भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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१/३६-४२ ] छह गोस्वामी-ये ही ग्रन्थकारके शिक्षा-गुरु :- श्रीरूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ। श्रीजीव, गोपालभट्ट, दास-रघुनाथ॥ ३६॥ एइ छय गुरु-शिक्षागुरु ये आमार। ताँसबार पादपद्मे कोटि नमस्कार॥ ३७॥ ईशभक्त :- भगवानेर भक्त यत श्रीवास प्रधान। ताँहार चरणपद्मे सहस्र प्रणाम॥ ३८॥ ईशावतार :- अद्वैत आचार्य-प्रभुर अंश-अवतार। ताँर पादपद्मे कोटि प्रणति आमार॥ ३९॥ ईशप्रकाश :- नित्यानन्दराय-प्रभुर स्वरूपप्रकाश। ताँर पादपद्म वन्दो याँर मुञि दास॥४०॥ ईशशक्ति :- गदाधर-पण्डितादि-प्रभुर निजशक्ति। ताँसबार चरणे मोर सहस्र प्रणति॥ ४१॥ स्वयं ईश्वर :- श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु स्वयं भगवान्। ताँहार पदारविन्दे अनन्त प्रणाम॥ ४२॥ अनुवाद-श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीरघुनाथभट्ट, श्रीजीव, श्रीगोपालभट्ट और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी-ये छह गोस्वामी मेरे शिक्षागुरु-स्वरूप हैं। मैं इनके श्रीचरणकमलोंमें कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ। भगवान्‌के सभी भक्तोंमें श्रीवास पण्डित प्रधान (श्रेष्ठ) हैं। मैं उनके श्रीचरणकमलोंमें हजारों बार प्रणाम करता हूँ। श्रीअद्वैताचार्य भगवान्‌के अंशावतार हैं, मैं उनके श्रीचरणकमलोंमें कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ। श्रीमन् नित्यानन्दप्रभु भगवान्‌के प्रकाशस्वरूप हैं, मैं उनका दास उनके श्रीचरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ। मैं श्रीगदाधर पण्डितादि प्रभुकी निजशक्तियोंके चरणोंमें हजारों प्रणति ज्ञापन करता हूँ। स्वयं-भगवान् श्रीकृष्णचैतन्य महाप्रभुके श्रीचरणकमलोंमें मैं अनन्त प्रणाम ज्ञापन करता हूँ॥ ३८-४२॥ अनुभाष्य-श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीजीव गोस्वामीके विषयमें (आदि १०/८५) द्रष्टव्य है। श्रीरघुनाथ भट्ट गोस्वामीके विषयमें (आदि १०/१५३-१५८) द्रष्टव्य है। श्रीरघुनाथ दास गोस्वामीके विषयमें (आदि १०/९१) द्रष्टव्य है। श्रीगोपालभट्ट गोस्वामीके विषयमें (आदि १०/८) द्रष्टव्य है। श्रीवास पण्डितके विषयमें आदिलीला १०/८ द्रष्टव्य है। श्रीअद्वैताचार्यके विषयमें आदिलीला छठा अध्याय द्रष्टव्य है। श्रीनित्यानन्दके विषयमें आदिलीला पाँचवाँ अध्याय द्रष्टव्य है। पहला अध्याय | १३