श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १/१४-१६ श्रीवार्षभानवीदयितदास (श्रीवृषभानु महाराजकी पुत्री श्रीराधाजीके प्रिय श्रीकृष्णका दास, श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती प्रभुपाद) कामना करता हूँ। हरिभक्तजनोंकी सेवाकी आशा और भक्तिवृद्धिकी अभिलाषासे मैं अमृतप्रवाह भाष्यके अनुगत होकर, गौरजनोंके शास्त्रोंको देखकर उनके अनुसार रूपानुगमत 'अनुभाष्य' लिख रहा हूँ। ग्रन्थके मङ्गलाचरणके उद्देश्यसे ग्रन्थकारने प्रारम्भमें चौदह श्लोक लिखे हैं, उनमें ग्रन्थकी प्रतिपाद्य वस्तुका निर्देश, श्रोताओंको आशीर्वाद और इष्टदेवको नमस्कार किया है। आदिलीलाके पहले सात अध्यायोंमें क्रमशः इनकी विस्तृत व्याख्या की गयी है॥१४॥ अपने अभीष्ट सम्बन्ध-अधिष्ठाता-देवको प्रणाम :- जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम मन्दमतेर्गती। मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ राधामदनमोहनौ ॥ १५॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१५॥ अमृतप्रवाह भाष्य- मैं पङ्गु और मन्दमति हूँ; जो मेरी एकमात्र गति हैं और जिनके चरणकमल ही मेरा समस्त धन हैं, वे परम कृपालु श्रीश्रीराधा-मदनमोहन जययुक्त हों ॥ १५ ॥ अनुभाष्य- यह ग्रन्थकारके द्वारा स्वरचित श्लोक है- पङ्गो (स्वपद्भ्यां निजबलेन स्थानान्तरगमनेऽसमर्थस्य) मन्दमतेः (विषयाविष्टस्याल्पधियः अन्याभिलाष-कर्मज्ञानादि साधनोद्यमरहितस्यैकान्तिनः) मम गती ('गम्यते' इति गतिः आश्रयः तथाभूतौ) मत्सर्वस्वपदाम्भोजौ (मम सर्वस्वरूपे पदाम्भोजे ययोस्तौ), सुरतौ (दयालू मिथोऽत्यन्तनुरक्तौ वा) राधामदनमोहनौ (तत्तदभिधदेवौ) जयतां (सर्वोत्कर्षेण वर्त्तेताम्) । श्लोक-भावानुवाद- जो मुझ अपने पैरोंसे निजबलपर चलकर जानेमें असमर्थ, श्रीकृष्णसेवासे इतर अभिलाष और कर्म-ज्ञानादि साधनोंके उद्यमसे रहित ऐकान्तिक भक्तिको त्यागकर विषयोंमें आविष्ट अल्पबुद्धिवालेके आश्रय हैं और जिनके चरणकमल मेरे सर्वस्व हैं, वे परम दयालु और परस्पर अत्यन्त अनुरक्त श्रीराधा-मदनमोहन सर्वोत्कृष्ट रूपसे विराजमान हों ॥ १५ ॥ अपने अभीष्ट अभिधेय-अधिष्ठाता-देवको प्रणाम :- दीव्यद्वृन्दारण्यकल्पद्रुमाधः श्रीमद्रत्नागारसिंहासनस्थौ। श्रीश्रीराधा-श्रीलगोविन्ददेवौ प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि ॥ १६ ॥ अनुवाद - अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ १६ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ज्योतिर्मय-शोभायुक्त वृन्दावनके कल्पवृक्षके नीचे रत्नमन्दिरमें स्थित सिंहासनके ऊपर विराजमान श्रीश्रीराधागोविन्दकी प्रियसखियाँ उनकी सेवा कर रही हैं। मैं उनका स्मरण करता हूँ ॥ १६ ॥ अनुभाष्य-दीव्यद्वृन्दारण्य-कल्पद्रुमाधः (दीव्यति परमोत्कृष्टे मनोहरे वृन्दाविपिने कल्पवृक्षस्य अधोमूले) श्रीमद्रत्नागारसिंहासनस्थौ (परमशोभमयरत्नालयाभ्यन्तरे रत्नसिंहासनावस्थितौ) प्रेष्ठालीभिः (सेवापराभिः श्रीरूपमञ्जर्यादि-परिवृत-श्रीललितादिप्रियनर्मसखीभिः) सेव्यमानौ श्रीश्रीराधा-श्रीलगोविन्ददेवौ [अहं] स्मरामि। श्लोक-भावानुवाद- परमोत्कृष्ट मनोहर वृन्दावनमें कल्पवृक्षके तले, परम शोभामय रत्नालयके भीतर रत्नसिंहासनपर विराजमान (सेवापरायण श्रीरूपादि मञ्जरियों और श्रीललितादि प्रियनर्मसखियों) से परिवेष्टित सेव्यमान् श्रीश्रीराधा-श्रीलगोविन्ददेवका मैं स्मरण करता हूँ ॥ १६ ॥ ६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत