भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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श्रीगौरका गुरुतुल्य व्यवहार, श्रीअद्वैतका श्रीकृष्णदास-अभिमानसे भक्तिप्रचार, श्रीकृष्ण-दास्यके सामने करोड़ों ब्रह्मसुख भी तुच्छ, लक्ष्मीकी भी कृष्णदास्य-प्रार्थना, श्रीनित्यानन्द-अद्वैतादि सभीकी ही श्रीगौरदास्यकी प्रार्थना, सख्य-वात्सल्य-मधुर रसमें यहाँ तक कि श्रीराधामें भी श्रीकृष्णदास्य, स्वयं-प्रकाशमें भी श्रीकृष्णदासाभिमान, श्रीकृष्ण ही सर्वसेव्य, भक्तावतारकी सर्वश्रेष्ठ मर्यादा, श्रीकृष्णके निकट भक्तका ही सर्वश्रेष्ठ सम्मान, श्रीकृष्ण-साम्यसे माधुर्यास्वादन असम्भव, श्रीसङ्कर्षण श्रीकृष्णके आदि भक्तावतार” आदि विषय-वर्णन। सातवाँ अध्याय (पृ. ३७८-४५१)— पञ्चतत्त्व निरूपण प्रसङ्गमें “प्रेमकी बाढ़, महाप्रभुके संन्यास ग्रहणका कारण, प्रेमसे वञ्चित दलोंका उद्धार, काशीके मायावादी, महाप्रभुका वृन्दावन-गमन, मार्गमें काशीमें अवस्थान, मायावादियोंके द्वारा महाप्रभुकी निन्दा, महाप्रभुके द्वारा उनकी उपेक्षा और मथुरागमन, मथुरा देखकर पुनः काशीमें आगमन और चन्द्रशेखरके घर ठहरना, सनातन गोस्वामीसे मिलन, प्रकाशानन्द-सभामें महाप्रभु, महाप्रभुका नाम-महात्म्यका कीर्तन, प्रेम-पञ्चम पुरुषार्थ, प्रेमका स्वभाव, श्रीकृष्णनामानन्द-सिन्धुके आगे ब्रह्मानन्द गोखुरके समान, वेदान्त सम्बन्धमें महाप्रभुका मत और व्याख्या, ईश्वर-वाक्य दोषशून्य, मुख्यवृत्ति और गौणवृत्ति-विचार, मायावाद या शाङ्करके मतके निराधार होनेका स्थापन, ब्रह्म-शब्दका मुख्यार्थ, मायावादसे विष्णुनिन्दा, शक्ति और शक्तिमान्, जीवतत्त्व, वस्तु-परिणामवाद, विवर्त्तवाद, विवर्त्तवाद-खण्डन, प्रणव, तत्त्वमसि, अभिधा और लक्षणा-वृत्ति, स्वतःप्रमाण वेदका अन्य कोई भी प्रमाणाभाव, महाप्रभुकी सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनात्मक ब्रह्मसूत्रके मुख्यार्थकी व्याख्या, संन्यासियोंका मति-परिवर्तन, महाप्रभुकी उनके ऊपर कृपा, महाप्रभुके दर्शनके लिये लोगोंकी भीड़, सनातन गोस्वामीको वृन्दावन भेजना, महाप्रभुका नीलाचलमें आगमन, स्वयं और प्रचारकोंके द्वारा भारतमें सर्वत्र नामप्रेमप्रचार और लोगोंका उद्धार, सेतुबन्ध तक भक्तिप्रचार” आदि विषयोंका कथन। xxxiv | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत