भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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व्यक्तियोंका प्रतिपाद्य विषय होनेके कारण निज-कल्याण और समस्त जगत्के परम-मङ्गल-विधानके उद्देश्यसे ही भक्तमण्डलीके अनुरोधसे ग्रन्थकारने इस ग्रन्थकी रचना करनेका प्रयास किया है। जीवके नित्यधामका परिचय, नित्य-आश्रयका परिचय और स्वरूपकी अनभिज्ञतासे तात्कालिक विमुखताके कारण ही मायिक राज्यके अधिवासी होनेके कारण विवर्त्त-अनुभूति (अनित्य शरीरमें 'मैं' की बुद्धि), सेव्यके भजनमें उदासीनता एवं अपने नित्य प्रयास अर्थात् श्रीकृष्णसेवाकी विस्मृति होनेके कारण जाड्य उपस्थित होनेपर परमकरुण ग्रन्थकारका हृदय अत्यन्त परदुःख-कातर तथा जगत्‌का वास्तविक मङ्गलप्रार्थी है। निज-भजन समृद्धिके विषयमें और एकमात्र लोकहितकर नित्यकर्मानुष्ठानमें प्रवृत्त होकर ही अमृत प्रदान करनेवालेके रूपमें ग्रन्थकारने इस अपूर्व ग्रन्थका प्रकाश किया है। “ग्रन्थकारका देश" श्रीचरितामृतके रचियताके माता-पिताके द्वारा प्रदत्त नाम क्या था, यह हम नहीं जानते हैं। उनके पिता और माताके जिन नामोंका तथा अनुष्ठानोंका जो उल्लेख मिलता है, वे सत्य हैं या नहीं, इस विषयमें कोई ठोस प्रमाण नहीं है। पारमार्थिक जीवनमें वे 'कृष्णदास'के नामसे परिचित थे। इस ग्रन्थमें आदि-लीलाके पाँचवें अध्यायमें उन्होंने अपना जो परिचय प्रदान किया है, उससे हमें पता चलता है कि उनका जन्म 'झामटपुर' नामक ग्राममें हुआ था। झामटपुर ग्राम नैहाटि-नामक ग्रामके निकट है। वर्द्धमान-जिलेके अन्तर्गत काटोया-महकुमारके उत्तर दिशामें दो कोसकी दूरीपर गङ्गाके पश्चिम तटपर नोलेपुर नामक एक ग्राम है, वहाँसे दो कोस पश्चिमकी और तथा वर्तमान सालार नामक रेलवे स्टेशनके निकट झामटपुर है। उनके पूर्वाश्रमके स्मृतिचिह्न-स्वरूप वहाँपर एक श्रीगौर-नित्यानन्दकी सेवा अभी भी वर्तमान है। वहाँ रहनेवाले उनके पूर्वाश्रमके परिवारजनोंके वंशजोंमें कुछ लोग अभी वर्तमान हैं, परन्तु वे श्रीकृष्णदासका इससे अधिक कोई परिचय नहीं देते हैं। स्वप्नमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी आज्ञा पाकर इन्होंने झामटपुर छोड़कर जीवनके अन्तिम दिन तक श्रीवृन्दावनमें वास किया था। श्रीवृन्दावनमें श्रीराधादामोदर मन्दिरमें अभी भी श्रीकृष्णदास कविराज गोस्वामीकी समाधिके दर्शन होते हैं। “ग्रन्थ और ग्रन्थकारके कालका विचार" श्रीकृष्णदासके काल निर्णयके सम्बन्धमें हम कुछ घटनाओंको प्रमाणरूपमें स्वीकार कर सकते हैं। कुछ पुस्तकोंके अन्तमें १५३७ शकाब्दिमें ग्रन्थ समाप्तिका समय कहकर एक श्लोक देखा जाता है,- “शाके सिन्ध्वग्नि-वाणेन्दौ ज्येष्ठे वृन्दावनान्तरे। सूर्यहैऽसितपञ्चमयां ग्रन्थोऽयं पूर्णतां गतः॥" यह श्लोक किसी-किसीके मतसे लिपिकारका है, ग्रन्थकारका नहीं। ग्रन्थके अन्दर उन्होंने जिन ग्रन्थोंके नाम उल्लेख किये हैं, उनमें श्रीगोपालचम्पूका नाम हम देखते हैं। भूमिका | iii