श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 53, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें१/३४-३५ ] 'गुरु'—गुरुको लघुजातीय मानकर श्रीकृष्णचैतन्यसे पृथक् मानना उचित नहीं है। गुरु तीन प्रकारके हैं-(१) दीक्षागुरु- जो दिव्य ज्ञान अर्थात् पूर्ण वस्तुका ज्ञान कराते हैं, (२) शिक्षागुरु- किस उपाय या रीतिका अवलम्बन करके दिव्यज्ञानके विचारको प्राप्त किया जाय, जो उसकी व्यवस्था करते हैं, और (३) चैत्यगुरु-रूपमें हृदयमें विराजमान होकर अद्वयज्ञानदाता दीक्षागुरु और शिक्षागुरुके उपदेशोंको धारण करनेकी सुविधा एवं शक्ति देते हैं। चैत्यगुरुकी कृपाके बिना महान्त (शिक्षागुरु या दीक्षागुरु) गुरुकी बातको समझा नहीं जा सकता। उनकी कृपा नहीं होनेसे ना तो चित्तकी मलिनता दूर हो सकती है और ना ही शिक्षा दृढ़ हो सकती है। चैत्यगुरु ही कृपा करके दीक्षा और शिक्षा गुरुकी कृपा ग्रहण करनेकी योग्यता प्रदान करते हैं। श्रीचैतन्यदेव स्वयं ही दीक्षागुरु रूपमें दिव्यज्ञान अर्थात् अव्यभिचारिणी (ऐकान्तिक) भक्ति प्रदान करते हैं और अपनेसे अभिन्न शिक्षागुरुओंको भेजकर उस भक्तिकी रक्षा करते हैं तथा स्वयं ही चैत्यगुरु होकर सेवान्मुख मुक्तजीवके हृदयमें उस दीक्षा और शिक्षाको ग्रहण करनेकी शक्ति देते हैं। आश्रयजातीय सेवरूपमें श्रीचैतन्यदेवने गुरु (श्रीईश्वरपुरी) के अधीन स्वयंको लघु दिखलाकर गुरुके आनुगत्यके आदर्शकी शिक्षा प्रदान की। किन्तु वास्तवमें वे लघु नहीं, गुरुके भी गुरु हैं। जो उनमें गुरु स्थानीय ज्ञान नहीं रखते, वे भ्रमित होते हैं। चैत्यगुरुकी कृपाके बिना ये सब विचार उपलब्धिका विषय नहीं होते। 'ईशभक्तान्'—जो सब समय ईश्वरकी सेवामें नियुक्त हैं, वे ही श्रीचैतन्यदेवके सेवक विग्रह हैं। ईश्वरके भक्त पृथक् तत्त्व नहीं हैं। श्रीचैतन्यदेव स्वयं उनके उपास्य हैं। वे अन्य किसीको भी नहीं जानते हैं। चेतनधर्मविशिष्ट, भक्तियुक्त व्यक्ति ही श्रीचैतन्यदेवकी उपासना करते हैं। जहाँ चेतनकी क्रिया लक्षित नहीं होती, वह अचेतनधर्मके अतिरिक्त कुछ नहीं है। ईश्वरके भक्त अन्याभिलाषी, भोग-परायण कर्मी या भोगरहित अभक्त नहीं हैं, वे जड़की सेवा नहीं करते हैं; अभक्त ही जड़की सेवा करके प्रभु होनेकी वासना करते हैं। भक्ति ही भक्तकी सम्पत्ति है। भक्तलोग ब्रह्माण्डके अन्तर्भुक्त किसी स्थानपर भी किसी इन्द्रिय-भोग्य वस्तुकी सेवा नहीं करते हैं। अव्यभिचारिणी केवला अहैतुकी भक्ति अर्थात् नित्यकालीन आत्माकी वृत्ति स्वरूपभक्तिके द्वारा वे सब समय श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी सेवामें ही नियुक्त रहते हैं। 'ईशावतारकान्'—मत्स्य, कूर्म, वराहादि, अर्चा, अन्तर्यामी, वैभव, व्यूह और पर—ये सभी ईश्वरके अवतार हैं। अवतारी परतत्त्व स्वतन्त्र हैं। 'तत्प्रकाशान्'—उनके प्रकाश समूह; विभिन्न प्रकाश-जैसे अर्चा-प्रकाश, अन्तर्यामी, वैभव, व्यूह और पर-प्रकाश। ये भिन्न-भिन्न प्रकाश हैं। 'तच्छक्ती:'—उनकी शक्तियाँ जो शक्तिमान्की पूजा करती हैं, वे शक्तिजातीय हैं। 'श्रीकृष्णचैतन्य संज्ञक'—इन छह तत्त्वोंमें किसी एक तत्त्वकी उपासनामें भी च्युति हो गयी, तो परतत्त्वकी उपासना अपूर्ण रह जायेगी ॥ ३४॥ लीला-भेदसे दो प्रकारके गुरु :- मन्त्र गुरु आर यत शिक्षागुरुगण। ताँहार चरण आगे करिये वन्दन ॥ ३५ ॥ पहला अध्याय | ११