भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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१/२३-३३ ] चतुर्थ श्लोकेते करि जगते आशीर्वाद। सर्वत्र मागिये कृष्णचैतन्य-प्रसाद ॥ २५ ॥ सेइ श्लोके कहि बाह्यावतार-कारण। पञ्च षष्ठ श्लोके कहि मूल-प्रयोजन ॥ २६ ॥ एइ छय श्लोके कृष्णचैतन्येर तत्त्व। आर पञ्च श्लोके नित्यानन्देर महत्त्व ॥ २७ ॥ आर दुइ श्लोके अद्वैत-तत्त्वाख्यान। आर एक श्लोके पञ्चतत्त्वेर व्याख्यान ॥ २८ ॥ एइ चौद्द श्लोके करि मङ्गलाचरण। तँहि मध्ये कहि सब वस्तुनिरूपण ॥ २९ ॥ सब श्रोता-वैष्णवेरे करि' नमस्कार। एइ सब श्लोकेर करि अर्थ-विचार ॥ ३० ॥ सकल वैष्णव, शुन करि' एकमन। चैतन्य-कृष्णेर शास्त्रे येमत-निरूपण ॥ ३१ ॥ अनुवाद-मैंने प्रथम दो श्लोकोंके द्वारा सामान्य और विशेष-दो प्रकारसे इष्टदेव (श्रीकृष्णचैतन्य) को नमस्कार किया है। तृतीय श्लोकमें प्रतिपाद्य विषय-वस्तुको निर्देश किया है, जिसका उद्देश्य परमतत्त्वका निरूपण है। चतुर्थ श्लोकमें श्रीकृष्ण-चैतन्यके चरणोंमें कृपाभिक्षा करते हुए समस्त जगत्को आशीर्वाद प्रदान करनेकी प्रार्थना कर रहा हूँ। इसी श्लोकमें उनके अवतारके बाह्य-कारणको भी बतलाया है। पाँचवें और छठे श्लोकमें उनके अवतारके मुख्य-कारण (आन्तरिक प्रयोजन) का उल्लेख किया है। इस प्रकार इन छह श्लोकोंके द्वारा मैंने श्रीचैतन्य महाप्रभुके तत्त्वका निरूपण किया है और अगले पाँच श्लोकोंमें श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाका वर्णन किया है। अन्य दो श्लोकोंमें श्रीअद्वैततत्त्व और अगले एक श्लोकमें श्रीपञ्चतत्त्वकी व्याख्या प्रस्तुत की है। इस प्रकार मङ्गलाचरणरूपी चौदह श्लोकोंमें सम्पूर्ण परमवस्तुका निरूपण किया है। समस्त वैष्णव श्रोताओंको प्रणामकर इन सब श्लोकोंके गूढ़ार्थके विचारमें प्रवृत्त हो रहा हूँ। सभी वैष्णवजनोंके चरणोंमें यह प्रार्थना है कि वे एकाग्रचित्तसे श्रीकृष्णचैतन्यका शास्त्रोचित निरूपण श्रवण करें ॥ २३-३१ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-चैतन्यस्वरूप श्रीकृष्णके सम्बन्धमें शास्त्रोंमें जिस प्रकार निरूपण किया गया है ॥ ३१ ॥ पूर्वोक्त चौदह श्लोकोंकी व्याख्या आरम्भ; प्रथम श्लोककी व्याख्या :- कृष्ण, गुरुद्वय, भक्त, अवतार, प्रकाश। शक्ति-एइ छयरूपे करेन विलास ॥ ३२ ॥ एइ छय तत्त्वेर करि चरण वन्दन। प्रथमे सामान्ये करि मङ्गलाचरण ॥ ३३ ॥ पहला अध्याय ९

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