भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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वयस-भेदसे लीला-भेद, श्रीराधाका प्रेमबल, श्रीकृष्णमें जिस प्रकार परस्पर विरुद्ध धर्मोंका सामञ्जस्य वर्तमान है, श्रीराधामें भी उसी प्रकार है, विषय और आश्रयजातीय सुख, श्रीस्वरूप ही श्रीगौरावतारके गूढ़ रहस्यवेत्ता, गोपीप्रेमकी 'रूढ़भाव'-संज्ञा, काम और प्रेम, शुद्धभक्ति-प्रकारभेदसे श्रीकृष्ण-प्राप्तिके तारतम्यका विचार, गोपियोंके श्रीकृष्णप्रेमका परिचय, श्रीराधिका ही गोपियोंमें सर्वश्रेष्ठता, श्रीकृष्णके साथ गोपियोंका सम्पर्क, सम्भोग-रसविग्रह नन्दनन्दन ही विप्रलम्भ-रसविग्रह-श्रीगौर, रससिद्धान्तके अधिकारी, श्रीराधा-श्रीकृष्णका तुलना-विचार" आदि विषयोंकी अवतारणा।

पाँचवाँ अध्याय (पृ. २४८-३२९)- श्रीनित्यानन्द-तत्त्व निरूपणात्मक पाँच श्लोकोंकी व्याख्याके प्रसङ्गमें "श्रीबलदेव-तत्त्व, श्रीबलदेवकी पाँच रूपोंसे श्रीकृष्णसेवा, उसमेंसे शेषरूपसे दस-देहसे श्रीकृष्णसेवा, परव्योम और उसके ऊपरमें तीन कृष्णलोक, चिन्मय व्रजधामका श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रपञ्चमें प्रकाश, चर्मचक्षुओंसे श्रीधाममें प्रपञ्च-दर्शन, आदि-चतुर्व्यूह, कृष्णलोकमें श्रीकृष्णकी द्विभुज और परव्योम-वैकुण्ठमें चतुर्भुजलीला, श्री-भू-नीला शक्तियाँ, सायुज्यसे भिन्न चार प्रकारकी मुक्तियोंसे वैकुण्ठकी प्राप्ति, निर्विशेषवादीका ही सायुज्य स्थान-सिद्धलोक, निर्विशेष ब्रह्म, द्वितीय चतुर्व्यूह, कारणार्णव (कारण-समुद्र), गङ्गा कारणजलकी एक कणा, महत्स्रष्टा आदि-पुरुषावतार, प्रकृति जड़रूपा-जगत्की सृष्टिकी 'गौणकारण', श्रीकृष्ण ही मूल जगत्कारण, मूल सङ्कर्षण, महासङ्कर्षण और तीन पुरुषावतारोंका सम्बन्ध, मत्स्यादि समस्त अवतारोंके अंशी कारणाब्धिशायी, तीनों पुरुषावतारोंके कार्य, ईक्षणादि कार्योंके द्वारा मायासे सम्बन्ध होनेपर भी वस्तुतः पुरुष मायातीत, ईश्वर अचिन्त्यशक्तिमान्, ईश्वरमें और जगत्में भेदाभेद सम्बन्ध, ब्रह्माण्डका परिमाण, चौदह लोकोंकी उत्पत्ति, गर्भ-समुद्रमें वैकुण्ठधामप्रकाश, अनन्तशय्या, ब्रह्माका जन्म, सृष्टि-स्थिति-लय, सप्तसमुद्र, श्वेतद्वीप, विष्णुका शेषरूप, शेषकी दस देह, श्रीकृष्णको विष्णु-नामसे कहना दोषयुक्त नहीं-क्योंकि उनमें सब कुछ सम्भव है, श्रीकृष्ण ईश्वर और सब उनके दास, गुरुवर्गादि सभी उनकी लीलाके सहायक, ज्येष्ठ-कनिष्ठ अभिमान, मीनकेतन रामदास, गुर्णार्णव मिश्रके आचरणसे रामदासको क्रोध, निताइके बिना गौर और गौरके बिना निताइमें विश्वास भक्तिविरोधमात्र, श्रीकविराज गोस्वामी ठाकुरकी दैन्यज्ञापक आत्म-कहानी, अप्राकृत विग्रहमें प्राकृत शिलादि-बुद्धि महापराध" आदि वर्णन।

छठा अध्याय (पृ. ३३०-३७७)- श्रीअद्वैत-तत्त्व निरूपणात्मक दो श्लोकोंकी व्याख्यामें "श्रीअद्वैतका तत्त्व और महिमा, मायाके दो रूप-निमित्त और उपादान, कारणशायीकी दो मूर्तियोंसे सृष्टि-स्वयं 'निमित्त' और श्रीअद्वैत प्रभु 'उपादान' (अन्तर्यामी), सांख्यमतका खण्डन, श्रीअद्वैतकी दो मूर्तियाँ, श्रीअद्वैत महाविष्णुके अङ्ग या अंश होनेपर भी मायातीत, अङ्ग और अंशके तात्पर्य अर्थ, 'अद्वैताचार्य' और 'कमलाक्ष'-नामकी सार्थकता, वैकुण्ठमें विष्णु और वैष्णवका सारूप्य, आचार्यकी हुङ्कारसे श्रीचैतन्यावतार, श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैत महाप्रभुके अङ्ग, श्रीवासादि उपाङ्ग, श्रीअद्वैतके प्रति

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