श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुसरणका उपदेश प्रदान करते हुए हमें अनधिकार चर्चासे सावधान किया है। आत्म-कल्याणके आकाङ्क्षी साधक शुद्धभक्त-साधुसङ्गमें पुनः-पुनः श्रीचैतन्यचरितामृतका अनुशीलन करते रहनेसे क्रमशः ही इसके माधुर्यका आस्वादन करनेका सौभाग्य लाभ करेंगे। श्रीगुरु-वैष्णव-भगवान्में निष्कपट शरणागत भक्तिमान् निज परम-कल्याणार्थी भक्तोंके निकट यह ग्रन्थराज स्वयंको प्रकाश करते हुए उनको सिद्धान्तबोधका सौभाग्य प्रदान करेंगे। “यस्य देवे पराभक्ति यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” अर्थात् “जिसकी आराध्य देवमें जैसी भक्ति है, वैसी गुरुके प्रति भी होती है, तो उस व्यक्तिके हृदयमें सभी शास्त्रोंके मर्मार्थ स्वतः ही प्रकाशित होते हैं।” “याह भागवत पड़ वैष्णवेर स्थाने। एकान्त आश्रय कर चैतन्यचरणे॥ चैतन्येर भक्तगणेर नित्य कर सङ्ग। तबे त' जानिबा सिद्धान्त-समुद्र-तरङ्ग॥” “इसलिये शुद्ध वैष्णवके निकट जाकर भागवतका अध्ययन करो और श्रीचैतन्यदेवके चरणोंका एकान्त आश्रय करो। श्रीचैतन्यके भक्तोंका नित्यसङ्ग करो, तभी सिद्धान्त-समुद्रकी तरङ्गोंको जान सकोगे।” श्रीगुरु-वैष्णव-कृपालेशप्रार्थी— श्रीभक्तिवेदान्त नारायण xxviii | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत