भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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॥ श्रीश्रीगुरुगौराङ्गौ जयतः ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत-भूमिका “भूमिका लिखनेका कारण” श्रीचैतन्यचरितामृतके सभी श्रेणीके पाठकोंके पक्षमें ग्रन्थ पाठ करनेसे पूर्व ग्रन्थके सम्बन्धमें अथवा ग्रन्थमें वर्णित विषयोंको समझनेके लिये जिस योग्यताकी आवश्यकता है, उसके अनुकूल कुछ विचार भूमिकामें लिखे गये हैं। इसके द्वारा विषयवस्तु विस्तृत रूपसे वर्णित होनेपर मूलग्रन्थके पाठ करनेसे पूर्व पाठकोंके भ्रमकी आशङ्का प्रायः दूर हो जायेगी, मैं ऐसी आशा करता हूँ। “तीन श्रेणीके पाठक” श्रीचैतन्यचरितामृतके पाठक तीन भागोंमें विभक्त हैं। एक श्रेणीके पाठक कौतूहल-वशतः ग्रन्थकी आलोचना करनेमें प्रवृत्त होते हैं; और एक अन्य श्रेणीके पाठक ग्रन्थ पाठ करके अपने अमङ्गलको वरण करनेके लिये विद्वेषपूर्वक ग्रन्थका पाठ करते हैं; तथा तीसरी श्रेणीके पाठक अपने कल्याणके उद्देश्यसे ग्रन्थका मनोयोगपूर्वक पाठ करके सत्यानुशीलन करके पाठका वास्तविक फल प्राप्त करते हैं। कौतूहली पाठक पाठ करते-करते दूसरी अथवा तीसरी श्रेणीमें शीघ्र ही अपने आपको प्रतिष्ठित करते हैं। साधारण पाठक अपनी 'भ्रम'-धारणासे, 'प्रमाद' अर्थात् असावधानीके कारण, 'विप्रलिप्सा' अर्थात् धोखा देनेकी प्रवृत्तिके वशसे और 'करणापाटव' अर्थात् इन्द्रियोंकी सीमित क्षमताके कारण नित्य, पूर्ण, शुद्ध और निरपेक्ष सत्यको ग्रहण करनेमें असमर्थ हैं। भ्रम-प्रमाद-विप्रलिप्सा-करणापाटव-इन चार दोषोंके हाथोंसे मुक्त होनेके लिये उन्हें श्रौतपन्थाको अर्थात् गुरुमुखसे श्रवण-विधिको अवश्य ही स्वीकार करना पड़ेगा। अश्रौत अथवा तर्कपन्था कभी भी उनको वास्तविक-सत्यमें प्रतिष्ठित नहीं होने देंगे। हम क्रमशः श्रौत और अश्रौत-इन दो पन्थोंके विषयमें विस्तृत रूपसे आलोचना करेंगे। “श्रीचैतन्य” कर्म-जगत्में उपकरण-सूत्रसे प्राणीमात्र ही जिनके उद्देश्यसे सब प्रकारके अनुष्ठान करके फल प्राप्त करनेमें सफल होते हैं, वे विश्वम्भर ही ज्ञानभूमिकामें समस्त चैतन्यविशिष्ट जीवोंके चरमफल प्राप्तिका एकमात्र सोपान होकर 'श्रीकृष्णचैतन्य' नामसे परिचित हैं। वे जगत्के सभी