श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१/४-८ ] अनुवाद-सुवर्ण कान्तिसमूहके द्वारा देदीप्यमान शचीनन्दन श्रीगौरहरिकी सदा तुम्हारे हृदय-कन्दरामें स्फूर्ति हो। जिस सर्वोत्कृष्ट उज्ज्वल-रसका दान चिरकालसे किसी भी अवतारने जगत्को नहीं दिया था, निजभक्तिकी शोभारूपी उसी सम्पत्तिका दान करनेके लिये वे परमकरुणावशतः कलियुगमें अवतीर्ण हुए हैं॥४॥ श्रीगौरावतारके मूल-प्रयोजनके निर्देशमें श्रीराधा, श्रीकृष्ण और उनके मिलित तनु श्रीगौरका तत्त्व-वर्णन :- श्रीस्वरूपगोस्वामि-कड़चा- राधा कृष्णप्रणयविकृतिर्ह्लादिनी शक्तिरस्मा- देकात्मानावपि भुवि पुरा देहभेदं गतौ तौ। चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्द्वयं चैक्यमाप्तं राधाभावद्युतिसुवलितं नौमि कृष्णस्वरूपम् ॥५॥ अनुवाद-श्रीकृष्णके प्रणयकी विकार अर्थात् प्रेमविलासरूपा ह्लादिनी शक्तिके प्रभावसे श्रीराधाकृष्ण स्वरूपतः एक आत्मा होते हुए भी विलासतत्त्वकी नित्यताके कारण श्रीराधा-श्रीकृष्ण नित्यरूपसे दो स्वरूपोंमें विराजमान हैं। वही दो तत्त्व अब एक स्वरूपमें चैतन्य-तत्त्वरूपमें प्रकट हुए हैं, इसलिये श्रीराधाकी भाव और कान्तिके द्वारा सुवलित उन्हीं श्रीकृष्णस्वरूप श्रीगौरसुन्दरको मैं प्रणाम करता हूँ॥५॥ श्रीगौरावतारके मूल प्रयोजनात्मक तीन गुह्य कारण :- श्रीराधायाः प्रणयमहिमा कीदृशो वानयैवा- स्वाद्यो येनाद्भुतमधुरिमा कीदृशो वा मदीयः। सौख्यञ्चास्या मदनुभवतः कीदृशं वेति लोभा- त्त्तद्भावाढ्यः समजनि शचीगर्भसिन्धौ हरीन्दुः॥६॥ अनुवाद-श्रीमती राधिकाके अलौकिक प्रेमकी महिमा कैसी है? वह मेरी अद्भुत मधुरिमा कैसी है, जिसका श्रीमती राधिका आस्वादन करती हैं? मेरी मधुरिमाकी अनुभूतिसे श्रीमती राधिकाको कौनसा अनिर्वचनीय सुख मिलता है? इन तीन विषयोंके प्रति लोभ उत्पन्न होनेपर श्रीकृष्णरूप चन्द्रने शचीगर्भरूप समुद्रसे जन्म ग्रहण किया॥६॥ स्वयंप्रकाश भगवान् श्रीबलदेवस्वरूप श्रीनित्यानन्दतत्त्व और उनको प्रणाम; उनके पाँचरूप :- सङ्कर्षणः कारणतोयशायी गर्भोदशायी च पयोब्धिशायी। शेषश्च यस्यांशकलाः स नित्यानन्दाख्यरामः शरणं ममास्तु॥७॥ अनुवाद-सङ्कर्षण, कारणोदशायी विष्णु, गर्भोदशायी विष्णु, क्षीरोदशायी विष्णु और शेष जिनके अंश और कला हैं, उन्हीं श्रीनित्यानन्द नामक श्रीबलरामकी मैं शरण ग्रहण करता हूँ॥७॥ (१) वैकुण्ठमें सङ्कर्षण-रूप :- मायातीते व्यापिवैकुण्ठलोके पूर्णैश्वर्ये श्रीचतुर्व्यूहमध्ये। रूपं यस्योद्भाति सङ्कर्षणाख्यं तं श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये॥८॥ पहला अध्याय | ३