श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१/१२-१४ ] श्रीअद्वैततत्त्व और उनको प्रणाम :- महाविष्णुर्जगत्कर्त्ता मायया यः सृजत्यदः। तस्यावतार एवायमद्वैताचार्य ईश्वरः॥१२॥ अद्वैतं हरिणाद्वैतादाचार्य भक्तशंसनात्। भक्तावतारमीशं तमद्वैताचार्यमाश्रये॥१३॥ अनुवाद—जो जगत्कर्त्ता महाविष्णु मायाके द्वारा इस जगत्की सृष्टि करते हैं, श्रीअद्वैताचार्य-ईश्वर उनके ही अवतार हैं। जो हरिसे अभिन्न तत्त्व होनेके कारण 'अद्वैत' और भक्तिके प्रचारक होनेके कारण 'आचार्य' कहलाते हैं, उन भक्तावतार श्रीअद्वैताचार्य ईश्वरका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ॥१२-१३॥ पञ्चतत्त्वका स्वरूप और उनको प्रणाम :- पञ्चतत्त्वात्मकं कृष्णं भक्तरूपस्वरूपकम्। भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्तशक्तिकम्॥१४॥ अनुवाद—श्रीकृष्णके भक्तरूप, भक्तस्वरूप, भक्तावतार, भक्त और भक्तशक्ति, इन पञ्चतत्त्वात्मक श्रीकृष्णको मैं प्रणाम करता हूँ॥१४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभु, श्रीनित्यानन्द प्रभु, प्रेमके मूल श्रीअद्वैताचार्य, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामी, श्रीराय रामानन्द, श्रीवंशीवदनानन्द, श्रीसार्वभौम भट्टाचार्य, श्रीरूप-सनातन गोस्वामी भ्राताद्वय, श्रीरघुनाथदास गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रीगोपालभट्ट गोस्वामी, श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामी, श्रीशिवानन्द सेन, श्रीकविकर्णपूर, श्रीकृष्णदास कविराज, श्रीनरोत्तमदास ठाकुर, श्रीश्रीनिवासाचार्य, श्रीरामचन्द्र कविराज, श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती, श्रीबलदेव विद्याभूषणादि ईश्वर और ईश्वरके भक्तोंको यत्नपूर्वक प्रणाम करते हुए मैं, भक्तिविनोद ठाकुर, श्रीचैतन्यचरितामृतके सार 'अमृतप्रवाह भाष्य' का वर्णन कर रहा हूँ; भक्तगण इसपर विचार करें। गौरकथारूपी समुद्रमें बहते हुए श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी उस अमृतसिन्धुकी एक धार लाये हैं। इस काव्यामृतका पान करनेसे वैष्णवोंके प्राण शीतल होते हैं और इसको बार-बार पान करनेकी उत्कण्ठा जाग्रत हो जाती है। इसका भाष्य लिखनेके लिये इस दीन-अकिञ्चन (भक्तिविनोद) को सभी लोगोंने आदेश दिया, इसलिये साधु लोगोंके आदेशको शीशपर धारण करते हुए इस भाष्यको यत्नके साथ लिखकर साधुओंके हाथोंमें मैंने अर्पित किया है॥१४॥ अनुभाष्य—श्रीराधाकृष्णसे अभिन्न श्रीचैतन्य महाप्रभु रूपानुग जनोंके जीवन हैं। उन महाप्रभु विश्वम्भरके प्रिय श्रीस्वरूपदामोदर हैं। श्रीस्वरूपदामोदरके मित्र श्रीरूप-सनातन (गोस्वामी) हैं। श्रीरूपके प्रिय श्रीरघुनाथ (दास गोस्वामी) हैं और श्रीरघुनाथके प्रिय कवि श्रीकृष्णदास हैं। श्रीकृष्णदास (कविराज गोस्वामी) के प्रिय श्रीनरोत्तम (दास ठाकुर) हैं। श्रीविश्वनाथ (चक्रवर्ती ठाकुर) श्रीनरोत्तमके चरणोंकी आशा करते हैं। भक्तराज श्रीविश्वनाथके प्रति श्रीजगन्नाथ (दास बाबाजो महाराज) श्रद्धावान् हैं। श्रीजगन्नाथके प्रिय श्रीभक्तिविनोद (ठाकुर) हैं। श्रीभक्तिविनोदके प्रिय महाभागवतवर श्रीगौरकिशोर (दास बाबाजी महाराज) हैं, जो सदैव हरिभजनमें ही आनन्दित रहते हैं। ये सब हरिजन गौराङ्ग महाप्रभुके निजजन हैं। उनके उच्छिष्टकी मैं अर्थात् पहला अध्याय | ५