श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्वर्धन किया है। विरोध-बुद्धिसे अपसम्प्रदायके लोग जिस आख्यायिका अर्थात् कहानीके छलसे श्रीजीवगोस्वामीके द्वारा इस ग्रन्थके असम्मानकी कल्पना करते हैं, उसके द्वारा भी ग्रन्थका यश-सौरभ सभी दिशाओंमें व्याप्त हुआ है। ऐसे कपटी लोगोंके अपराधमय काल्पनिक वाक्यरूपी अनेक अत्याचार, जैसे—'अपनी प्रतिष्ठा लघु होनेके भयसे श्रीजीवगोस्वामीने ईर्ष्या-परवश होकर इस ग्रन्थकी मूल प्रतिलिपिको यमुना नदीमें फेंक दिया आदि', वस्तुतः श्रीचैतन्यचरितामृत और षट्सन्दर्भ पाठकोंके निकट कोई कुफल उत्पादन नहीं कर पाये; पक्षान्तरमें, उसके द्वारा उनकी नीचता, वैष्णव-विद्वेष और गुरुद्रोहाितारूप इन्द्रिय-चाञ्चल्य ही सुष्ठु भावसे प्रकाशित हुए हैं। श्रीजीवगोस्वामीके प्रति भक्तिविद्वेषी कपट-सम्प्रदायका विद्वेष स्वकीय और पारकीय विचारके तर्कके आश्रयमें अथवा दिग्विजयीके दमनके उपलक्ष्यमें श्रीकृष्णदासके तथा उनके ग्रन्थोंके प्रति पाठकोंमें रुचिविकार उत्पादन करनेमें समर्थ नहीं हुआ, अपितु उसने इन आचार्योंके सम्मानको परिपोषण करके एक प्रकारसे षड्गोस्वामियोंकी श्रीचैतन्य-सेवाके सौन्दर्यको ही सम्वर्द्धित किया है। “ग्रन्थके उपकरण” भक्तितत्त्वके अनुकूल श्रीचैतन्य-लीलाका वर्णन करते हुए ग्रन्थकारने किस-किस उपकरणके बलसे इस अपूर्व ग्रन्थको पाठकोंके लिये सहज-उपलब्ध करा दिया है, उसकी एक संक्षिप्त सूची यहाँपर उपस्थित करना अप्रासङ्गिक नहीं है। लीला-विषयके उपकरणरूपमें हम देखते हैं कि, आदिलीलाका मूल ग्रन्थ—श्रील वृन्दावनदास ठाकुर-रचित श्रीचैतन्यमङ्गल अथवा श्रीचैतन्यभागवत है। श्रीमुरारीगुप्तका श्रीचैतन्यचरित-नामक संस्कृत कड़चा, श्रीलोचनदासका श्रीचैतन्यमङ्गल तथा श्रीचैतन्यदास-रचित श्रीचैतन्यचरितामृत-नामक महाकाव्य उस समय लिखित होनेपर भी श्रील कविराज गोस्वामी इन सब ग्रन्थोंपर निर्भर नहीं थे। अन्यान्य कुछ आधुनिक या परवर्ती कालमें लिखित ग्रन्थोंको (जैसे, जयानन्दका चैतन्यमङ्गल, गोविन्ददासका कड़चा, वंशीशिक्षा, अद्वैतप्रकाश, नित्यानन्दवंश-विस्तार आदिको) 'प्राचीन' रूपसे निर्देश करनेमें हमारी प्रवृत्ति नहीं होती है; विशेषतः उनके तत्त्व और सिद्धान्तका विपर्यय, मूल उद्देश्यमें सङ्कीर्णता प्रतिपादन करनेका प्रयास और शिक्षाका अभाव आदिको लक्ष्य करके श्रीचैतन्यचरितामृतके 'मूल-ग्रन्थ'के रूपमें इन अपग्रन्थोंको कोई भी स्वीकार नहीं करता। श्रीकविकर्णपूर-रचित श्रीचैतन्यचन्द्रोदय-नाटक, श्रीरघुनाथदासके द्वारा कण्ठस्थ श्रीदामोदर स्वरूपका कड़चा, तात्कालिक श्रीवृन्दावनवासी-गोस्वामियोंके तथा उनके सङ्गियोंके सङ्गत वाक्योंकी आलोचना और कुछ प्राचीन पद ग्रन्थकारके प्रधान अवलम्बन थे। श्रीगौरसुन्दरके प्रचारित सिद्धान्त और प्रेमभक्ति-तत्त्वको सुयोग्यतापूर्वक वर्णन करते हुए उन्होंने वेद (संहिता, उपनिषद्, तापनी), सूत्रग्रन्थ, पञ्चरात्र, पुराण, धर्मशास्त्र, पूर्वाचार्य-रचित ग्रन्थ और अन्यान्य बहुविध ग्रन्थोंको उपकरणस्वरूपमें ग्रहण किया है। भूमिका | ix