भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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१/१७-१९ ] अपने अभीष्ट प्रयोजन-अधिष्ठाता-देवको प्रणाम :- श्रीमान् रासरसारम्भी वंशीवटतटस्थितः । कर्षन् वेणुस्वनैर्गोपीर्गोपीनाथः श्रियेऽस्तु नः॥१७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-रासरसके प्रवर्तक वंशीवटके तटपर स्थित होकर श्रीमद्गोपीनाथ वेणुध्वनिके द्वारा गोपियोंको आकर्षित कर रहे हैं। वे हमारे मङ्गलका विधान करें॥१७॥ अनुभाष्य-वेणुस्वनैः (वंशीध्वनिभिः) गोपीः (व्रजगोपवधूः) कर्षन् (कृष्णेतरवासनाः शिथिलीकुर्वन् गृहात् वंशीनिनादरूप प्रेमरज्जुबलेन आनयन्) श्रीमान् (परमशोभामयविग्रहः) रासरसारम्भी (रासरसप्रवर्त्तकः) वंशीवटतटस्थितः (वंशीवटतरोर्मूले अवस्थितः सन् स्वच्छन्दं विहरति सः) गोपीनाथः नः (अस्माकं) श्रिये (प्रेमसम्पत्त्यै) अस्तु (भवतु)। श्लोक-भावानुवाद-अपनी वंशीध्वनिके द्वारा गोपियोंकी कृष्णेतरवासनाको शिथिल करते हुए अर्थात् वंशीनादरूपी प्रेमरज्जुके बलसे घरसे उन्हें अपने निकट लाते हुए परमशोभामय विग्रह, रासरसको आरम्भ (आस्वादन) करनेवाले, वंशीवटवृक्षके मूलदेशमें अवस्थित स्वच्छन्द विचरण करनेवाले वे श्रीगोपीनाथ हमारी प्रेमसम्पत्ति हों॥१७॥ जय जय श्रीचैतन्य जय नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द ॥ १८ ॥ अनुवाद-महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव की जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो। श्रीगौर भक्तवृन्दकी जय हो॥ १८॥ अनुभाष्य-कुछ अन्य संस्करणोंमें यह पद्य नहीं पाया जाता॥ १८॥ गौड़ीय-वैष्णवोंके अभीष्ट आराध्य-तीन विग्रह :- एइ तिन ठाकुर गौड़ीयाके करियाछेन आत्मसात् । ए तिनॆर चरण वन्दौं, तिनॆ मोर नाथ ॥ १९ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१९॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमदनमोहन, श्रीगोविन्ददेव और श्रीगोपीनाथ-ये तीन ठाकुर वृन्दावनके अधिदेवता हैं। इन तीनोंने गौड़ीय भक्तोंको अपनी-अपनी सेवामें अधिकार प्रदानकर अपने निजजनके रूपमें अङ्गीकार किया है। (मैं इन तीनोंके चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, क्योंकि वे ही मेरे नाथ हैं) ॥१९॥ अनुभाष्य-गौड़ीय वैष्णवोंके सेव्य अष्टादशाक्षर मन्त्र (गोपाल-मन्त्र) में निर्दिष्ट श्रीकृष्ण ही श्रीमदनमोहन, गोविन्द ही श्रीगोविन्ददेव और गोपीजनवल्लभ ही श्रीगोपीनाथ हैं। श्रीमदनमोहन-कृष्णका अनुभव ही ‘सम्बन्ध' है, श्रीगोविन्ददेवकी सेवा ही 'अभिधेय' है और श्रीगोपीजनवल्लभके द्वारा आकृष्ट होना ही 'प्रयोजन' है। श्रीमन्महाप्रभुके उपदेशानुसार तीन तत्त्व सम्बन्ध-अभिधेय-प्रयोजनतत्त्वके आश्रय भगवद्विग्रह स्वरूप ये तीन ठाकुर श्रीवृन्दावनके अधिदेवता हैं। 'गौड़ीय' शब्दका अर्थ है गौड़-देशसे सम्बन्धित। हिमालयके दक्षिण और विन्ध्याचलके उत्तरमें स्थित भारतवर्षका भाग 'आर्यावर्त्त' कहलाता है। यह पाँच गौड़-देशोंमें विभाजित पहला अध्याय | ७

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