श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआदर्शोंके एकमात्र आदर्श औदार्यविग्रह और मूल-आदर्श स्वयंरूप ऐश्वर्य-माधुर्य-विग्रह अद्वयज्ञान श्रीकृष्ण हैं। श्रीचैतन्यदेव-महावदान्य, श्रीकृष्णप्रेम-दाता, दयानिधि और समस्त मङ्गलोंके निवास हैं। वे नित्यलीलामय सच्चिदानन्द-विग्रह होनेपर भी जीव-जगत्के सर्वोपास्य नित्य-भजनीय वस्तु हैं। उनके स्वयंरूपके प्रति प्रीतिमय होनेपर ही जीव मायिक बद्धदशाका अतिक्रम करके अपने स्वरूपमें अवस्थित होते हैं। जो सब जीव केवल चेतन-धर्ममें स्वयंको प्रतिष्ठित जाननेका सौभाग्य प्राप्त करते हैं, वे ही अचित्-शक्ति मायाके हाथोंसे मुक्त होकर श्रीचैतन्यदेवके सेव्य (श्रीकृष्ण) स्वयंरूपके, गुणके, परिकर-वैशिष्ट्यके और लीलाके सेवोपकरण स्वरूपमें प्रवेश कर सकते हैं। जड़भोगी बद्धजीवोंके कर्मानुष्ठानका इतिहास अनित्य कर्मनिपुण व्यक्तियोंके उत्साहको बढ़ाता है, दूसरी ओर श्रीचैतन्यलीला अनित्य-कर्मफल-त्यागमें लगे हुए मुक्त पुरुषोंकी नित्य सुप्त-वृत्तिको जाग्रत करनेवाली है। कालके अधीन जीवोंकी क्षण-भङ्गुर क्रियाएँ ही 'चरित्र' शब्दके द्वारा कही जाती हैं; किन्तु श्रीचैतन्यचरित नित्य है और श्रीचैतन्यचरितका आदर्श जीवोंकी भोग बुद्धिको नष्ट करके उन्हें स्वरूपकी नित्य-सेवावृत्तिमें प्रतिष्ठित कराता है।
“अमृत”
कर्मफलके अधीन मायाबद्ध जीव अपने किये गये कर्मोंके शुभाशुभ फल निर्दिष्ट कालके लिये भोगनेके लिये बाध्य हैं। वैसी कर्मभूमिमें विचरण करने वाले प्राणियोंकी कर्मानुष्ठान-तालिका ही भोगोंका आवाहन करने वाली है। किन्तु श्रीचैतन्यचरित भोगमय और भोगत्यागपर अनुष्ठान-विशेष नहीं है; यह जीवोंके लिये कर्मफल-मोचनी चेष्टा-सुधा एवं निर्भेद-ब्रह्मानुसन्धान-नाशक 'अमृत' है। कर्मवीर, ज्ञानवीर और अन्यभिलाषी व्यक्तियोंके अनित्य प्रयासोंके साथ श्रीचैतन्यचरितामृतकी अखण्डकाल-वर्तमान नित्यलीलाका सादृश्य होनेपर भी यह कालक्षोभ्य नहीं है। दोनोंमें समानता होनेपर भी अद्वयत्व सिद्ध नहीं है अर्थात् दोनों एक नहीं हैं, मायिक और वैकुण्ठके भेदसे उन दोनोंमें नित्य-वैशिष्ट्य वर्तमान है। मायाके जन्म-स्थिति-ध्वंसमें अनेक प्रकारके अभाव और असम्पूर्णता विराजमान हैं, किन्तु वैकुण्ठ वस्तुमें जो जन्म, स्थिति और अप्राकट्यका भाव वर्णित होता है, उसमें न्यूनता, हेयता, अकल्याणता, असम्पूर्णता आदिका तनिक भी अधिष्ठान नहीं है। इसलिये भगवान्की लीला नित्य है तथा मर्त्य-जगत्में प्रकटित होनेपर भी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे मायिक सृष्टिसे अपने प्राकट्य-वैशिष्ट्यके संरक्षणमें सब समय समर्थ है।
“ग्रन्थकी प्रयोजनीयता”
श्रीचैतन्यलीलाका वर्णन और श्रवण-जीवमात्रका एकमात्र प्रयोजनीय विषय है। सर्वमूलाश्रय-वस्तुके अनुशीलनके बिना मायिक अनुभूतिवाले जीवोंकी कोई अन्य गति नहीं है। यही विशेषज्ञ
ii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत