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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 16

विभिन्न प्रदेशीय विद्वत्-समाज किसी-न-किसी दिन बङ्गला भाषामें अधिकार प्राप्त करनेमें उन्मुखी होंगे। कविराज गोस्वामीकी पाकरचना-कार्यमें कुशलता गुणी व्यक्तियोंसे मुक्तकण्ठसे प्रशंसाका आकर्षण करती है। उनकी भावमाधुर्य-पराकाष्ठा जगत्के विभिन्न काव्य-समाजकी परमलोभनीय रीति है। बौनेका प्रबल इन्द्रियचाञ्चल्यसे उठा हुआ छोटासा हाथ परम उच्च गगनभेदी माधुर्य-ऐश्वर्यको स्पर्श करनेमें समर्थ नहीं होनेपर भी उस बौनेके समान जड़रस-प्रमत्त विलासपर व्यक्ति प्रेममय कविराज गोस्वामीके प्रशंसक बने बिना रह नहीं सकते। मधुररस-वर्णनमें उनके गाम्भीर्यको माँपने वाले अधिकारी भी दुर्लभ हैं। ग्राम्यरस-रसिक सिद्धान्तविरोधी मतवाद लेकर इस ग्रन्थकी आलोचना करनेपर विषम विरसरूप कीचड़में निमग्न होते हैं।

“ग्रन्थका फल”

श्रीचैतन्यचरितामृतके लेखकने अपने ग्रन्थमें एक ही साथ महाप्रभुकी लीला-सहित परम निगूढ़ तत्त्वशास्त्रका अपूर्व समावेश प्रदर्शन करके पाठकके लघुहृदयकी जड़भोग-तात्पर्यपरताका ह्रास किया है। केवलमात्र विचार-परायण तत्त्व-आलोचनाका गुरुभार (बहुत बड़ा भार) पाठकके मस्तिष्कमें बैठानेकी चेष्टा करनेपर उनके इस अलौकिक निबन्धके पाठक मिलना कठिन होता। और, कुतर्कपूर्ण जड़विचारप्रिय लोगोंकी उनके सिद्धान्त-विपर्ययसे रक्षा करनेके लिये चरितामृतकी विषयमालाने जो उपकार किया है, उस विषयमें कुछ कहना ही बाहुल्यमात्र है। लोक-परम्परा-पाठकोंके रुचिगत विवर्त्तवाद पोषणकी विषम-पकड़से विद्वान कहे जानेवाले लोगोंका परित्राण-कार्यरूप दयाका यही एक अद्भुत चित्र है। गृह-धर्मपर ग्राम्यकाव्यसुखामोदी (लौकिक काव्योंमें ही सुख प्राप्त करने वाले) व्यक्ति मधुर-रसाभास-प्राप्तिके लिये जिस लोभके वशवर्ती हैं, उसी प्रकारके विषयोंके छलके द्वारा पाठकोंको वैकुण्ठतक उठानेका कार्य ग्रन्थकारकी अचिन्त्य शक्ति है। वैष्णवसेवा-वञ्चित भोग-परायण ग्राम्यरस-निपुण इन्द्रियसुख-लिप्त सम्प्रदाय श्रीचरितामृतके पद गान करके भी विषयरसमें मत्त होकर किस प्रकार अपने-अपने अपकार-साधनमें सिद्धहस्त (दक्ष) हुए हैं, उसको कहना ही बाहुल्य है; और उस एक ही विषयको अवधारण करनेसे भाग्यवान् वैष्णवसेवा-रत लोग विषयरूपी कीचड़से निकलकर सद्गतिको प्राप्त हुए हैं। कहाँ तो नरकके समान विषय-पिपासाकी यन्त्रणा और कहाँ अमृतपानसे मृत्यमय जगत्की यन्त्रणामय वायुके सङ्कोचवशतः वैकुण्ठकी समीरसे सञ्जीवित होनेका सौभाग्यलाभ ? इसलिये इस ग्रन्थको पण्यद्रव्य अर्थात् क्रय-विक्रयवाली लौकिक वस्तुके समान दग्धोदरपूरण-इन्द्रियविलाससम्भार अर्थात् उदरपूर्ति आदि करनेवाली इन्द्रियविलासकी सामग्रीके आकर्षणसे आकृष्ट होकर इस ग्रन्थके पाठके द्वारा स्वयंको 'साधु' कहलाकर प्रतिष्ठा लाभ करनेका प्रयास एक ही साथ भगवद्विमुखताके साथ लोकवञ्चना और आत्मवञ्चना-मात्र है। जिसकी जो प्रार्थना है, ग्रन्थानुशीलनरूप कल्पतरुके सेवनसे उसको उसकी प्राप्ति होती है। मधुरसके भावसमूह-वर्णनके समय अपार गाम्भीर्यने इस ग्रन्थकी मर्यादाको प्रचुर परिमाणमें

viii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला) · पृष्ठ 16, कुल 2549 में से · BharatKosha