श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्रियाएँ आदि कभी भी निन्दनीय द्रव्य अथवा कर्मके रूपमें विवेचित नहीं हुई हैं। परन्तु निन्दनीय द्रव्य-व्यवसायी और हीनकर्मोंसे जीविका उपार्जन करनेवाले निम्न-व्यवसायावलम्बियोंकी सामाजिक स्तरकी श्रेष्ठता हिन्दु समाजमें स्वीकृत नहीं हुई है। श्रीकृष्णदासके वर्णके सम्बन्धमें विभिन्न मतोंका पोषण करनेवाले व्यक्ति तीन (ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य) उच्च वर्णोंमेंसे किसी एक कुलमें उनके आविर्भूत होनेके विषयमें अपना-अपना विचार प्रदर्शित करते हैं। साहित्य और अलङ्कारादि कलापुष्ट काव्यशास्त्रके विद्वान लोकविचारसे अपनी पारदर्शिताके फलस्वरूप 'कविराज'-नामसे ख्याति प्राप्त करते थे। चिकित्साशास्त्र-कुशल सम्प्रदायमें भी अनेक स्थानोंपर 'कविराज'-संज्ञा प्रदान होने से, कोई-कोई श्रीकृष्णदासको 'वैद्य' भी कहते हैं। दर्शनशास्त्रमें इनकी अगाध दक्षता और श्रुति-स्मृति-न्याय-तीन प्रस्थानोंमें इनका असामान्य अधिकार और प्रतिभा देखकर इनको ब्राह्मणकुलमें आविर्भूत समझना भी प्रतिवाद करने योग्य नहीं है। पूर्वाश्रममें वास करते हुए [महाप्रभुकी आज्ञासे पिताजीकी सम्पत्तिकी देखभाल करते समय] श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके बुद्धि-कौशलादि मर्यादापूर्ण वाक्योंसे और वैषयिक कूटबुद्धिके निजश्रेणी-सम्पर्कित-ज्ञानसे [अर्थात् विषयोंमें लिप्त दुर्बुद्धिके कारण ग्रन्थकार श्रीकृष्णदासको अपने समान मानकर] आदरकी शिथिलताके विचारसे भी उनको कायस्थ कुल भास्कर प्रतिभावित कुलचन्द्रके रूपमें अर्थात् कायस्थकुलके सूर्यरूपी श्रीरघुनाथदास गोस्वामीसे प्रतिभावित कायस्थकुलके चन्द्ररूपमें श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीको धारण करना भी नितान्त असङ्गत नहीं है। 'साहित्यदर्पण'-नामक प्रसिद्ध अलङ्कार-ग्रन्थके प्रणेता त्रैलङ्गदेशीय श्रीनरहरितीर्थके पूर्वाश्रमस्थ कुलचन्द्र विश्वनाथ-कविराज आन्ध्र पञ्च-ब्राह्मण समाजके ही एक व्यक्ति हैं; और 'काव्यप्रकाश'-नामक अलङ्कार शास्त्रके अध्यापक शूद्र रामदास, बङ्गला भाषामें महाभारतके विवरणकी रचना करने वाले काशीरामदास और भरतमल्लिकादि गौड़ीय साहित्यिकजनोंके वर्ण निरूपणमें भी ऐसा मतभेद देखा जाता है।
“ग्रन्थकारका आश्रम”
ग्रन्थकारके आश्रम विचारसे हम उनको श्रीमदनगोपालके सेवकरूप कुलमें ही स्थित जानते हैं। उनकी कुलोचित विष्णुभक्ति-जो उनके भाईके परिचयसे अभिव्यक्त हुई है, उसके द्वारा भाईके साथ उनका संसारमें एकत्र रहनेका विच्छेद हुआ था। वे झामटपुरमें अपने घरपर रहते समय गृहस्थ थे या नहीं, इस विषयमें उन्होंने कुछ भी उल्लेख नहीं किया है। अपने कनिष्ठ भ्राताको श्रीनित्यानन्दके प्रति श्रद्धाविहीन देखकर उसके भावी सर्वनाशको देखा। सर्वनाश-शब्दसे भक्तिहीनता अर्थात् मायावादी बन जाना लक्षित होता है। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञासे उनका समस्त अनर्थोंसे निवृत्त होकर वृन्दावन-गमन ही आश्रमान्तर-प्राप्तिका उज्ज्वल दृष्टान्त है। पूर्वाश्रममें अवस्थान करते समय उनके आश्रम-निर्णयमें भी मतभेद देखा जाता है। कोई-कोई कहते हैं कि ब्रह्मचर्यसे सहसा श्रीवृन्दावन जानेवाले पथका यात्री बनना सहज है; अन्यथा काँटोंसे पूर्ण संसारके बन्धनको छिन्न-भिन्न करनेके प्रसङ्गमें हमें कविराज गोस्वामीसे अनेक बातें
भूमिका | V