भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

इस ग्रन्थका किस प्रकार अनुशीलन करना होगा, उसकी पद्धति श्रील भक्तिविनोद ठाकुरने (उनके द्वारा सम्पादित संस्करणके ‘प्रबोधनमें’) प्रदर्शित की है—‘‘पाठकवर्गसे मेरा यह अनुनय है, वे इस अपूर्व ग्रन्थको सामान्य काव्य इतिहासके जैसे पाठ नहीं करेंगे। वेदान्तशास्त्र और रसशास्त्र जिस प्रकार यत्नके साथ सद्गुरुके निकट पाठ करने होते हैं, उसी प्रकार इस महाग्रन्थका पाठ करेंगे। आजकल अनेक ही ना पढ़े लोग पाण्डित्यका अभिमान करते हैं, कोई-कोई तो उस प्रकारके पण्डितोंकी व्याख्याको बिना अनुसन्धानके स्वीकार करके स्वयं पण्डित-अभिमानी हो जाते हैं। इस ग्रन्थका अनुशीलन करते हुए निरपेक्षभावसे उन सब दोषोंका परित्याग करना चाहिये। इस ग्रन्थमें वेदान्त और रसशास्त्रमूलक शुद्धभक्तितत्त्व श्रीमन्महाप्रभुके चरित्र-वर्णनमें प्रदर्शित हुआ है। मायावाद-मत-दूषित और सहजिया बाउल लोगोंके द्वारा प्रचारित विकृत धर्मके साथ इस ग्रन्थका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस बातका सम्पूर्णरूपसे विश्वास करके और स्मरण करके महोदयगण इस ग्रन्थका पाठ करेंगे।” इस ग्रन्थमें श्रीगौड़ीय वेदान्त समितिसे ‘अमृतप्रवाह भाष्य’ और ‘अनुभाष्य’के आनुगत्यमें ‘अमृतानुकणा’-नामसे एक भाष्य प्रदत्त हुआ है। श्रीरूप गोस्वामी, श्रीजीव गोस्वामी, श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर आदिके विभिन्न भाष्य, श्रीभक्तिविनोद ठाकुरके ‘श्रीचैतन्य-शिक्षामृत’, ‘जैवधर्म’ आदि ग्रन्थ और प्रबन्ध, श्रील प्रभुपादकी श्रीमद्भागवत-व्याख्या, उनके प्रकटकालीन प्रकाशित साप्ताहिक ‘गौड़ीय’ और ‘दैनिक नदीया प्रकाश’ आदि ही मूलतः उक्त भाष्यके उपकरण हैं। इसमें विशेष कुछ साम्प्रदायिक विचार और भजनके आनुषङ्गिक विषय आदि साध्यमत परिष्कृत हुए हैं। आजकल असिद्धान्तपर विभिन्न विचारोंके उपद्रव उदित होकर कलिके धर्मकी वृद्धि कर रहे हैं। जैसे नित्यसिद्ध श्रीगौरपार्षद श्रील प्रबोधानन्द सरस्वतीपादका कोई काशीवासी मायावादी श्रीप्रकाशानन्द सरस्वतीके साथ एकीकरणके द्वारा अपराधका आह्वान कर रहे हैं, कोई ब्रह्मवैवर्त्तके ‘अश्वमेधं गवालम्भं’ श्लोकके द्वारा विवर्त्तग्रस्त होकर श्रीचैतन्य महाप्रभुके स्वयं आचरित संन्यास ग्रहणको शास्त्रीय विचारका अतिक्रम करके श्रीरूपादि गोस्वामीवर्गके पारमहंस्य वेशको ही सर्वसाधारणका अधिकार कहकर प्रतिष्ठित करनेमें व्यस्त हैं, कोई श्रीचैतन्यदेवके साथ उडुपीके तत्कालीन तत्त्ववादी आचार्योंके साथ वार्तालापको केन्द्रित करके श्रीचैतन्यदेवको श्रीमध्व-सम्प्रदायकी परम्परासे बाहर करके स्वतन्त्र सम्प्रदायके प्रतिष्ठाताके रूपमें स्थापित करनेका आग्रह करते हैं, कोई कहना चाहते हैं—विधिमार्गके प्रति अश्रद्धावान् होकर कृत्रिम लोभके द्वारा रागानुग-मार्ग ही कलियुगमें सभीके द्वारा अवलम्बनीय है और इस प्रकार सिद्धदेह-कल्पना ही शुद्ध हरिभजन है—यही श्रीसनातन-शिक्षा है, और कोई श्रीसनातन गोस्वामीके मस्तकपर किसी मायावादी संन्यासीके गेरुवा-वस्त्र धारणके लिये श्रीजगदानन्द पण्डितके तिरस्कार-दर्शनमें शास्त्रीय गैरिकवस्त्र-धारणकी विधिका उन्मूलन करनेमें व्रती हुए हैं। इन सब भावोंसे देखा जाता है, श्रीचैतन्य महाप्रभुके द्वारा प्रदर्शित परमशुद्ध शास्त्रीय वैदिक वैष्णवधर्म “कालेन नष्टा प्रलये वाणीयं वेदसंज्ञिता” (भाः ११/१४/३) श्लोकानुसार कालक्रमसे विभिन्न मनःकल्पित विचारोंके द्वारा शास्त्रविधि-उल्लङ्घन हेतु स्वेच्छाचारिताके आश्रयमें नष्ट होता जा रहा है। ऐसे दुःसमयमें इन प्रकारके नाना अपसिद्धान्त-शमनमूलक उक्त ‘अमृतानुकणा’ निवेदन | xxv