श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसम्पादकीय निवेदन मेरे श्रीगुरुपादपद्म नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिप्रज्ञान केशव गोस्वामी महाराजके अन्तरङ्ग प्रियपार्षद मेरे ज्येष्ठ सतीर्थ नित्यलीलाप्रविष्ट ॐ विष्णुपाद अष्टोत्तरशतश्री श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराजके द्वारा प्रतिष्ठित 'श्रीगौड़ीय वेदान्त समिति ट्र था। श्रीमद्भक्तिवेदान्त वामन गोस्वामी महाराजने अपनी प्रकट-लीला-अभिनयकालमें इस ग्रन्थका प्रकाश सम्पूर्ण किया था। मैने उनके ही उच्छिष्टको ही ग्रहण करके उनकी प्रचारधाराको अविरुद्ध प्रवाहित रखनेके लिये इस हिन्दी संस्करणको प्रकाशित करनेके लिये सङ्कल्प किया था। इसमें मेरी अपनी कोई भी वीरता अथवा दक्षता नहीं है। श्रीचैतन्यचरितामृत शुद्धभक्तिसिद्धान्त-सन्मणि-स्वरूप एक अपूर्व एक ग्रन्थरत्न है। भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने श्रीमद्भागवत महापुराणका महात्म्य वर्णन करते हुए श्रीमद्भागवतको सर्ववेदान्तसार कहा है। नदियोंके मध्य गङ्गा, देवताओंके मध्य विष्णु, वैष्णवोंके मध्य शम्भु और पुराणोंके मध्य श्रीमद्भागवत महापुराण जिस प्रकार सर्वोत्तम हैं, उसी प्रकार श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीके द्वारा प्रणीत यह श्रीचैतन्यचरितामृत ग्रन्थरत्न भी वेद-वेदान्त-इतिहास- पुराण-पञ्चरात्रादि सभी शास्त्रोंका सार-सर्वोत्तम मीमांसा ग्रन्थ है। श्रीवृषभानुराजनन्दिनी श्रीमती राधारानीने स्वप्नके द्वारा श्रीविश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुरको साक्षात् कहा था, — श्रील कविराज गोस्वामी उनकी नर्म-सहचरी हैं, वे उनके हृदयके सभी भावोंसे अवगत हैं। श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामीने भी ग्रन्थमें लिखा है— "एइ ग्रन्थ लेखाय मोरे मदनमोहन। आमार लिखन येन शुकेर पठन॥" (अर्थात् श्रीमदनमोहन ही मुझसे यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं। मेरा लिखना तो शुकके पाठ करनेके जैसा है।) वास्तवमें उन्होंने जो सब निगूढ़ रससिद्धान्त उनके श्रीचैतन्यचरितामृत और श्रीगोविन्दलीलामृत ग्रन्थोंमें व्यक्त किये हैं, वे सर्वसाधारण लोगोंको बोधगम्य नहीं हैं। उन्होंने लिखा है,— "ए सब सिद्धान्त गूढ़—कहिते न युयाय। ना कहिले केह इहार अन्त नही पाय॥ अतएव कहि किछु करिया निगूढ़। बुझिबे रसिक भक्त, न बुझिबे मूढ़॥" (अर्थात् ये सब सिद्धान्त अतिगूढ़ हैं, इसलिये इनको कहना नहीं चाहिये। परन्तु यदि इनको नहीं कहूँगा, तो कोई इनको समझ नहीं पायेगा। इसलिये इसको निगूढ़ वचनोंके द्वारा कुछ कह रहा हूँ। रसिक भक्त इसे समझेंगे और मूढ़ व्यक्ति इसे नहीं समझ पायेंगे।) इसमें श्रील कविराज गोस्वामीने श्रीमन्महाप्रभुके शिक्षाष्टक, श्रीरूप-शिक्षा, श्रीसनातन-शिक्षा, श्रीराय-रामानन्द-संवाद, श्रीगोपीनाथ आचार्य और श्रीसार्वभौम भट्टाचार्यके वार्त्तालापादि वर्णनके प्रसङ्गमें सात्वत-शास्त्रोंसे ही सार मीमांसा ज्ञापनकी है। इसमें सम्बन्ध, अभिधेय और प्रयोजन तत्त्व सुन्दररूपसे वर्णित हुए हैं। यह ग्रन्थ एक साधारण बङ्गला पद्य ग्रन्थके जैसा दिखनेपर भी इसके निगूढ़ भाव-गाम्भीर्यका अनुधावन करते महा-महा-विद्वत्-शिरोमणियोंके मस्तक भी घूमने लगते हैं। श्रील कविराज गोस्वामीने विशेष सावधानी सहित भजनके क्रमपन्था xxvii