भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 14, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 14

ही सुननेको मिलतीं। अन्य विचारसे ऐसी युक्ति भी प्रदर्शित होती है कि सांसारिक विषयोंका वर्णन विशेषतः अपनी भोगमयी धारणाकी स्मृति भजनपथके पथिकके लिये उचित नहीं है, इसलिये कविराजने अपनी दुस्तज्य सांसारिक बातोंकी चर्चा नहीं की। जो भी हो, श्रीवृन्दावन-गमनके बादमें वे गृहकथाके प्रति उदासीन होकर हरिकथामें मग्न थे; वह तृतीय (वानप्रस्थ) या चतुर्थ (संन्यास) आश्रमोचित हरिभजन परायण जीवन है। आश्रमातीत निष्किञ्चन पारमहंस्य-अवस्थामें ही ग्रन्थकारके द्वारा इस ग्रन्थकी रचना हुई है। “ग्रन्थकारके स्वजन” श्रीकृष्णदास-वे अपने पारमार्थिक आत्मीय-समाजमें ‘कविराजगोस्वामी’-नामसे प्रसिद्ध हैं। ठाकुर श्रीनरोत्तमदासने उनको वृन्दावनके रसिक भक्तोंका ‘केन्द्र’ कहकर अभिहित किया है। श्रीचरितामृतके प्रत्येक अध्यायके अन्तमें उन्होंने श्रीरूप गोस्वामी और श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके नितान्त अनुगतजनके रूपमें अपना आत्म-परिचय दिया है। श्रीकविराज गोस्वामी अपने प्रकटकालमें ‘श्रीरूपानुगवर’के नामसे प्रसिद्ध थे। अन्तरङ्ग भक्तमण्डलीके वे गुरुदेव हैं। श्रीनरोत्तमदास ठाकुरमें श्रीकृष्णदासका आनुगत्य सुन्दर रूपसे प्रतिफलित हुआ है। ब्रजवासी षड्गोस्वामियोंको उन्होंने अपना ‘गुरु’ कहकर निर्देश किया है। श्रीनित्यानन्द प्रभु-जगद्गुरु हैं तथा श्रीकृष्णदासको ‘श्रीराधागोविन्द’की सेवा प्रदान करने वाले हैं। उन्हींकी कृपासे उन्होंने श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीरघुनाथदास और श्रीजीवकी कृपा प्राप्तकी थी। वे तात्कालिक वृन्दावनवासी भक्तोंके प्राणस्वरूपमें वर्तमान थे। श्रीकृष्णदास श्रीचैतन्यदेवके द्वितीय स्वरूप श्रीदामोदरस्वरूपके एकान्त अन्तरङ्ग श्रीदासगोस्वामी प्रभुके प्रति नितान्त अनुरक्त थे। यौन-सम्बन्ध और प्राकृत परिचयके सम्बन्धमें उन्होंने केवलमात्र गुरुद्रोही भ्राता-सङ्गके त्यागकी घटनाका ही उल्लेख किया है, अन्य सभी विषयोंमें वे मौन हैं। श्रीचैतन्यचन्द्रके भक्तोंके अतिरिक्त उनमें अन्य किसीके भी प्रति अपने आत्मीय-स्वजन होनेका ज्ञान नहीं था। “ग्रन्थकारका स्वभाव” श्रीकृष्णदासके वैष्णवोचित स्वभावकी तुलना नहीं है। वैराग्यके चरम आदर्श श्रीदासगोस्वामी प्रभुको वे जिस प्रकार सहृदय आराध्य रूपसे मानते थे, वह बात श्रीदासगोस्वामीकी स्नेहसिक्त-लेखनीमें और श्रीकृष्णदासकी अपनी रचनाओंमें स्वर्णाक्षरोंमें देदीप्यमान है। पाण्डित्य-प्रतिभामें प्रचुर परिमाणमें समृद्ध होनेपर भी कायमनोवाक्यसे उनके दैन्यके आदर्शने जगत्के उस प्रकारके सभी आदर्शोंको ही निर्विवाद भावसे पराभूत किया है। जब भी श्रीचैतन्यचरितामृतके पाठक ग्रन्थकारके असामान्य निज परिचयकी बातकी आलोचना करते हैं, तब उन पाठकोंकी जितनी भी अहंकारसे पुष्ट बुद्धि क्यों न हो, तो भी यह निश्चित रूपसे कहा जा सकता है कि सभी प्रकारके पाठकोंमें ही सिर झुकाकर दैन्य ग्रहण करनेकी स्पृहा बलवती होगी। vi | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत