भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ १/३५ अनुवाद-मैं सर्वप्रथम अपने दीक्षा-गुरु और समस्त शिक्षागुरुजनोंके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ॥३५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-गुरु दो प्रकारके होनेपर भी वे एकतत्त्व हैं, इस विचारके कारण यहाँ एकवचन शब्द ‘ताँहार’ का व्यवहार किया गया है। कुछ अन्य संस्करणोंमें ‘ताँ-सबार’ (बहुवचन शब्द) भी देखा जाता है॥३५॥ अनुभाष्य-श्रीजीवप्रभु-(भक्तिसन्दर्भ, संख्या २०२ में)— “यद्यपि अकिञ्चना भक्तिरभिधेयेति तत्कारणत्वेन मद्भक्तसङ्ग एवाभिधेये सति भक्तोऽपि स एव लक्षितव्यः। तत्र प्रथमं तावत् तत्तत्सङ्गाज्जातेन तत्तच्छ्रु तत्तद्भजनीये भगवदाविर्भावविशेषे तद्भजनमार्गविशेषे च रुचिर्जायते। ततश्च विशेषवुभुत्सायां सत्यां तेष्वेकतोऽनेकतो वा श्रीगुरुत्वेनाश्रितात् श्रवणं क्रियते। ××× प्रीतिलक्षणभक्तीच्छूनां तु रुचिप्रधान एव मार्गः श्रेयान्, नाजातरुचीनामिव विचारप्रधानः। तदेतदुभयस्मिन्नपि तत्तद्भजनविधिशिक्षागुरुः प्राक्तनः श्रवणगुरुरेव भवति। मन्त्रगुरुस्त्वेक एव निषेत्स्यमानत्वाद्बहूनाम्।” (संख्या २०६में)-“श्रवणगुरुभजनशिक्षागुर्वोः प्रायिकमेकत्वमिति। शिक्षागुरोर्बहुत्वमपि ज्ञेयम्।” (संख्या २०८ में)-“तत्र श्रवणगुरुसंसर्गेणैव शास्त्रीयज्ञानोत्पत्तिः स्यात्।” (संख्या २०७ में)—“अनुग्रहो मन्त्रदीक्षारूपः।” (संख्या २०९ में)-“ये गुरोश्शरणं समवहाय भगवदन्तर्मुखीकर्त्तुं प्रयतन्ते, ते तेषु तेषु उपायेषु खिद्यन्ते, अतो व्यसनशतान्विता भवन्ति, अतएव इह संसारे तिष्ठन्त्येव, अकृतकर्णधरा जलधौ यथा तद्वत्। गुरुभक्त्या स मिलति स्मरणात् सेव्यते बुधैः। मिलितोऽपि न लभ्यते जीवैरहमिकापरैः॥” (संख्या २१०में)-“परमार्थगुर्वाश्रयो व्यवहारिक-गुर्वादि-परित्यागेनापि कर्त्तव्यः।” अकिञ्चना भक्ति अभिधेय है और यह श्रीकृष्णभक्त-सङ्गको ही लक्षित करता है। सबसे पहले श्रीकृष्ण-भक्तसङ्गके फलसे श्रद्धा उत्पन्न होनेपर जीव श्रीकृष्णोन्मुख होता है। उस सङ्गके फलसे सेव्य-भगवान्‌के विशेष आविर्भावमें और विशेष भजनमार्गमें रुचि उत्पन्न होती है। श्रीकृष्णके विषयमें अधिक जाननेकी इच्छा होनेसे सुकृतिवान् जीव एक या एकसे अधिक शिक्षा-गुरुओंका आश्रय ग्रहणकर उनसे हरिकथा श्रवण करता है। प्रीति-लक्षणयुक्त-भक्तिके इच्छुक व्यक्तियोंके लिये रुचिप्रधान-पथ ही श्रेयस्कर है; रागानुगभक्तोंके लिये अजातरुचि (जिनमें रुचि अभी जाग्रत नहीं हुई है) व्यक्तियोंकी भाँति विचारप्रधान-पथ उचित नहीं है। इन दोनोंके पुरातन श्रवणगुरु ही उस-उस भजनविधिके शिक्षागुरु होते हैं। मन्त्रगुरु एक ही होते हैं, क्योंकि अनेक दीक्षागुरु ग्रहण करना (शास्त्रोंमें) निषिद्ध है। श्रवणगुरु और भजनशिक्षागुरु प्रायः एक ही होते हैं, किन्तु शिक्षागुरु एकसे अधिक हो सकते हैं, इनमेंसे श्रवणगुरुके सङ्गसे ही शास्त्रीय-ज्ञान प्राप्त होता है। गुरु मन्त्र-दीक्षारूप अनुग्रह (कृपा) करते हैं। जो लोग श्रीगुरुदेवकी अवज्ञा करके सीधे भगवान्‌का सान्निध्य प्राप्त करनेके लिये चेष्टा करते हैं, उनकी सभी चेष्टाएँ विफल होती हैं। इसलिये सैंकड़ों बुरी आदतें आकर ऐसे गुरुभक्ति-रहित जीवोंको कृत्रिम भक्तरूपमें सजाकर केवल संसारमें ही निवास कराती हैं। ‘मैं अधिक जानता हूँ और कोई गुरु आकर मुझे क्या अधिक उपदेश देंगे?’—इस प्रकार अहङ्कारी व्यक्तियोंको इस अपराधके कारण श्रीकृष्णभक्ति प्राप्त नहीं होती। समुद्रमें बिना नाविककी नौकाकी भाँति संसारसे उनका उद्धार नहीं हो पाता। गुरुसेवाके द्वारा ही श्रीकृष्णकी प्राप्ति होती है। भक्तलोग स्मरणादिके द्वारा श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। व्यवहारिक, लौकिक, कौलिक (वंशपारम्पारिक) अयोग्य गुरुको त्यागकर पारमार्थिक गुरुका ही आश्रय ग्रहण करना चाहिये॥३५॥ १२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत

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