भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ १/१-४ है। श्रीराधाभावद्युति सुवलित श्रीकृष्णस्वरूप, रसराजमहाभावके मूर्त्तिविग्रह श्रीकृष्णचैतन्यदेव ही उनके इष्टदेव हैं। श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी वन्दनाके साथ-साथ ग्रन्थकारने इस श्लोकमें गुरुवर्ग, भक्तों, अवतारों, प्रकाश और शक्तियोंको भी समान भावसे नमस्कार किया है, इसलिये इसे 'सामान्य' नमस्काररूप मङ्गलाचरण कहा गया है॥ १॥ इष्टदेव-युगलके प्रति विशेष नमस्कार; एक साथ चन्द्र-सूर्यवत् निताइ-गौरका उदय और जीवोंपर दया :- वन्दे श्रीकृष्णचैतन्यनित्यानन्दौ सहोदितौ। गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमोनुदौ ॥ २ ॥ अनुवाद-मैं श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीनित्यानन्दकी वन्दना करता हूँ, जो सबका मङ्गल करनेके लिये और अज्ञानरूपी अन्धकारको दूर करनेके लिये गौड़देशरूपी क्षितिजपर एक साथ चन्द्र एवं सूर्यके समान आश्चर्यजनक रूपसे उदित हुए हैं॥ २ ॥ अमृतानुकणिका-यहाँपर केवल इष्टदेवको ही नमस्कार किया है और उसके साथ अन्य किसीको नमस्कार नहीं किया है, इसलिये यह 'विशेष' नमस्काररूप मङ्गलाचरण है। यहाँपर श्रीकृष्णचैतन्यके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुकी वन्दना होनेपर भी इस श्लोकको विशेष-वन्दनात्मक मङ्गलाचरण कहा गया है, क्योंकि श्रीकृष्णचैतन्य और श्रीनित्यानन्द प्रभुमें स्वरूपतः कोई भी भेद नहीं है, वे दोनों एक ही तत्त्व हैं॥ २॥ ग्रन्थकी प्रतिपाद्य तत्त्ववस्तुका निर्देश; अद्वितीय परमतत्त्व एक ही श्रीगौर-कृष्णका तीन प्रकारसे प्रतीति-भेद :- यदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनुभा य आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांशविभवः। षडैश्वर्यैः पूर्णो य इह भगवान् स स्वयमयं न चैतन्यात् कृष्णाज्जगति परतत्त्वं परमिह ॥ ३ ॥ अनुवाद-उपनिषदोंमें जिनको अद्वैत ब्रह्म कहा जाता है, वे मेरे प्रभुकी अङ्गकान्ति हैं। जिनको योगशास्त्रोंमें आत्मान्तर्यामी पुरुष या परमात्मा कहते हैं, वे मेरे प्रभुके अंशस्वरूप हैं। जिनको ब्रह्म और परमात्माका आश्रय एवं अंशिस्वरूप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् कहा जाता है, मेरे प्रभु वे स्वयं-भगवान् हैं। इसलिये श्रीकृष्णचैतन्यकी अपेक्षा जगत्में और कोई परतत्त्व अर्थात् श्रेष्ठ तत्त्व नहीं है॥ ३॥ अमृतानुकणिका-इस श्लोकमें वस्तु निर्देशरूप मङ्गलाचरण किया गया है॥ ३॥ आशीर्वाद और गौरावतारके बाह्यकारणके वर्णनमें औदार्यविग्रह महावदान्य श्रीगौरका अतुल्य दान :- (विदग्धमाधव १/२)- अनर्पितचरीं चिरात् करुणयावतीर्णः कलौ समर्पयितुमुन्नतोज्ज्वलरसां स्वभक्तिश्रियम्। हरिः पुरटसुन्दरद्युतिकदम्बसन्दीपितः सदा हृदयकन्दरे स्फुरतु वः शचीनन्दनः ॥ ४ ॥ २ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत