श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 12, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंयह ग्रन्थ १५१२ शकाब्दमें रचित हुआ था। अतएव १५१२ शकाब्दके बादमें ही उनके ग्रन्थकी रचना हुई। श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटकका रचनाकाल १४९८ शकाब्द है। राढ़ीय श्रीनिवासके (?) १४८९ शकाब्दके बाद तथा राघवानन्दके 'दिनचन्द्रिका' १५२१ शकाब्दसे पहले 'अष्टाविंशतितत्त्व'-प्रणेता स्मार्त्त रघुनन्दनके द्वारा रचित 'एकदशीतत्त्व', 'मलमासतत्त्व'से उद्धृत-वचन आदिका उल्लेख भी उनके ग्रन्थमें देखा जाता है। इसलिये इन सभी ग्रन्थोंके परवर्ती कालमें ही श्रीचैतन्यचरितामृत लिखा गया है। श्रीगौरसुन्दरके पार्षद-प्रवर श्रीरघुनाथदास गोस्वामीने अपने 'दानचरित' ग्रन्थके अन्तमें श्रीकृष्णदासका नाम उल्लेख किया है। श्रीकृष्णदास द्वारा रचित 'श्रीगोविन्दलीलामृत' ग्रन्थके अन्तिम श्लोकमें वृन्दावनवासी गोस्वामी-गोपालभट्ट आदिकी समसामयिकता प्रकटित हुई है। इन सभी तथ्यों तथा अन्यान्य समसामयिक कार्योंसे ऐसा अनुमान होता है कि उनका प्रकटकाल अनुमानतः १४५२ से १५३८ शकाब्द तक होनेकी सम्भावना है। १४३२ शकाब्दके बाद श्रीवृन्दावनदास ठाकुरका आविर्भाव काल है। यह महाग्रन्थ—उनके द्वारा रचित ग्रन्थका परिशिष्टस्वरूप है। और फिर, १४३५ शकाब्दसे पहले ही श्रीजीवगोस्वामी प्रभुका आविर्भाव काल है। ग्रन्थरचना-कालके वृन्दावनवासी समसामयिक भक्तोंकी तालिकासे जाना जाता है कि उस समय गदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य अनन्ताचार्यके शिष्य श्रीगोविन्ददेवकी सेवाके अध्यक्ष पण्डित श्रीहरिदास, काशीश्वर गोस्वामीके शिष्य गोविन्दके प्रिय सेवक गोविन्द-गोस्वामी, श्रीरूपगोस्वामीके सङ्गी यादवाचार्य गोस्वामी, श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य भूगर्भ गोस्वामीके शिष्य गोविन्ददेवके पुजारी चैतन्यदास, मुकुन्दानन्द-चक्रवर्ती, प्रेमविग्रह कृष्णदास, श्रीअद्वैतप्रभुके शिष्य शिवानन्द-चक्रवर्ती, गोसाञिदास पुजारी आदि वैष्णवगण वर्तमान थे। ग्रन्थ-रचनाके समय श्रीजीव, श्रीगोपालभट्ट, श्रीरघुनाथदास, श्रीरघुनाथभट्ट, श्रीरूप और श्रीसनातन गोस्वामी—ये छह गोस्वामी अथवा श्रीभूगर्भ गोस्वामी आदि कोई भी वर्तमान नहीं थे। यदि उनमेंसे कोई प्रकट होते, तो उनसे अनुमति-ग्रहण करने आदिका उल्लेख अवश्य होता। “ग्रन्थकारका वर्ण अथवा जाति” ग्रन्थकारके वर्ण निरूपणमें भी अनेक मतभेद देखे जाते हैं। श्रीकृष्णदास 'श्रीगोविन्दलीलामृत'-नामक एक अति बृहद् संस्कृत काव्यग्रन्थकी रचना करके वैष्णवसमाजमें 'कविराज' नामसे प्रसिद्ध हुए। गौड़देशमें ब्राह्मण, कायस्थ और वैद्य—ये तीन जातियाँ बहुत दिनोंसे सुशिक्षित-श्रेणीके नामसे परिचित हैं। नवशाखा* और उनके वर्णसमूहका विद्यानुशीलनमें अधिक दक्षता प्रदर्शित न करनेपर भी उनकी सामाजिक-मर्यादाके मध्यम-स्तरके विषयमें कोई प्रतिवाद नहीं हो सकता। इस जातिके लोग विद्या-व्यवसायके स्थानपर वस्तुओंके क्रय-विक्रय और सामाजिक अनुष्ठानके सहायक कर्मोंमें नियुक्त हैं। उनके वस्तु-द्रव्यरूपी व्यवसाय और श्रम-कर्मजीवनकी आनुष्ठानिक *खाद्य मसालोंके व्यापारी, माला बनानेवाले, बुनकर या जुलाहे, ग्वाले, नाई, पनवाड़ी, लोहार, कुम्हार और हलवाई—ये नौ हिन्दु जातियाँ 'नवशाखा'के नामसे जानी जाती हैं। iv | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत