर्थात् वैसे सर्वगुणसम्पन्न व्यक्ति ही वास्तवमें वैष्णव हैं। कविराज गोस्वामीने इस ग्रन्थकी मध्य-लीलाके बारहवें अध्यायमें (७५ संख्यासे ७७ संख्या तक) इन छब्बीस गुणोंका इस प्रकार वर्णन किया है— “कृपालु, अकृतद्रोह, सत्यसार-सम। निर्दोष, वदान्य, मृदु, शुचि, अकिञ्चन॥ सर्वोपकारक, शान्त, कृष्णैकशरण। अकाम, निरीह, स्थिर, विजित-षड्गुण॥ मितभुक्, अप्रमत्त, मानद, अमानी। गम्भीर, करुण, मैत्र, कवि, दक्ष, मौनी॥” उनके अपने चरित्रमें और अनुष्ठानमें यह आदर्श परिस्फुट है एवं उनकी लेखनीकी प्रत्येक पंक्तिमें उनकी कृष्णैकशरणता देखी जाती है। उनके असीम अकृतद्रोहिता, मित्रता, मानदत्व, अमानिता, अकामता, कृपालुता, वदान्यता, सर्वोपकारकता और कारुण्यादि गुण ग्रन्थकी प्रत्येक उक्तिमें ही पाठकोंका चित्त आकर्षित करते हैं। बाह्यजगत्की वस्तुकामनामें चेष्टा-राहित्य, स्थिरता, शौच, अकिञ्चनता, शान्ति और इन्द्रिय-तर्पणके प्रतिकूलमें उनकी समता, सत्यसारता, निर्दोषिता, अप्रमत्तत्व, गाम्भीर्य, मौनित्व, मृदुता, दक्षता, काव्य और षड्‌वेग-विजयित्व जाज्वल्यमान हैं। उनकी पाकशास्त्र-कुशलता और भगवत्सेवामें अनेक प्रकारके परमास्वादपूर्ण वस्तु अर्पण करनेकी प्रवृत्ति-उदर और जिह्वा-लम्पट व्यक्तियोंके ईर्ष्या-मात्सर्य-दमनकी एकमात्र महा-औषधि है; तथापि भाग्यहीन लोग अपने दुर्भाग्यवशतः भवरोग-नाशक वैद्यकी चिकित्सा प्रणालीमें दोष दर्शन करते हैं। इसी वैष्णव ईर्ष्याके फलस्वरूप उनके प्रति भगवद्-दण्ड (माया-बन्धन) है।

“ग्रन्थकारकी दक्षता”

श्रीचैतन्यदेवकी लीला वर्णन करनेमें हम श्रीकृष्णदासकी सभी शास्त्रोंमें अगाध पाण्डित्य-प्रतिभा, अति गहराईसे पारमार्थिक-दर्शनमें असामान्य प्रवेश और लोकबोध्य करानेकी अभूतपूर्व सूक्ष्मविचार दक्षता एवं काव्य, पुराण, इतिहास, स्मृति और गणित-पारदर्शिताका दर्शन करके विस्मित होते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे अलौकिक साहित्यका पाठ करनेके लिये पृथ्वीके

भूमिका | vii

विभिन्न प्रदेशीय विद्वत्-समाज किसी-न-किसी दिन बङ्गला भाषामें अधिकार प्राप्त करनेमें उन्मुखी होंगे। कविराज गोस्वामीकी पाकरचना-कार्यमें कुशलता गुणी व्यक्तियोंसे मुक्तकण्ठसे प्रशंसाका आकर्षण करती है। उनकी भावमाधुर्य-पराकाष्ठा जगत्के विभिन्न काव्य-समाजकी परमलोभनीय रीति है। बौनेका प्रबल इन्द्रियचाञ्चल्यसे उठा हुआ छोटासा हाथ परम उच्च गगनभेदी माधुर्य-ऐश्वर्यको स्पर्श करनेमें समर्थ नहीं होनेपर भी उस बौनेके समान जड़रस-प्रमत्त विलासपर व्यक्ति प्रेममय कविराज गोस्वामीके प्रशंसक बने बिना रह नहीं सकते। मधुररस-वर्णनमें उनके गाम्भीर्यको माँपने वाले अधिकारी भी दुर्लभ हैं। ग्राम्यरस-रसिक सिद्धान्तविरोधी मतवाद लेकर इस ग्रन्थकी आलोचना करनेपर विषम विरसरूप कीचड़में निमग्न होते हैं।

“ग्रन्थका फल”

श्रीचैतन्यचरितामृतके लेखकने अपने ग्रन्थमें एक ही साथ महाप्रभुकी लीला-सहित परम निगूढ़ तत्त्वशास्त्रका अपूर्व समावेश प्रदर्शन करके पाठकके लघुहृदयकी जड़भोग-तात्पर्यपरताका ह्रास किया है। केवलमात्र विचार-परायण तत्त्व-आलोचनाका गुरुभार (बहुत बड़ा भार) पाठकके मस्तिष्कमें बैठानेकी चेष्टा करनेपर उनके इस अलौकिक निबन्धके पाठक मिलना कठिन होता। और, कुतर्कपूर्ण जड़विचारप्रिय लोगोंकी उनके सिद्धान्त-विपर्ययसे रक्षा करनेके लिये चरितामृतकी विषयमालाने जो उपकार किया है, उस विषयमें कुछ कहना ही बाहुल्यमात्र है। लोक-परम्परा-पाठकोंके रुचिगत विवर्त्तवाद पोषणकी विषम-पकड़से विद्वान कहे जानेवाले लोगोंका परित्राण-कार्यरूप दयाका यही एक अद्भुत चित्र है। गृह-धर्मपर ग्राम्यकाव्यसुखामोदी (लौकिक काव्योंमें ही सुख प्राप्त करने वाले) व्यक्ति मधुर-रसाभास-प्राप्तिके लिये जिस लोभके वशवर्ती हैं, उसी प्रकारके विषयोंके छलके द्वारा पाठकोंको वैकुण्ठतक उठानेका कार्य ग्रन्थकारकी अचिन्त्य शक्ति है। वैष्णवसेवा-वञ्चित भोग-परायण ग्राम्यरस-निपुण इन्द्रियसुख-लिप्त सम्प्रदाय श्रीचरितामृतके पद गान करके भी विषयरसमें मत्त होकर किस प्रकार अपने-अपने अपकार-साधनमें सिद्धहस्त (दक्ष) हुए हैं, उसको कहना ही बाहुल्य है; और उस एक ही विषयको अवधारण करनेसे भाग्यवान् वैष्णवसेवा-रत लोग विषयरूपी कीचड़से निकलकर सद्गतिको प्राप्त हुए हैं। कहाँ तो नरकके समान विषय-पिपासाकी यन्त्रणा और कहाँ अमृतपानसे मृत्यमय जगत्की यन्त्रणामय वायुके सङ्कोचवशतः वैकुण्ठकी समीरसे सञ्जीवित होनेका सौभाग्यलाभ ? इसलिये इस ग्रन्थको पण्यद्रव्य अर्थात् क्रय-विक्रयवाली लौकिक वस्तुके समान दग्धोदरपूरण-इन्द्रियविलाससम्भार अर्थात् उदरपूर्ति आदि करनेवाली इन्द्रियविलासकी सामग्रीके आकर्षणसे आकृष्ट होकर इस ग्रन्थके पाठके द्वारा स्वयंको 'साधु' कहलाकर प्रतिष्ठा लाभ करनेका प्रयास एक ही साथ भगवद्विमुखताके साथ लोकवञ्चना और आत्मवञ्चना-मात्र है। जिसकी जो प्रार्थना है, ग्रन्थानुशीलनरूप कल्पतरुके सेवनसे उसको उसकी प्राप्ति होती है। मधुरसके भावसमूह-वर्णनके समय अपार गाम्भीर्यने इस ग्रन्थकी मर्यादाको प्रचुर परिमाणमें

