श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्रीश्रीचैतन्यचरितामृत आदिलीला (पूर्वाद्ध) अध्याय-विवरण पहला अध्याय (पृ. १-४१)— तीन प्रकार मङ्गलाचरण, अवतारका मूल प्रयोजन, श्रीनित्यानन्द और श्रीअद्वैततत्त्व, पञ्चतत्त्व और सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजन-अधिदेवताके प्रणाममूलक सतरह श्लोक, उनके मध्य नमस्कारात्मक प्रथम दो श्लोकोंकी व्याख्यामें गुरुतत्त्व, चतुःश्लोकी भागवत, पञ्चतत्त्व-व्याख्या और श्रीचैतन्य-नित्यानन्द-स्वरूप एवं महात्म्य-कथन। दूसरा अध्याय (पृ. ४२-८७)— श्रीचैतन्यतत्त्व-निरूपणात्मक तृतीय श्लोककी व्याख्यामें ब्रह्म, परमात्म और भगवत्-विचार, श्रीकृष्णस्वरूप और उनकी तीन शक्तियोंका ज्ञान। तीसरा अध्याय (पृ. ८८-१४५)— आशीर्वाद-मङ्गलाचरणमें चैतन्यावतारके सामान्य कारण वर्णनमें अवतारके काल, कारण, वर्ण और लक्षणादिका विचार, अवतारके सम्बन्धमें प्रमाण-वचन, अवतारके प्रकट प्रमाण, अङ्ग-उपाङ्ग-अस्त्र-पार्षद और युगधर्म-कथन, स्वयंरूप-अवतारके पूर्व गुरुवर्गरूप सेवकगणोंका प्राकट्य, अवतारके पूर्व सामाजिक अवस्था, श्रीअद्वैतकी जीवोंपर दयाका चिन्तन और श्रीकृष्ण-आराधना आदि कथन। चौथा अध्याय (पृ. १४६-२४७)— श्रीचैतन्यावतारके मुख्य तीन उद्देश्योंके वर्णनके प्रसङ्गमें युगधर्म-प्रवर्त्तन, असुर-मारण और श्रीअद्वैतादि भक्तोंके आराधनको अवतारका बाह्य कारणमात्र कहकर “अवतारी श्रीकृष्णमें अवतारोंकी स्थिति, विधिभक्तिके प्रचारके लिये विष्णु और रागभक्तिके प्रचारार्थ स्वयं श्रीकृष्णका गौरावतार, रासलीला श्रवणमें मुक्तपुरुषका ही अधिकार, आचार-प्रचार, शान्तके अतिरिक्त चारों रसोंके आश्रयवर्गकी श्रीकृष्ण-प्रीतिकी ही कामना, रसोत्कर्ष-विचार, तटस्थ विचारसे मधुर रसकी श्रेष्ठता, स्वकीया और परकीयारूपमें मधुर रसकी दो प्रकारसे स्थिति, श्रीराधाकृष्ण-मिलिततनु श्रीगौरसुन्दर, श्रीराधातत्त्व और श्रीकृष्णके साथ सम्बन्ध, एक ही चित्-शक्तिके तीन रूप, शक्तिमान् और शक्तिका परस्पर अविच्छेद्य सम्बन्ध, शुद्धसत्त्वसे ही भगवान्का प्राकट्य, महाभाव, तीन प्रकारकी श्रीकृष्णकी कान्ताएँ, अंशिनी श्रीराधा, श्रीराधाके पाँच नाम, श्रीराधाके नामोंके अर्थ, श्रीराधा महाभावमें मग्न श्रीगौरसुन्दर, श्रीकृष्णके तीन प्रकारके वयस-धर्म और xxxii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत