श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्रीचैतन्यदेव-कथित 'तृणादपि'-श्लोकमें सुदीक्षित इन महत्तम ग्रन्थकारके द्वारा रचित कुछ पंक्तियोंको उद्धृत करनेका लोभ मैं सम्वरण नहीं कर पाया। उन्होंने लिखा है— “जगाइ माधाइ हैते मुञिसे पापिष्ठ। पुरीषेर कीट हैते मुञिसे लघिष्ठ॥ मोर नाम सुने येइ, तार पुण्य क्षय। मोर नाम लय येइ, तार पाप हय॥” (आदि ५/२०५-२०६) ग्रन्थकार श्रीचैतन्यके ऐकान्तिक भक्त हैं, इसलिये परम-वैष्णव हैं। वैष्णवोंके शरीरमें सभी महान् गुण सदैव विराजमान रहते हैं अर्थात् वैसे सर्वगुणसम्पन्न व्यक्ति ही वास्तवमें वैष्णव हैं। कविराज गोस्वामीने इस ग्रन्थकी मध्य-लीलाके बारहवें अध्यायमें (७५ संख्यासे ७७ संख्या तक) इन छब्बीस गुणोंका इस प्रकार वर्णन किया है— “कृपालु, अकृतद्रोह, सत्यसार-सम। निर्दोष, वदान्य, मृदु, शुचि, अकिञ्चन॥ सर्वोपकारक, शान्त, कृष्णैकशरण। अकाम, निरीह, स्थिर, विजित-षड्गुण॥ मितभुक्, अप्रमत्त, मानद, अमानी। गम्भीर, करुण, मैत्र, कवि, दक्ष, मौनी॥” उनके अपने चरित्रमें और अनुष्ठानमें यह आदर्श परिस्फुट है एवं उनकी लेखनीकी प्रत्येक पंक्तिमें उनकी कृष्णैकशरणता देखी जाती है। उनके असीम अकृतद्रोहिता, मित्रता, मानदत्व, अमानिता, अकामता, कृपालुता, वदान्यता, सर्वोपकारकता और कारुण्यादि गुण ग्रन्थकी प्रत्येक उक्तिमें ही पाठकोंका चित्त आकर्षित करते हैं। बाह्यजगत्की वस्तुकामनामें चेष्टा-राहित्य, स्थिरता, शौच, अकिञ्चनता, शान्ति और इन्द्रिय-तर्पणके प्रतिकूलमें उनकी समता, सत्यसारता, निर्दोषिता, अप्रमत्तत्व, गाम्भीर्य, मौनित्व, मृदुता, दक्षता, काव्य और षड्वेग-विजयित्व जाज्वल्यमान हैं। उनकी पाकशास्त्र-कुशलता और भगवत्सेवामें अनेक प्रकारके परमास्वादपूर्ण वस्तु अर्पण करनेकी प्रवृत्ति-उदर और जिह्वा-लम्पट व्यक्तियोंके ईर्ष्या-मात्सर्य-दमनकी एकमात्र महा-औषधि है; तथापि भाग्यहीन लोग अपने दुर्भाग्यवशतः भवरोग-नाशक वैद्यकी चिकित्सा प्रणालीमें दोष दर्शन करते हैं। इसी वैष्णव ईर्ष्याके फलस्वरूप उनके प्रति भगवद्-दण्ड (माया-बन्धन) है।
“ग्रन्थकारकी दक्षता”
श्रीचैतन्यदेवकी लीला वर्णन करनेमें हम श्रीकृष्णदासकी सभी शास्त्रोंमें अगाध पाण्डित्य-प्रतिभा, अति गहराईसे पारमार्थिक-दर्शनमें असामान्य प्रवेश और लोकबोध्य करानेकी अभूतपूर्व सूक्ष्मविचार दक्षता एवं काव्य, पुराण, इतिहास, स्मृति और गणित-पारदर्शिताका दर्शन करके विस्मित होते हैं। विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसे अलौकिक साहित्यका पाठ करनेके लिये पृथ्वीके
भूमिका | vii