viii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

सम्वर्धन किया है। विरोध-बुद्धिसे अपसम्प्रदायके लोग जिस आख्यायिका अर्थात् कहानीके छलसे श्रीजीवगोस्वामीके द्वारा इस ग्रन्थके असम्मानकी कल्पना करते हैं, उसके द्वारा भी ग्रन्थका यश-सौरभ सभी दिशाओंमें व्याप्त हुआ है। ऐसे कपटी लोगोंके अपराधमय काल्पनिक वाक्यरूपी अनेक अत्याचार, जैसे—'अपनी प्रतिष्ठा लघु होनेके भयसे श्रीजीवगोस्वामीने ईर्ष्या-परवश होकर इस ग्रन्थकी मूल प्रतिलिपिको यमुना नदीमें फेंक दिया आदि', वस्तुतः श्रीचैतन्यचरितामृत और षट्सन्दर्भ पाठकोंके निकट कोई कुफल उत्पादन नहीं कर पाये; पक्षान्तरमें, उसके द्वारा उनकी नीचता, वैष्णव-विद्वेष और गुरुद्रोहाितारूप इन्द्रिय-चाञ्चल्य ही सुष्ठु भावसे प्रकाशित हुए हैं। श्रीजीवगोस्वामीके प्रति भक्तिविद्वेषी कपट-सम्प्रदायका विद्वेष स्वकीय और पारकीय विचारके तर्कके आश्रयमें अथवा दिग्विजयीके दमनके उपलक्ष्यमें श्रीकृष्णदासके तथा उनके ग्रन्थोंके प्रति पाठकोंमें रुचिविकार उत्पादन करनेमें समर्थ नहीं हुआ, अपितु उसने इन आचार्योंके सम्मानको परिपोषण करके एक प्रकारसे षड्गोस्वामियोंकी श्रीचैतन्य-सेवाके सौन्दर्यको ही सम्वर्द्धित किया है। “ग्रन्थके उपकरण” भक्तितत्त्वके अनुकूल श्रीचैतन्य-लीलाका वर्णन करते हुए ग्रन्थकारने किस-किस उपकरणके बलसे इस अपूर्व ग्रन्थको पाठकोंके लिये सहज-उपलब्ध करा दिया है, उसकी एक संक्षिप्त सूची यहाँपर उपस्थित करना अप्रासङ्गिक नहीं है। लीला-विषयके उपकरणरूपमें हम देखते हैं कि, आदिलीलाका मूल ग्रन्थ—श्रील वृन्दावनदास ठाकुर-रचित श्रीचैतन्यमङ्गल अथवा श्रीचैतन्यभागवत है। श्रीमुरारीगुप्तका श्रीचैतन्यचरित-नामक संस्कृत कड़चा, श्रीलोचनदासका श्रीचैतन्यमङ्गल तथा श्रीचैतन्यदास-रचित श्रीचैतन्यचरितामृत-नामक महाकाव्य उस समय लिखित होनेपर भी श्रील कविराज गोस्वामी इन सब ग्रन्थोंपर निर्भर नहीं थे। अन्यान्य कुछ आधुनिक या परवर्ती कालमें लिखित ग्रन्थोंको (जैसे, जयानन्दका चैतन्यमङ्गल, गोविन्ददासका कड़चा, वंशीशिक्षा, अद्वैतप्रकाश, नित्यानन्दवंश-विस्तार आदिको) 'प्राचीन' रूपसे निर्देश करनेमें हमारी प्रवृत्ति नहीं होती है; विशेषतः उनके तत्त्व और सिद्धान्तका विपर्यय, मूल उद्देश्यमें सङ्कीर्णता प्रतिपादन करनेका प्रयास और शिक्षाका अभाव आदिको लक्ष्य करके श्रीचैतन्यचरितामृतके 'मूल-ग्रन्थ'के रूपमें इन अपग्रन्थोंको कोई भी स्वीकार नहीं करता। श्रीकविकर्णपूर-रचित श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक, श्रीरघुनाथदासके द्वारा कण्ठस्थ श्रीदामोदर स्वरूपका कड़चा, तात्कालिक श्रीवृन्दावनवासी-गोस्वामियोंके तथा उनके सङ्गियोंके सङ्गत वाक्योंकी आलोचना और कुछ प्राचीन पद ग्रन्थकारके प्रधान अवलम्बन थे। श्रीगौरसुन्दरके प्रचारित सिद्धान्त और प्रेमभक्ति-तत्त्वको सुयोग्यतापूर्वक वर्णन करते हुए उन्होंने वेद (संहिता, उपनिषद्, तापनी), सूत्रग्रन्थ, पञ्चरात्र, पुराण, धर्मशास्त्र, पूर्वाचार्य-रचित ग्रन्थ और अन्यान्य बहुविध ग्रन्थोंको उपकरणस्वरूपमें ग्रहण किया है। भूमिका | ix

“ग्रन्थके उपकरणोंकी सूची” लीला-विषयक उपकरण— (१) चैतन्यचन्द्रोदय-नाटक, (२) चैतन्य भागवत (३) दामोदर स्वरूपका कड़चा (श्रीरघुनाथदास गोस्वामीको कण्ठस्थ), (४) वृन्दावनवासी गोस्वामीगण और उनके सङ्गियोंके द्वारा आलोचित पदसमूह। वेद— (क) संहिता—(१) ऋक्, (२) यजु; (३) साम और (४) अथर्व। (ख) उपनिषद्—(१) ईश, (२) ऐतरेय, (३) कठ, (४) श्वेताश्वतर, (५) बृहदारण्यक, (६) तैत्तिरीय, (७) प्रश्न, (८) छन्दोग्य, (९) माण्डुक्य, (१०) मुण्डक और (११) केन। (ग) तापनी—(१) गोपाल, (२) नृसिंह। सूत्र (दर्शन)— (१) न्याय, (२) पातञ्जल, (३) वेदान्त, (४) वैशेषिक, (५) मीमांसा और (६) सांख्य। पञ्चरात्र— (१) कात्यायन-संहिता, (२) नारद-पञ्चरात्र, (३) गौतमीय-तन्त्र, (४) सात्वत-तन्त्र, (५) तन्त्रवचन, (६) वैष्णवतन्त्र, (७) ब्रह्मसंहिता, (८) सर्वज्ञ-सूक्त, (९) सिद्धार्थ-संहिता, (१०) स्मृतिवचन और (११) हयशीर्ष-पञ्चरात्र। पुराण और भारत— (१) आदिपुराण, (२) इतिहास-समुच्चय, (३) उपपुराण, (४) कूर्मपुराण, (५) गरुड़पुराण, (६) नृसिंहपुराण, (७) पद्मपुराण, (८) विष्णुधर्मोत्तर, (९) विष्णुपुराण, (१०) बृहन्नारदीयपुराण, (११) ब्रह्मवैवर्त्तपुराण, (१२) ब्रह्माण्डपुराण, (१३) स्कन्दपुराण, (१४) श्रीभागवत, (१५) गीता, (१६) महाभारत, (१७) सहस्रनाम और (१८) हरिभक्तिसुधोदय। धर्मशास्त्र— मन्वादि बीस धर्मशास्त्र। पूर्वाचार्य-रचित ग्रन्थ— (१) कृष्णकर्णामृत (बिल्वमङ्गल-कृत), (२) नामकौमुदी (लक्ष्मीधर-कृत), (३) भागवत-तात्पर्य (श्रीमध्व-कृत भागवत टीका), (४) श्रीरामानुज-भाष्य (५) भावार्थ-दीपिका (श्रीधर-कृत भागवतकी टीका), (६) महाभारत-तात्पर्य (श्रीमध्व-कृत), (७) महाभारतीय उद्योगपर्वके श्रीधरस्वामीके द्वारा उद्धृत श्लोक, (८) मुकुन्दमाला-स्तोत्र (श्रीकुलशेखर-कृत), (९) यामुनाचार्यपादोक्त पद्यावली, (१०) श्रीधर-कृत तन्त्रवचन, (११) सर्वज्ञसूक्त और (१२) स्तोत्ररत्न (श्रीयामुनाचार्य-कृत)। गोस्वामि-रचित ग्रन्थ— (१) आर्यशतक, (२) उज्ज्वलनीलमणि, (३) श्रीकृष्णसन्दर्भ, (४) श्रीकृष्णचैतन्यचन्द्रोक्त x | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

पद्यावली, (५) गीतगोविन्द, (६) गोपालचम्पू, (७) गोविन्द-लीलामृत, (८) जगन्नाथवल्लभ, (९) वैष्णवतोषणी, (१०) स्तवमाला, (११) स्तवावली, (१२) पद्यावली, (१३) विदग्धमाधव, (१४) बृहद्भागवतामृत, (१५) भक्तिरसामृतसिन्धु, (१६) भगवत्सन्दर्भ, (१७) लघुभागवतामृत, (१८) ललितमाधव-नाटक, (१९) सर्वसम्वादिनी, (२०) दानकेलिकौमुदी, (२१) नाटकचन्द्रिका, (२२) हरिभक्तिविलास। अन्य-ग्रन्थ— (१) अध्यात्म-रामायण, (२) अभिधानसमूह, (३) अलङ्कारशास्त्र, (४) एकादशीतत्त्व, (५) उद्वाहतत्त्व, (६) काव्यप्रकाश, (७) दिग्विजयी-स्तव, (८) नैषध, (९) प्राचीनकृत श्लोक, (१०) पाणिनि, (११) बङ्गदेशीय विप्र-कृत श्लोक, (१२) विश्वप्रकाश, (१३) बाल्मीकिकृत रामायण, (१४) भरतमुनि-वाक्य, (१५) सामुद्रिक-शास्त्र, (१६) मलमासतत्त्व, (१७) मुनिवाक्य, (१८) योगवाशिष्ठ, (१९) रघुवंश, (२०) शकुन्तला, (२१) शङ्कराचार्यकृत शारीरक भाष्य और (२२) भारवी। “ग्रन्थका विभाग” यह ग्रन्थ तीन भागोंमें विभक्त है—आदिलीला, मध्यलीला और अन्त्यलीला। आदिलीलामें सत्रह अध्यायों, मध्यलीलामें पच्चीस अध्यायों और अन्त्यलीलामें बीस अध्यायोंसे अन्तर्विभाग रचित हुआ है। तीनों लीलाओंके विभिन्न अध्यायोंमें लिखित विषयसमूहका वर्णन सूत्र-आकारमें प्रत्येक लीलाके अन्तिम अध्यायमें अर्थात् आदिलीलाके सतरहवें अध्यायमें, मध्यलीलाके पच्चीसवें अध्यायमें और अन्त्यलीलाके बीसवें अध्यायमें लिपिबद्ध हुआ है। इसके अतिरिक्त मध्यलीलाके पहले अध्यायमें श्रीगौरसुन्दरके नीलाचलमें अवस्थान करते समय की गयी सभी लीलाओंका धारावाहिक अनुवाद लिखकर मध्य और अन्त्यलीलाके विभिन्न अध्यायोंके अन्तर्गत लीला वर्णनका एक संयोजन परिदृष्ट होता है। इसमें अध्याय-गत संख्याका उल्लेख नहीं रहनेपर भी लीलासमूहका सूत्ररूपमें वर्णन है। इस प्रकार अनुवाद और सूत्र-वर्णन रहनेसे ग्रन्थके बीचमें परवर्तीकालमें दूसरोंके द्वारा प्रक्षिप्त अर्थात् बादमें जोड़कर लिखे गये शब्दोंसे ग्रन्थकारके अपने ग्रन्थकी रक्षा हुई है। “आदिलीलाका विवरण” आदिलीलाके प्रथम चार अध्यायोंमें श्रीचैतन्यदेव-तत्त्व, पाँचवें अध्यायमें श्रीनित्यानन्द-तत्त्व और छठे अध्यायमें श्रीअद्वैत-तत्त्व सूचित हुआ है। सातवें अध्यायमें महाप्रभुका निजतत्त्व, प्रकाशतत्त्व श्रीनित्यानन्द, अवतार-तत्त्व श्रीअद्वैत, शक्तितत्त्व श्रीगदाधरादि तथा भक्ततत्त्व श्रीवासादिका तत्त्व-सम्मिलन वर्णित हुआ है। प्रथम चार अध्यायोंके पहलेमें श्रीचैतन्यका तत्त्व साधारण रूपसे, दूसरेमें विशेष रूपसे, तीसरेमें प्रपञ्चमें अवतरणके बाह्य-उद्देश्य और चौथेमें भूमिका | xi

अवतरणके आन्तरिक-उद्देश्य लिखे गये हैं। आठवें अध्यायमें ग्रन्थकी भूमिका और ग्रन्थकारका अपना परिचय प्राप्त होता है। नवें अध्यायमें महाप्रभुका भक्ति-काननके मालीके रूपमें वर्णन तथा दसवेंसे बारहवें अध्याय तक तीन अध्यायोंमें महाप्रभुके निज-पार्षदोंकी शाखा, श्रीनित्यानन्द-शाखा एवं श्रीअद्वैत और श्रीगदाधर-शाखाकी तालिका दी गयी है। आदिलीलाके पहले अध्यायसे बारहवें अध्याय तक सभी अध्यायोंको श्रीचैतन्य-चरितामृतका प्रारम्भिक 'उद्घाटन' या 'पूर्वलक्षण' कहा जा सकता है। आदिलीलाके तेरहवेंसे सतरहवें अध्याय तक अन्तिम पाँच अध्यायोंमें भगवान्‌के गृहस्थ-चरित्रकी लीला कही गयी है। तेरहवें अध्यायमें जन्मलीला, चौदहवेंमें बाल्यलीला, पन्द्रहवेंमें पौगण्ड-लीला, सोलहवेंमें कैशोर-लीला तथा सतरहवेंमें यौवन-लीलाकी घटनाओंका वर्णन हुआ है। श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिलीलामें कही गयी कथाएँ श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके श्रीचैतन्यभागवतमें विशेषरूपसे वर्णित होनेपर इस ग्रन्थमें पुनः इन लीलाओंका विस्तारसे उल्लेख नहीं हुआ है। श्रीचैतन्यभागवतको श्रीचैतन्यचरितामृतका पूर्वभाग और श्रीचैतन्यचरितामृतको श्रीचैतन्यभागवतका उत्तरभाग कहा जा सकता है। श्रीचैतन्यचरितामृतमें श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास आश्रममें अवस्थित-कालकी लीलाएँ विशेष रूपसे वर्णन की गयी हैं। श्रीचैतन्यचरितामृतके मध्य और अन्त्यलीलाके सम्पूर्ण अध्यायों अर्थात् पैंतालिस अध्यायोंमें श्रीकृष्णचैतन्यकी संन्यास-लीला तथा आदिलीलाके अन्तिम पाँच अध्यायोंमें महाप्रभु विश्वम्भरकी बाल्यलीला और गृहस्थलीला वर्णित हैं। इसलिये तत्त्वानुकूल लीलाग्रन्थ पचास अध्यायोंमें है तथा उनकी भूमिकारूपमें तत्त्व-परिचय बारह अध्यायोंमें है, - इस प्रकार बासठ अध्यायोंमें ग्रन्थ सम्पूर्ण हुआ है।

“मध्यलीलाका विवरण"

मध्यलीलाके पहले अध्यायमें प्रचार-कार्यमें व्रती श्रीरूप-सनातनका कथा प्रसङ्ग, मध्य और अन्त्यलीलाका अनुवाद-सूत्र-कथन तथा दूसरे अध्यायमें अन्त्यलीलामें कही गयी शेष बारह वर्षोंकी लीलामालाका संक्षिप्त परिचय लिपिबद्ध हुआ है। तीसरे अध्यायमें संन्यास ग्रहणके उपरान्त हुई घटनाओंका वर्णन करते हुए राढ़देश और शान्तिपुरमें गमन तथा चौथे और पाँचवें अध्यायोंमें नीलाचलके पथमें रेमुणा, याजपुर, कटक, साक्षीगोपाल और भुवनेश्वर आदि स्थानोंकी कथा तथा दण्डभङ्ग-लीला वर्णित हुई है। छठे अध्यायमें महाप्रभुका पुरीमें आगमन और सार्वभौम-मिलन, सातवेंमें दक्षिण यात्रा, आठवेंमें रामानन्द-मिलन, नौवेंमें दक्षिण भारतमें भ्रमणकी कथा, दसवें और ग्यारहवेंमें पुनः पुरी आगमन, गौड़देशसे आये भक्तोंका उत्कलके भक्तोंके साथ मिलनका चित्राङ्कन हुआ है। बारहवें, तेरहवें और चौदहवें-तीन अध्यायोंमें महाप्रभुका पुरुषोत्तममें अवस्थान और जगन्नाथदेवकी रथयात्रादिका प्रसङ्ग तथा पन्द्रहवेंमें भक्तोंको विदायी आदिको अङ्कित किया गया है। सोलहवेंमें महाप्रभुकी वृन्दावन यात्रा और बीचमेंसे ही लौटकर आना तथा शान्तिपुरमें श्रीरघुनाथदासका प्रसङ्ग वर्णित हुआ है। सतरहवेंमें वन-पथसे पुनः वृन्दावन यात्रा, अठारहवेंमें वृन्दावन भ्रमण, उन्नीसवेंमें प्रयागमें श्रीरूपशिक्षा तथा बीसवेंसे

xii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

पच्चीसवें तक छह अध्यायोंमें काशीमें सनातन शिक्षाका प्रसङ्ग-बीसवें और इक्कीसवेंमें सम्बन्ध-ज्ञान, बाइसवेंमें अभिधेय, तेइसवेंमें प्रयोजन, चौबीसवेंमें 'आत्मारामारच'-श्लोकके अर्थका विवरण तथा पच्चीसवेंमें मायावादी-विमोचन लीला वर्णित हुई है। “अन्त्यलीलाका विवरण" अन्त्यलीलाके पहले अध्यायमें श्रीरूपके साथ दूसरी बार मिलनके प्रसङ्गमें उनके द्वारा रचित ग्रन्थका श्रवण तथा शिवानन्दके कुत्तेकी कथा, दूसरेमें छोटे हरिदासके प्रसङ्गमें स्त्री-सङ्गीके त्यागकी लीला, तीसरेमें हरिदासठाकुर-महिमा और नाम-महिमा तथा दामोदरका वाग्दण्ड, चौथेमें श्रीसनातनके साथ द्वितीय मिलन, पाँचवेंमें प्रद्युम्न मिश्रका रामानन्दरायसे सङ्ग और बङ्गालके कविकि तत्त्व-भ्राँति, छठेमें दास-गोस्वामीकी कथा और महोत्सव, सातवेंमें वल्लभभट्ट-मिलन, आठवेंमें रामचन्द्रपुरीके कटाक्षसे भिक्षामें सङ्कोच, नौवेंमें राजाके धनका हरण करनेवालेकी निन्दा, दसवेंमें राघवकी झालि, सेवककी सेवावृत्तिकी परीक्षा तथा नृत्य, ग्यारहवेंमें हरिदास ठाकुरका निर्याण, बारहवेंमें जगदानन्दके द्वारा लाये गए तेलकी उपेक्षा तथा श्रीनित्यानन्दके द्वारा शिवानन्द सेनपर क्रोध प्रकाश, तेरहवेंमें जगदानन्दकी वृन्दावन-यात्रा, महाप्रभुके द्वारा देवदासीके गीतका श्रवण तथा रघुनाथभट्ट-संवाद, चौदहवें और पन्द्रहवेंमें दिव्योन्माद, अन्तर्दशामें वृन्दावनकी उपलब्धि और श्रीकृष्णान्वेषण, सोलहवेंमें कालिदासका वैष्णव-उच्छिष्ट पानेका प्रसङ्ग, कविकर्णपूरकी शैशवकालकी कथा और श्रीकृष्णधरामृतफल-माहात्म्य, सतरहवेंमें गायोंके बीचमें अन्तर्दशा, अठारहवेंमें समुद्रके बीचमें अन्तर्दशा, उन्नीसवेंमें विप्रलम्भावस्था तथा बीसवेंमें शिक्षाष्टक, अन्त्यलीलाका सूत्रवर्णन और ग्रन्थ समाप्त तथा ग्रन्थकारके दैन्यका वर्णन हुआ है। “श्रीचैतन्य-प्रचारित वास्तव सत्यधर्मकी सुप्राचीनता और पूर्व युगोंका इतिहास” श्रीचैतन्यदेवके द्वारा प्रचारित धर्ममतको कोई-कोई आधुनिक और नव-रचित कहनेकी धृष्टता प्रदर्शित करते हैं, किन्तु सभी शास्त्र ही उनके स्वरमें उनकी बात ही न्यूनाधिक बोलनेके लिये गर्दन उठाकर भी सुष्ठुरूपसे वर्णन नहीं कर पाते हैं। भगवान् श्रीचैतन्यदेवने वास्तव-सत्यके विषयमें जो सब बातें कही हैं, वही उन्होंने प्राकृत-सृष्टिके प्रारम्भमें ब्रह्माके हृदयमें प्रकट की थीं। ब्रह्माने समय-समयपर जिन सभी व्यक्तियोंके निकट इन बातोंको प्रकाशित किया था, वे क्रमशः कालके प्रभावसे अनेक प्रकारसे लुप्त हो गयी थीं। ब्रह्माके द्वारा कथित वास्तव-सत्य श्रुति-परम्परासे परवर्त्ती ऋषिसमाजमें प्रकाशित होनेपर भी मायाके तीन गुणोंके आक्रमणसे श्रौतवाणी अनेक प्रकारसे रूपान्तरित हुई है। श्रौतवाणीकी विकृत धारणा जिस समय वास्तव सत्यको आवृत और विपरीत करनेका प्रयास करती है, उस समय ही श्रौतपन्थाके आदिपुरुष भगवान् विष्णु अपने नैमित्तिक लीलावतारसमूहकी अवतारणा करते हैं अर्थात् जगत्में अवतरित होते हैं।

“ब्रह्माके सात जन्मोंमें वास्तव सत्यका प्रकाश” ब्रह्माके सात विभिन्न जन्मोंमें यह वास्तव-सत्य पुनः पुनः प्रकाशित हुआ था। कालके प्रभावसे उस सत्यने न्यूनाधिक लुप्त होकर कलियुगमें अनेक तर्कपन्थाओंको आह्वान किया है। ब्रह्माके पहले मानस जन्ममें श्रीनारायणसे फेनपगण वास्तव-सत्यकी कथासे अवगत हुए। फेनपगणसे वैखानसगण तथा उनसे चन्द्रने वास्तव-सत्यको लाभ किया। ब्रह्माके दूसरे चाक्षुष जन्ममें नारायणकी कृपासे ब्रह्मा और रुद्र तथा रुद्रसे बालखिल्यगण उस सत्यसे परिचित हुए। ब्रह्माके तीसरे वाचिक जन्ममें नारायणसे सुपर्णने ऋग्वेदका मूल मन्त्र प्राप्त किया। उस समय वायुसे विघशासि-सम्प्रदाय तथा विघशासिगणसे महोदधिने ऐकान्तिक धर्मके विषयमें अभिज्ञता प्राप्त की। ब्रह्माके चौथे श्रवणज जन्ममें आरण्यकके साथ वेदशास्त्रसे सात्वतधर्म प्रचारित हुआ। उस समय ब्रह्मासे स्वारोचिष मनु, मनुसे उनके पुत्र शङ्खपदने तथा शङ्खपदके पुत्र सुवर्णाभने सात्वतधर्मकी शिक्षा प्राप्त की। ब्रह्माका मानसजन्म, चाक्षुषजन्म, वाचिकजन्म और श्रवणज-जन्म-इन चार प्रकारके आविर्भावोंके द्वारा सत्ययुगमें धर्मप्रचार हुआ था। उस समयमें त्रेतायुगके समान वर्णाश्रम-धर्म और वैदिक कर्मकाण्डका प्रचार आरम्भ नहीं हुआ था। “वास्तव सत्यके उपासकोंका वर्णाश्रमसे अतीत एकायन-शाखामें गणन” फेनप, वैखानस, सोम, रुद्र, बालखिल्य, सुवर्ण, वायु, महोदधि, स्वारोचिष मनु, शङ्खपद और सुवर्णाभ आदि पूर्व युगोंके हरिजनगण सभी एकायन-शाखी थे। उस समयमें वैदिक शाखाका कोई भी विभाग नहीं होनेके कारण वैदिक ऋषिगण ‘एकायन-शाखी’ नामसे जाने जाते थे। फेनप, वैखानस, बालखिल्य और परवर्त्ती समयमें उडुम्बरगण पूर्व चारों सम्प्रदायोंके अनुसरणसे वर्णाश्रमधर्ममें प्रतिष्ठित होनेके समयमें भी वानप्रस्थकी शाखाविशेषमें पर्यवसित हुए थे। “सभी शास्त्रोंमें प्रसिद्ध ब्रह्माके पाद्म-जन्मसे भक्तिका इतिहास” त्रेताके प्रारम्भमें वर्णाश्रम गुण-कर्मके विभागानुसार चार-चार भागोंमें विभक्त हुआ। उस समय ब्रह्माके पाँचवें नासत्य जन्ममें नारायणसे सनत्कुमार ऐकान्तिक धर्ममें प्रविष्ट हुए। सनत्कुमारसे वीरण, वीरणसे रैभ्य, रैभ्यसे कुक्षि ऐकान्तिक धर्ममें प्रविष्ट हुए। उस समय ब्रह्माके छठे अण्डज जन्ममें ब्रह्मासे बर्हिषत् और उनके अग्रज (बड़े भाई) अविकम्पन आदि ऐकान्तिक सात्वत-धर्ममें प्रविष्ट हुए। ब्रह्माके छठे जन्मसे ही सर्वप्रथम सामवेद-गानकी ध्वनि उद्गीत हुई। ब्रह्माके सातवें पाद्म-जन्ममें ही नारायणसे ब्रह्मा, ब्रह्मासे दक्ष, आदित्य, विवस्वान, मनु और इक्ष्वाकु आदिने भागवतधर्ममें अवस्थित होकर प्रसिद्धि लाभ की। xiv | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

“चारों सात्वत-सम्प्रदायोंका इतिहास” ‘श्रीसम्प्रदाय’—रत्नाकरसे उद्भूत हुआ है। रत्नाकर प्राचीन विघशासि-सम्प्रदायसे और उक्त सम्प्रदाय फिर वायुसे ब्रह्माके तीसरे वाक्यज जन्ममें प्रकटित हुआ। ‘ब्रह्म-सम्प्रदाय’ने और ‘रुद्र-सम्प्रदाय’ने ब्रह्माके चाक्षुष जन्ममें नारायणसे कृपा प्राप्त की। उनके अधस्तन बालखिल्यगणोंने ही ब्रह्म और रुद्र सम्प्रदायका संरक्षण किया। ‘सनत्कुमार’ने ब्रह्माके पाँचवे नासत्य जन्ममें श्रीनारायणसे त्रेताके प्रारम्भमें ऐकान्तिक धर्म प्राप्त किया। “सात्वत, भक्त और भागवतगणोंका सुप्राचीनत्व तथा सनातनत्व” पाद्मकल्पकी भगवदावतारावलीकी कथा शास्त्रोंमें कही गयी है। मत्स्य, कूर्म, वराह, नृसिंह, वामन, भार्गव (परशुराम), राम, बलदेव, बुद्ध और कल्कि—ये दस विष्णु-अवतार उपास्यरूपमें ग्रहण किये गये, ऐसा विभिन्न सात्वत-श्रेणीके अनुष्ठानसमूह पुराण, महाभारतादि प्रमुख ग्रन्थोंमें लिपिबद्ध देखा जाता है। यद्यपि ये सभी शास्त्रग्रन्थ देवभाषा संस्कृतमें रचित हैं, तथापि पूर्व युगोंके सात्वतधर्मकी कथा इङ्गितसे और कुछ परिमाणमें ही वर्णित हुई है, ऐसा देखनेमें आता है। भगवान्‌के दशावतारके उपासकगण ‘भक्त’, ‘भागवत’ या ‘सात्वत’ कहलाते हैं। पार्थिव विचारसे जिस स्थानपर नश्वर, परिवर्तनशील खण्डकालकी अनुभूति तथा प्राकृत खण्डित पात्रानुभूति आरम्भ होती है, उस स्थानपर भगवान्‌के दो गुणावतार (ब्रह्मा और शिव) भगवान्‌के समान गिने जाते हैं। “अश्रौत पन्थासे आवृत्त गौण दर्शन और भागवत विपर्यय धर्म” अधोक्षज विज्ञान ब्रह्माके हृदयमें सब समय प्रकटित रहनेपर भी ब्रह्माके अधीनस्थ लोगोंमें इन्द्रियज्ञान-प्रवृत्तिके वशमें होकर नाना प्रकारकी तात्कालिक प्रतीति नित्य सत्य श्रेणीमें अवैध रूपसे गणित हुई है। इसलिये ही जगत्‌में भगवद्विषयमें नाना प्रकारकी विवादमयी धारणाकी प्रवृत्ति देखी जाती है। कहींपर ग्राम्यदेवतावाद (ग्राम्य देवताओंकी पूजा), भूत-प्रेतवाद, वशीकरण, पञ्चपक्षी-साधन (ज्योतिष), पञ्चमकार-साधनके द्वारा जड़ोन्मुखी शाक्तेयमतवाद [मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन—इन पाँच मकारोंके तामसिक, राजसिक और सात्त्विक तान्त्रिक विचारोंसे विभिन्न अर्थ हैं], कहींपर सत्त्व-रजोमिश्रित गुण-प्रभावित सौरवाद तथा कहींपर सत्त्व-तमोगुणसे उत्पन्न गाणपत्यमत (गणपतिकी पूजा) के गगन-भेदी-निनाद सात्वतमतके विरोधके उद्देश्यसे प्रतिद्वन्द्विताका अभिनय दिखा रहे हैं। ब्रह्माके चित्तमें उदित अधोक्षजकी सेवा-प्रणालीकी अमर्यादा करके अन्याभिलाष-कर्म और ज्ञानके पथपर उनके अधस्तनोंने बद्धजीवोंकी चित्तवृत्तिको प्रभावित किया है। यह सब तात्कालिक उदित चित्तवृत्ति तमोगुण-सेव्य भूमिका | xv

गुणावतार रुद्रके विक्रमसे स्तब्ध होती है। प्राकृत जगत्में निर्गुण विष्णुके रजोगुणावतार ब्रह्माके विविध अधिष्ठान उन-उन स्वभाववाले लोगोंके द्वारा कल्पित, उद्भावित और प्रकटित हुए हैं तथा वैसी राजसिक प्रवृत्ति तमोगुणमें लीन होनेसे पूर्व तक गुणमय विष्णुकी उपासना प्रपञ्चमें अपना विक्रम प्रकाशित करती है। वास्तविक रूपमें सगुण और निर्गुण उपासनाकी धारणा प्राकृत विचारमें संश्लिष्ट है।

“अभक्ति मार्ग—अन्याभिलाष, कर्म और ज्ञान”

प्राकृत विचारोंका अतिक्रम करके प्रपञ्चमें अवस्थित सगुण और निर्गुण उपासना भक्ति-प्रतिकूल अन्यभिलाष, कर्म और ज्ञानके आश्रयमें प्रपञ्चमें अपना-अपना प्रभाव विस्तार करती है। अप्राकृत भगवत्-सेवा निर्गुण या सगुण उपासनासे प्रापञ्चिक विकारसे विकृत होने योग्य नहीं है। तथापि हम कलिकी प्रबलता या विवादयुगकी प्रवृत्तिमें नाना प्रकारके भक्तिविरोधी मतवाद देख रहे हैं। श्रीचैतन्यदेवने जगद्गुरुके आसनपर अधिष्ठित होकर कुतार्किकोंके अनेक प्रकारके कुतर्कोंको जड़से ही नष्ट किया है।

“चार-युगोंका धर्म”

सत्ययुगके विष्णु-ध्यान, त्रेताके विष्णुयज्ञ, द्वापरकी विष्णुपरिचर्या ओर कलिका भगवन्नामकीर्तन कुतर्कग्रस्त बद्धजीवोंके भगवद्दर्शनमें और सेवा कार्योंमें विशेष रूपसे उपयोगी हैं। तथापि विष्णुमायाकी विक्षेपात्मिका और आवरणात्मिका शक्तिके प्रभावसे वास्तविक सत्यानुसरण सभीके भाग्यमें घटित नहीं हो सकता।

“भक्तिका प्राकट्य-काल”

योग्यताके अभावमें कलिहत जीवोंकी दुर्गतिका वर्णन करते हुए वराहपुराणमें कहा गया है,—“कलि-प्रवृत्तिके दस हजार वर्ष तक विष्णु-उपासना जगत्में प्रबल रहेगी। उसके आधे समय तक विष्णुके पादोदककी (चरणामृतकी) महिमा जगत्में आदरणीय होगी। साधारण ग्रामवासियोंकी प्राकृत धारणासे जो सब उपास्य कल्पित होंगे, उन-उन ग्राम्यदेवताओंको भगवान् मानना ढाई हजार वर्ष तक चलता रहेगा।” किन्तु सात्वत-शास्त्र कहते हैं,—“पद्मज ब्रह्माके सातवें अधिष्ठानमें विष्णुके साथ अधिकारिक देवताओंके साम्य-प्रयासकी वासना ढाई हजार वर्ष तक कर्मराज्यके पथिकोंमें भ्रम उत्पादन करेगी। विष्णु-पादोदकमें साधारण जलबुद्धि पाँच हजार कल्यब्द तक चलती रहेगी। और दस हजार वर्ष तक विष्णुको अन्य देवताओंके साथ समान मानकर अमङ्गल-पथके पथिक उसे ध्रुवसत्य मानकर ग्रहण करेंगे।”

xvi | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

“असंख्य दोषोंके मूल कलियुगका अपूर्व महागुण” सात्वतशास्त्र कहते हैं,—कलियुगके सैकड़ों दोष रहनेपर भी एक महान गुण यह है कि गौरविहित कीर्तन-श्रवणसे जीवोंको प्राकृत बुद्धिसे मुक्ति प्राप्त होती है। कर्म और ज्ञान-काण्डीय विचारकोंके सङ्कीर्ण विचारोंसे श्रीकृष्णकीर्तनके प्रभावसे ही कलिजीवोंको नाना मतवादोंसे मुक्ति प्राप्त होती है। इसलिये श्रीचैतन्यचरितामृतके लेखकने ग्रन्थके प्रारम्भके दूसरे अध्यायमें श्रीचैतन्यदेवके अलौकिक और सर्वव्यापी अनुग्रहकी बातका उच्चस्वरसे कीर्तन करते हुए प्रचार किया है। “आनुगत्य-माहात्म्य” दुःसङ्गरूप कुसिद्धान्तके हाथसे एकमात्र श्रीचैतन्यदेवके अनुगतजन ही मुक्त होनेमें समर्थ हैं। श्रीचैतन्य-कृपासे वञ्चित लोग कुसिद्धान्तके गड्ढेमें कुँएके मेंढकके समान विचारसे प्रापञ्चिक दर्शनमें आबद्ध रहेंगे। वे किसी भी समय अधोक्षजकी सेवामें नियुक्त होनेका अधिकार नहीं पायेंगे। “श्रीचैतन्यदेवकी अमन्दोदया-दया” जो हरिसेवाविमुख होकर कुसिद्धान्तको भक्तिसिद्धान्तके समान मानते हैं, उनके सङ्गसे जीवोंको छुड़ाकर सेवोन्मुख करनेके लिये ही श्रीचैतन्यदेवने प्रपञ्चमें लीला प्रकटकी है। “नाना प्रकारके मतरूपी मगरमच्छोंसे व्याप्त संसार” श्रीचैतन्यदेवने कितने प्रकारके हरिविमुख सम्प्रदायोंकी चित्तवृत्तिकी व्याधिको दूर किया है, उसकी एक संक्षिप्त तालिका नीचे दी जा रही है:— (१) वेदविद्वेषी अन्याभिलाषी आध्यक्षिक गुणोपासक नास्तिक चार्वाक। (२) क्षणिकवादी गुणोपासक नास्तिक तार्किक बौद्ध। (३) स्यात्वादी गुणोपासक जैन तार्किक अर्हत्। (४) निरीश्वर निर्गुणात्मवादी तार्किक सांख्य। (५) सेश्वर निर्गुणात्मवादी तार्किक पातञ्जल। (६) समन्वयवादी श्रौतब्रुव केवलाद्वैतविचारपर हरिविमुख शाङ्कर। (७) पदार्थवादी श्रौतब्रुव सगुणोपासक वैयाकरण। भूमिका | xvii

(८) वाक्यार्थवेदी श्रौतब्रुव सगुणोपासक मीमांसक। (९) उत्पत्ति-साधनादृष्टवादी शब्द-प्रमाणान्तर अङ्गीकारी सगुणोपासक नैयायिक। (१०) उत्पत्ति-साधनादृष्टवादी शब्द-प्रमाणान्तर अनङ्गीकारी सगुणोपासक वैशेषिक। (११) निरस्ततर्क शैव भोग-साधनादृष्टवादी जीवन्मुक्त विचारपर सगुणोपासक सेश्वर। (१२) भोगसाधनदृष्टवादी विदेहमुक्तिवादी आत्मैक्यवादी सगुणोपासक प्रत्यभिज्ञ। (१३) भोगसाधनादृष्टवादी आत्मभेदवादी विदेहमुक्तिवादी कर्मानपेक्ष ईश्वरवादी सगुणोपासक नकुलीश-पाशुपत शैव-सम्प्रदाय। (१४) भोगसाधनादृष्टवादी विदेहमुक्तिवादी आत्मभेदवादी कर्मसापेक्ष ईश्वरवादी सगुणोपासक शैव-सम्प्रदाय। “वर्णाश्रमी-गुरु परमहंस अथवा वैष्णव-पूजा रूपी कर्त्तव्यता” श्रीचैतन्यलीलाके लेखक परमहंसलीलाभिनयकारी श्रील कविराज गोस्वामी प्रभुने “नानामतग्राहग्रस्तान दाक्षिणात्यजनद्विपान्। कृपारिणा विमुच्यैतान् गौरश्चक्रे स वैष्णवान्॥' श्लोकके द्वारा प्रापञ्चिक तर्कपन्थियोंको श्रीव्यासका आनुगत्य प्राप्त करनेके लिये परामर्श दिया है। त्रिदण्डिपाद श्रील प्रबोधानन्द सरस्वती आश्रमीके वेशमें उस पारमहंस्य-धर्मको ग्रहण करनेके लिये दैववर्णाश्रमियोंके जगत् उपदेशक हुए हैं। उनकी विजय-वैजयन्ती-वहन करते हुए श्रीचैतन्याश्रित प्रचारक-सम्प्रदायको श्रीरूपानुग कहनेपर किसीको भी विरोध उपस्थित न हो,—यही मेरी सकातर प्रार्थना है। “परमहंस वैष्णव अथवा उनके दासोंके प्राकृत दर्शनमें निषिद्धता” बाह्य प्रापञ्चिक धारणाके वशीभूत हो परमहंसानुगत वैष्णवदासानुदासोंका आनुष्ठानिक क्रियाकलाप किसीके भी सत्यदर्शनमें बाधा न दे। ऐसा कहनेका तात्पर्य यह है कि श्रीगौरसुन्दरके द्वारा प्रकाशित साधनतत्त्व-अन्याभिलाष, कर्म और ज्ञानसे आबद्ध नहीं है, किन्तु न्यूनाधिक रूपमें सभी सम्प्रदायोंमें ही इसका साधनरूपमें बहुत आदर है। “ग्रन्थकारका जगद्गुरुत्व या वैष्णवाचार्यत्व” अन्यभिलाषीका ऐहिक (सांसारिक) फल लाभ, कर्मीका पारलौकिक (उच्च लोकोंमें) नश्वर फल लाभ, निर्भेद ब्रह्मके अनुसन्धानके द्वारा ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञातृत्व-भावके लिये स्वरूप-विनाशचेष्टा आदि साध्यवस्तुओंकी भगवत्-प्रेमके साथ तुलना नहीं की जा सकती। जिनके लिये भगवत्-प्रेम साध्य-वस्तुरूपमें नित्यकाल होनेके स्थानपर परिवर्तनशील प्रतीत होता है, उनका साध्यविचार प्रापञ्चिक या औपाधिक अज्ञानकी श्रेणीका ही है। इस साध्य-साधन xviii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

विचारकी बात ही पारमहंस्य-सम्प्रदायके पूर्वगुरु श्रीकविराज गोस्वामीने अपने उपास्यवस्तु श्रीचैतन्यचरितामृत-लीला-विग्रहमें सुष्ठु रूपसे लिपिबद्ध की है। “ब्रह्मसूत्रभाष्य-श्रीभागवतवेद्य अचिन्त्य-भेदाभेद सत्य-संस्थापनके द्वारा चारों सात्वत-सम्प्रदायोंकी सम्पूर्णता और सौष्ठव सम्पादन” श्रीगौरसुन्दरने तत्त्ववादी-शाखास्थित एकदण्डियोंके साथ जिस तत्त्ववादशाखाकी असम्पूर्णता प्रदर्शितकी है, वह श्रीचैतन्यचरितामृत-ग्रन्थमें सुष्ठुरूपसे लिपिबद्ध है। दक्षिण भारतमें परिभ्रमणके समय श्रीलक्ष्मणदेशिक क्षेत्रमें अवस्थित मूलकेन्द्र श्रीरङ्गक्षेत्रमें विशिष्टाद्वैतवादको सम्पूर्ण करनेके उद्देश्यसे श्रीगौरसुन्दरने जो सब कथाएँ अपनी लीलार्मे गौड़ीय भक्तोंके साधनको सुचारु बनानेके लिये प्रकटित की थीं, उनका भी श्रीचैतन्यचरितामृतमें स्थान-स्थानपर उल्लेख हुआ है। श्रीनियमानन्द मुनिके 'पारिजात', 'दशश्लोकी' आदि ग्रन्थोंमें जो सब अभाव उनके अनुगत सम्प्रदायमें कृष्णभजनके बाधारूपमें परिगणित होते थे, वे सब अभाव काश्मीरदेशके केशवाचार्यके साथ विचारके समय श्रीगौरकृष्णने परिपूर्ण किये थे। बौद्धमतवाद-विनाशक पाण्ड्यदेशीय सर्वज्ञ आदि-विष्णुस्वामीके अधस्तन श्रीधरस्वामीको 'भक्त्यैकरक्षक'-रूपमें दर्शन करके श्रीगौरसुन्दरने उनके सम्प्रदायके अभावको पूर्ण किया है। श्रीनृसिंह उपासनाके अन्दर श्रीकृष्णोपासनाका सौन्दर्य प्रकाशित कराकर द्वितीय विष्णुस्वामी काञ्ची निवासी बाल-गोपाल त्रिदण्डीस्वामी और उनके अनुगत श्रीबिल्वमङ्गलके श्रीकृष्णकर्णामृतके भावसमूहको सम्वर्द्धित किया है। इन्हीं बालगोपालने काञ्चीश्वर और द्वारकेशकी स्थापना की थी, यह बात द्वितीय विष्णुस्वामी-सम्प्रदायमें प्रचलित थी, बादमें श्रीरामानुजाचार्यके प्रभाव बढ़नेसे वे काञ्चीश्वर ही राजगोपाल या वरदराजके नामसे प्रसिद्ध हुए। तृतीय आन्ध्रविष्णुस्वामी-सम्प्रदायके शिष्य-वंश-परम्परामें उदित श्रीवल्लभाचार्य-रचित 'सुबोधिनी' टीकामें जो सब अभाव थे, उनके परिपूर्णकी लीला भी श्रीचैतन्यचरितामृत-ग्रन्थमें सब प्रकारसे उदाहृत है। “उपसंहार” श्रीचैतन्यदेवने जो अति-उन्नत श्रीकृष्णभजन-प्रणाली अपने अनुगत गौड़ीय वैष्णव-सम्प्रदायमें प्रदानकी है, उसको देखकर बहुत लोग ही चारों साम्प्रदायिक-आचार्योंसे श्रीगौरसुन्दरके मतभेदको लक्ष्य करके उनको स्वतन्त्र विचारमय सम्प्रदाय-प्रवर्त्तक कहते हैं। वास्तविक रूपमें श्रीगौरसुन्दर केवल आचार्यमात्र ही नहीं हैं, वे चारों आचार्योंके सिद्धान्तोंके अभावोंके परिपूरण-कर्त्ता भी हैं। वे स्वयंरूप भगवत्-वस्तु हैं, इसलिये केवलाद्वैतवादके विचारदौर्बल्यको (विचारकी कमियोंको) प्रदर्शन करना उनमें दोषरूपमें दिखायी नहीं देता। अचिन्त्य-भेदाभेदवाद ही श्रीकृष्णने ब्रह्माके हृदयमें प्रकाशित किया था। श्रीचैतन्यचरित-लेखनमें अभिन्न व्रजेन्द्रनन्दनकी भूमिका | xix

सेवा-सौष्ठवके अभिनयकारी श्रीगौरसुन्दरकी लीलाके पूर्णाङ्गसमूह ग्रन्थकारके हाथोंसे ही सुचारु रूपसे अंकित हुए हैं। जीवन्मुक्त गौड़ीय महाभागवतगण श्रीचैतन्यचरितामृतकी आलोचना करते हुए भजनकी पराकाष्ठा लाभ करेंगे। “श्रूयतां श्रूयतां नित्यं गीयतां गीयतां मुदा। चिन्त्यतां चिन्त्यतां भक्ताश्चैतन्यचरितामृतम्॥” “हे भक्तों! इस श्रीचैतन्यचरितामृतका नित्य आनन्दपूर्वक श्रवण करो, कीर्तन करो और स्मरण करो।” — श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती 'प्रभुपाद' xx | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

निवेदन श्रीचैतन्यदेवके पार्षदगण ही श्रीचैतन्यदेवके समस्त तत्त्वों और लीला-तात्पर्य वर्णनके सभी प्रकारसे संरक्षणकारी हैं। श्रीमुरारी गुप्त, श्रीस्वरूप दामोदर, श्रीसनातन गोस्वामी, श्रीरूप गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीप्रबोधानन्द सरस्वती, श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी, श्रीवृन्दावनदास ठाकुर, कविकर्णपूर, श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामी आदि गौरपार्षदोंकी रचनाएँ ही सभी विद्वानोंके निकट प्रमाणिक रूपमें समादृत हैं। उनमेंसे श्रीमुरारि गुप्तके कड़चा 'श्रीचैतन्यचरित' में श्रीचैतन्यदेवकी विशेषतः नवद्वीपमें अवस्थान-कालीन लीलाएँ और श्रीस्वरूप दामोदर प्रभुके कड़चामें विशेषतः उनके संन्यास-ग्रहणके बादकी लीलाएँ व्यक्त हुई हैं। मूलतः ये दोनों कड़चा ही परवर्ती कालमें श्रीचैतन्यलीलाका वर्णन करनेवालोंके लिये दिग्दर्शी रूपमें आधार हुए हैं। श्रीचैतन्यदेवके परम प्रणयी भक्त शिवानन्द सेनके पुत्र श्रीचैतन्यदासने १४६४ शकमें अर्थात् महाप्रभुके अन्तर्धान होनेके नौ वर्षके बाद 'श्रीकृष्णचैतन्यचरितामृत-काव्यम्' की रचना की। किसीके मतानुसार उक्त ग्रन्थ उनके छोटे भ्राता 'कविकर्णपूर'के द्वारा ही रचित है। १४९४ शकाब्दमें कविकर्णपूरने 'श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकम्' की रचना समाप्त की। श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीने अपने श्रीचैतन्यचरितामृत रचनाकालमें अनेकांशोंमें उस नाटकका ही अनुसरण किया है और प्रमाणरूपमें अनेक श्लोक उनके ग्रन्थसे उद्धृत किये हैं। उक्त नाटकके चार वर्ष बाद श्रीकर्णपूरने 'गौरगणोद्देश-दीपिका' की रचना की। उनके ये सब ग्रन्थ श्रीचैतन्यदेवके सम्बन्धमें अमल-प्रमाण भास्कर रूपमें गौड़ीय-गगनमें चिर उदित हुए हैं। श्रीषड्गोस्वामियोंमें श्रीरघुनाथदास गोस्वामी ही एकमात्र सुदीर्घ सोलह वर्ष श्रीस्वरूप दामोदर प्रभुके आनुगत्यमें महाप्रभुके अन्तर्धान होनेतक उनकी विभिन्न अन्तरङ्ग सेवाओंमें नियुक्त होकर उनकी अन्त्यलीलाके साक्षीस्वरूप हुए। “सेकाले ए दुइ रहेन महाप्रभुर पाशे। आर सब कड़चा-कर्त्ता रहेन दूरदेशे॥” (अन्त्य १४/८)। श्रीदासगोस्वामी रचित 'स्तवावली' में 'श्रीगौराङ्ग-स्तवकल्पतरुः' आदि स्तोत्रोंमें श्रीचैतन्यदेवकी महिमा और अन्त्यलीलाकी विभिन्न प्रकारकी अभिव्यक्ति देखी जाती है। 'स्वरूपेर रघु'-नामसे सुपरिचित श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके निकट ही मूलतः 'श्रीस्वरूप-दामोदर-कड़चा' संरक्षित हुआ। परवर्तीकालमें श्रील दास गोस्वामीके शिक्षागर्भमें लालित-पालित श्रीकृष्णदास कविराज प्रभु ही उसके धारक और वाहक हुए। वस्तुतः श्रील कविराज गोस्वामीने श्रील स्वरूप दामोदर प्रभुके कड़चा और श्रील दास गोस्वामीकी उक्त कड़चाकी व्याख्या और उनके श्रीमुखसे सुनी श्रीचैतन्यलीलाके आधारपर ही 'श्रीचैतन्यचरितामृत'-ग्रन्थका प्रणयन किया। “चैतन्यलीला-रत्न-सार, स्वरूपेर भाण्डार, तें हो थुइला रघुनाथेर कण्ठे। ताँहा किछु ये शुनिलुँ, ताहा इहा विस्तारिलुँ, भक्तगणे दिलुँ एइ भेटे॥” (मध्य २/८४)। “स्वरूप- 'सूत्रकर्त्ता', रघुनाथ- 'वृत्तिकार' । तार बाहुल्य वर्णि पाँजि-टीका-व्यवहार ॥” (अन्त्य १४/१०)। xxi

'श्रीचैतन्यचरितामृत'-प्रकाशके बादमें श्रीमद् वृन्दावनदास ठाकुरके 'श्रीचैतन्यभागवत'ने भी एक विशेष भूमिकाका पालन किया। उक्त ग्रन्थ बङ्गलाभाषामें श्रीचैतन्यतत्त्व और लीला-विषयक प्रथम काव्य है और श्रील वृन्दावनदास ठाकुर ही श्रीचैतन्यलीलाके 'आदि-व्यास' हैं-“नित्यानन्द कृपापात्र-वृन्दावनदास। चैतन्यलीलाय तेंहो हयेन 'आदि व्यास'॥” (अन्त्य २०/८२)। उक्त ग्रन्थका रचनाकाल किसीके मतसे १४७० शक, और कोई कहते हैं १४५७ शक, और किसीके विचारसे १४९७ शक है। श्रील वृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थका नाम 'श्रीचैतन्य-मङ्गल' रखा था। उक्त नाम श्रील कविराज गोस्वामीके प्रकटकाल तक भी प्रचलित था-“वृन्दावनदास कैल चैतन्यमङ्गल” (आदि ८/३५) इत्यादि। किन्तु परवर्तीकालमें वह 'श्रीचैतन्यभागवत'के नामसे सुपरिचित हुआ। श्रीश्रील भक्तिविनोद ठाकुरकी लेखनीसे इसके रहस्यको जाना जाता है—“प्रेमविलासके रचयिताकी सभी बातोंका अवलम्बन नहीं किया जा सकता, तथापि उनकी इस बातमें कोई विरुद्ध मत नहीं देखा जाता। वह बात यह है-पहले 'चैतन्यमङ्गल' अन्यान्य उस समय प्रचलित गीतकाव्यके समान बीच-बीचमें पयार और बीच-बीचमें गीतके द्वारा परिपूरित था। बादमें श्रीवृन्दावनके पण्डित वैष्णवोंने इस ग्रन्थको समाजमें पाठ्य ग्रन्थ बनानेके लिये वृन्दावनदास ठाकुरके रचित गीतोंको पृथक् करके सभी पयार एकत्रित करके 'श्रीचैतन्यभागवत'-नाम दिया। ××एक प्रवाद यह चला आ रहा है-लोचनदास ठाकुरके 'श्रीचैतन्यमङ्गल' को देखकर वृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थका नाम परिवर्तन कर दिया। इस प्रवादका कोई आधार प्राप्त नहीं होता है। अपितु यह प्रवाद सम्पूर्ण रूपसे असत्य प्रतीत होता है।”* श्रीमन्नित्यानन्द-प्रभुके विशेष कृपापात्र श्रीवृन्दावनदास ठाकुर 'श्रीचैतन्यभागवत' रचनाकालमें विशेषरूपसे श्रीनित्यानन्द प्रभुकी लीलामें ही आविष्ट होनेके कारण श्रीचैतन्यदेवकी कई लीलाएँ उनके निकटसे विस्तार लाभका अवकाश नहीं पाकर केवल सूत्ररूपमें ही रह गयीं। विशेषतः श्रीचैतन्यदेवकी अन्त्यलीलाका वर्णन उक्त ग्रन्थमें एक प्रकारसे असम्पूर्ण ही रह गया। और उन्होंने उक्त ग्रन्थमें स्थान-स्थानपर लिखा है-“आगे व्यास करिबे वर्णने”-इस वाक्यसे उन्होंने परवर्ती महाजनोंके वर्णनके लिये अनेक विषयोंमें इच्छा करके भी वर्णन नहीं किया, ऐसी उपलब्धि होती है। इसमें एक और अन्तर्निहित रहस्य यह है-श्रीवृन्दावनदास ठाकुर 'श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका' के अनुसार ब्रजके 'कुसुमापीड़' नामक श्रीकृष्णसखा हैं। इसलिये भी उनकी श्रीचैतन्यदेवकी राधाभाव-आस्वादनमयी निगूढ़लीला परवर्ती महाजन और श्रीचैतन्यदेवके अन्तरङ्ग-जन श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीकी अपेक्षातासे ही स्पर्श ना करनेकी असम्भावना *श्रीलोचनदास ठाकुर-कृत 'श्रीचैतन्यमङ्गल'के प्रारम्भमें ही सूत्रखण्डमें देखा जाता है,-“वृन्दावनदास वन्दिब एकचित्ते। जगत मोहित याँर भागवत-गीते॥” इससे श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके ग्रन्थ रचनाके बाद श्रीलोचनदास ठाकुरका चैतन्यमङ्गल रचित हुआ, यह जाना जाता है, और श्रील कविराज गोस्वामीने भी श्रील वृन्दावनदास ठाकुरको 'चैतन्यलीलार आदि व्यास' कहा है, इसलिये श्रीलोचनदासको श्रील वृन्दावनदास ठाकुरके भी पूर्व ग्रन्थ-रचयिता माननेका अवकाश नहीं है। xxii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

नहीं है। ‘श्रीचैतन्यभागवत’-ग्रन्थ वैष्णव-समाजमें सभी प्रकारसे आदरणीय होनेपर भी उक्त ग्रन्थमें श्रीचैतन्यलीलाकी असम्पूर्णता ही ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’के प्राकट्यका कारण हुआ है। इसलिये उक्त ग्रन्थ ‘श्रीचैतन्यभागवत’का ही परिशिष्ट कहकर विचारित हुआ है। श्रीश्रील सच्चिदानन्द भक्तिविनोद ठाकुर-कृत ‘श्रीकृष्णदास कविराज’ प्रबन्धमें उनके सम्बन्धमें इस प्रकार दिखायी देता है—“श्रील कविराज गोस्वामी प्रभु चैतन्य-सम्प्रदायके मध्य प्रधान पण्डित और परम भक्त थे। मैं इस वाक्यको प्रमाणित करनेकी चेष्टा करनेकी कोई आवश्यकता नहीं समझता। कविराज गोस्वामीके ग्रन्थ ही (श्रीचैतन्यचरितामृत, श्रीगोविन्दलीलामृत और श्रीकृष्णकर्णामृतकी ‘सारङ्गरङ्गदा’-टीका) उसके सुन्दर प्रमाण हैं। अपार महिमाशाली कविराजकी दया देखते ही सभी विमोहित होंगे। उन्होंने संस्कृत-शास्त्रज्ञान-विहीन लोगोंके प्रति करुणा प्रकाश करके क्या सुन्दर ‘श्रीचैतन्यचरितामृत’-ग्रन्थकी रचना की है। हमारा विचार करके यदि कविराज प्रभु इस प्रकार करुणा प्रकाश नहीं करते, तो दर्शनादि-शास्त्रज्ञान-परिशून्य मनुष्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके उपदिष्ट सनातन वैष्णवमत नहीं जान सकते थे और उनकी क्या गति होती, इस विषयमें कहा नहीं जा सकता। धन्य कविराज! आपने वैष्णव-सम्प्रदायके पण्डितों और मूर्खों, दोनोंको ऋणी कर रखा है। आपके गुणोंका मैं एक मुखसे कितना गान करूँगा? शुद्ध वैष्णवजगत् सदा ही आपके गुणोंका गान करता है। कविराज! आपके सिद्ध वाक्य स्मरण करके कौन पाषण्डी आपके चरणोंका आश्रय नहीं करना चाहेगा? आपने चरितामृतमें कहा है—“ये वा नाहि जाने केह, शुनिते शुनिते सेह, कि अद्भुत चैतन्यचरित। कृष्णे उपजिबे प्रीति, जानिबे रसेर रीति, शुनिलेइ बड़ हय हित॥” (मध्य २/८९)—आदि आपके इन सिद्धवाक्योंके गुणोंसे ही इस वैष्णव-सम्प्रदायके अनेक मूर्खोका चरितामृतमें उत्तम अधिकार देखा जाता है। आपके चरणोंमें मेरे असंख्य प्रणाम।” (सः तोः २/१०-११)। जगद्गुरु श्रीश्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरने अपनी ‘श्रीचरितामृत-भूमिका’में ग्रन्थकारका विषद परिचय प्रदान किया है। उसमें ग्रन्थकारके देश, काल, वर्ण, आश्रम, स्वजन, स्वभाव, दक्षतादिके सम्बन्धमें विस्तृत आलोचना देखी जाती है। इसलिये उस सम्बन्धमें पुनः आलोचनाकी कोई आवश्यकता नहीं है। उक्त भूमिकामें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीका आविर्भाव-काल अनुमानसे १४५२ शकाब्द जाना जाता है। इसलिये उनका अविर्भाव श्रीचैतन्य महाप्रभुके तिरोधानके कुछ वर्ष पूर्व हुआ था। उस प्रकारसे वे श्रीचैतन्यदेवके साक्षात् प्रकटकालीन भक्त ना होनेपर भी स्वरूपतः उनके नित्यलीला सङ्गी हैं। श्रीमद् विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर-कृत ‘मन्त्रार्थ-दीपिका’में दिखायी देता है,—श्रीमती राधारानीने स्वयं “कृष्णदास आमार प्रिय नर्मसहचरी, आमार सकल मर्मवेत्ता” आदि उक्तिके द्वारा श्रील कृष्णदास प्रभुके नित्यसिद्ध परिकरत्वकी घोषणा की है। श्रील कविराज गोस्वामीके ‘मन्त्रगुरु’के परिचयको लेकर कुछ विभ्रान्तियाँ देखी जाती हैं। उन्होंने ग्रन्थके प्रारम्भमें “मन्त्रगुरु आर यत शिक्षा-गुरुगण। ताँहार चरण आगे करिये वन्दन॥”—कहकर श्रीरूपादि षड्गोस्वामियोंको “एइ छयगुरु—शिक्षागुरु ये आमार” कहकर घोषणा की है। इस वाक्यसे उक्त षड्गोस्वामियोंके मध्य किसीकी भी उनके ‘मन्त्रगुरु’ होनेकी निवेदन | xxiii