भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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है—सारस्वत, कान्यकुब्ज (लक्ष्मणावती-उत्तरप्रदेश स्थित लखनऊ), मध्यगौड़, मैथिल और उत्कलप्रदेश (उड़ीसा)। बङ्गालको भी कई लोग गौड़देश कहते हैं, विशेषतः पूर्वकालमें बङ्गालकी राजधानीका नाम 'गौड़' था। वही पहले गौड़पुर और बादमें श्रीमायापुरके नामसे प्रसिद्ध हुई। जिस प्रकार उत्कलदेशके (उड़ीसाके) भक्तोंको उड़ीया भक्त और द्राविड़देश (दक्षिण भारतके) भक्तोंको द्राविड़ी भक्त कहा जाता है, उसी प्रकार बङ्गालके भक्तोंको भी गौड़ीयभक्तके नामसे जाना जाता है। आर्यावर्त्तके समान दक्षिण भारत भी पाँच द्रविड़ोंमें विभाजित है। कलियुगमें चारों वैष्णव-सम्प्रदायोंके प्रथम आचार्योंने द्रविड़देशमें ही जन्म ग्रहण किया था। श्रीरामानुजाचार्य दक्षिण-आन्ध्रप्रदेशके महाभूतपुरीमें (वर्तमानमें चेन्नईके निकट पेरुम्बुदूर), श्रीमध्वाचार्य मैंगलोर जिलेके विमानगिरिके निकट (वर्तमानमें कर्नाटक राज्यमें उडुप्पी) 'पाजकम्' क्षेत्रमें, निम्बादित्याचार्य दक्षिणापथके मूङ्गेरपत्तन ग्राममें और श्रीविष्णुस्वामी पाण्ड्यदेशमें आविर्भूत हुए थे। यद्यपि श्रीमन्महाप्रभुने श्रीमध्व-सम्प्रदायको स्वीकार किया है, तथापि श्रीमध्वाचार्य-मतके 'तत्त्ववाद' की शाखाका अवलम्बन करनेवाले वैष्णवाचार्य द्राविड़ी हैं। इसलिये श्रीगौरहरिके चरणाश्रित सम्प्रदायको गौड़ीय कहा जाता है। विशेषतः 'श्रीआनन्दतीर्थ पूर्णप्रज्ञ मध्वाचार्य' का एक अन्य नाम श्रीगौड़पूर्णानन्द भी था, इसलिये भी श्रीगौर-भक्तोंको माधव-गौड़ीय-नामसे जाना जा सकता है॥१९॥

प्रथम चौदह श्लोकोंमेंसे स्वकृत मङ्गलाचरणकी व्याख्या :- ग्रन्थेर आरम्भे करि 'मङ्गलाचरण'। गुरु, वैष्णव, भगवान्—तिनेर स्मरण॥२०॥

तीनों आराध्योंके स्मरणसे अभीष्ट सिद्धि :- तिनेर स्मरणे हय विघ्नविनाशन। अनायासे हय निज वाञ्छितपूरण॥२१॥ से मङ्गलाचरण हय त्रिविध प्रकार। वस्तुनिर्देश, आशीर्वाद, नमस्कार॥२२॥ अनुवाद—इस ग्रन्थके प्रारम्भमें श्रीगुरु, वैष्णवों और श्रीभगवान्—इन तीनोंको स्मरणकर 'मङ्गलाचरण' कर रहा हूँ। इन तीनोंका स्मरण समस्त विघ्नोंका विनाश करनेवाला और अनायास ही समस्त इच्छाओंकी पूर्ति करनेवाला है। इस मङ्गलाचरणमें ग्रन्थके प्रतिपाद्य विषयका निर्धारण, आशीर्वाद प्रदान और नमस्कार, ये तीन क्रियाएँ अन्तर्हित हैं॥२०-२२॥

चौदह श्लोकोंमें ग्रन्थकारके द्वारा मङ्गलाचरण :- प्रथम दुइ श्लोके इष्टदेव-नमस्कार। सामान्य-विशेष-रूपे दुइ त' प्रकार॥२३॥ तृतीय श्लोकेते करि वस्तु निर्देश। याहा हैते हय परतत्त्वेर उद्देश॥२४॥

८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत