भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ १/३२-३४

अनुवाद— श्रीकृष्ण (स्वयं), दो प्रकारके (दीक्षा-शिक्षा) गुरु, भक्त, अवतार, अपने प्रकाश और निजशक्ति, इन छह रूपोंमें विलास करते हैं। इन छह तत्त्वोंके श्रीचरणोंकी वन्दनाकर मैं सर्वप्रथम सामान्य रूपसे मङ्गलाचरण कर रहा हूँ॥३२-३३॥ अनुभाष्य— 'गुरुद्वय' शब्दसे दीक्षागुरु और शिक्षागुरुको समझना चाहिये। दोनों ही अभिन्न गुरुतत्त्व हैं। दीक्षा और शिक्षागुरुमें लीलावशतः भेद (दृष्ट) होनेपर भी शिष्यके लिये वे दोनों ही समान तत्त्व हैं और एक ही समान पूजनीय हैं॥३२॥ वन्दे गुरुनीशभक्तानीशमीशावतारकान्। तत्प्रकाशांश्च तच्छक्तीः कृष्णचैतन्यसंज्ञकम्॥३४॥ अनुवाद— आदिलीला १/१ द्रष्टव्य है॥३४॥ अमृतप्रवाह भाष्य— मैं दीक्षा और शिक्षा-भेदसे दोनों गुरुओंकी, श्रीवासादि भगवद्भक्तोंकी, श्रीअद्वैताचार्य प्रभु आदि भगवान्‌के अवतारोंकी, श्रीनित्यानन्द प्रभु आदि उनके प्रकाशस्वरूपोंकी, श्रीगदाधरादि भगवत्-शक्तियोंकी और स्वयं भगवत्-स्वरूप महाप्रभु श्रीकृष्णचैतन्य नामक परमतत्त्वकी वन्दना करता हूँ॥३४॥ अनुभाष्य— यह ग्रन्थकार (श्रीकृष्णदास) के द्वारा स्वरचित श्लोक है— [ग्रन्थकारः कृष्णदासोऽहं] गुरून् (वर्त्मप्रदर्शक-मन्त्रदातृ-शिक्षादातॄन् गुरुगणान् श्रीनित्यानन्द-रघुनाथरूपादीन्) ईशभक्तान् (गौरकृष्णसेवकान् श्रीवासादीन्) कृष्णचैतन्य-संज्ञकम् ईशं (स्वयं भगवन्तम्) ईशावतारकान् (श्रीअद्वैताचार्यादीन्) तत्प्रकाशान् (तस्य चैतन्यकृष्णस्य प्रकाशान् श्रीनित्यानन्दादीन् निजगुरुन्) तच्छक्तीः (तस्य गौरकृष्णस्य शक्तीः—श्रीगदाधर-दामोदर-जगदानन्दादीन्) [अभिन्नावरणात्मक-तत्त्वषट्कान् अहं] वन्दे। श्लोक-भावानुवाद— ग्रन्थकार मैं, कृष्णदास, अपने गुरु (पथप्रदर्शकगुरु, मन्त्रप्रदातागुरु और शिक्षागुरु श्रीनित्यानन्द-श्रीरूप-रघुनाथादि), भगवद्भक्त अर्थात् श्रीगौरकृष्णके सेवक (श्रीवासादि), श्रीकृष्णचैतन्य नामक स्वयं भगवान्, श्रीअद्वैताचार्य आदि भगवतावतारों, श्रीचैतन्यकृष्णके प्रकाश श्रीनित्यानन्दादि (स्वयंगुरु) तथा श्रीगौरकृष्णकी शक्तियाँ (श्रीगदाधर-श्रीस्वरूप दामोदर-श्रीजगदानन्दादि), इन अभिन्नावरणात्मक छह तत्त्वोंकी वन्दना करता हूँ॥३४॥ अमृतानुकणिका— श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी लीला वर्णनके विचारसे सर्वप्रथम यह समझना आवश्यक है कि यह कथा श्रीकृष्णचैतन्य नामक किसी एक नश्वर व्यक्तिके सम्बन्धमें नहीं है, अपितु यह व्यापकता-धर्मसे युक्त भगवान्‌के सम्बन्धमें है। इस श्लोकमें—'गुरून्'—गुरुवर्गको (बहुवचनमें प्रयुक्त); 'ईश-भक्तान्'—भागवत परमहंस अथवा वैष्णवोंको; 'ईशम्'—ईश्वरको (एकवचनमें); 'ईशावतारकान्'—ईश्वरके अवतारोंको; 'तत्प्रकाशान्'—उनके प्रकाशादिको; और 'तच्छक्ति'—उनकी शक्तियोंको; —यद्यपि ये सभी श्रीकृष्णचैतन्य संज्ञाके अन्तर्भुक्त हैं, किन्तु प्रत्येकका ही वैशिष्ट्य है।” उनके परस्पर इस पार्थक्यकी आलोचना आवश्यक है। श्रीकृष्णस्मृतिके अभावमें मायाबद्ध जीवोंका अहङ्कार-धर्म प्रबल होकर 'मैं कर्त्ता' हूँ, ऐसी बुद्धि प्रबल हो जाती है। इसलिये श्रीकृष्ण अपनी श्रीकृष्णचैतन्यदेव मूर्तिमें गुरुका वेश स्वयं ही नित्यकाल धारण करते हैं—सभी प्रकारके गुरु होकर जीवोंकी चेतनको जाग्रत करते हैं और उनका वास्तविक मङ्गल विधान करते हैं।

१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत