श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ ५/४१-४८ भयसे दुर्गमें आश्रय लेना और मथुरासे पलायन तथा आत्माराम होकर भी सोलह हजार रमणियोंके साथ विलास, इन सब विषयोंमें तत्त्वज्ञानीकी बुद्धि भी भ्रान्त हो जाती है।' यदि ये सभी कर्मादि वास्तविक ना हों, तो कभी भी तत्त्वज्ञानीकी बुद्धि भ्रान्त नहीं होगी। इसलिये भगवान्की अचिन्त्यशक्ति ही लीलाका कारण है। उनकी जैसी-जैसी इच्छा प्रकटित होती है, अचिन्त्यशक्ति भी उन-उन रूपोंमें ही लीलाका आविष्कार करती रहती है।' पञ्चरात्र-शास्त्र सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा अनुमोदित उपासनाकाण्डमय वेदोंका विस्ताररूपी ग्रन्थ है। यह राजस या तामस तन्त्र नहीं है, अपितु विद्वान लोग इसे 'सात्वत-संहिता' नामसे कहते हैं। इस ग्रन्थके वक्ता स्वयं श्रीनारायण हैं, ऐसा महाभारतमें शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्म-पर्वमें ३४९/६८ श्लोकमें विशेषरूपसे उल्लेख हुआ है। श्रीनारदादि दिव्य विद्वान, जो भ्रम-प्रमादादि चार दोषोंसे रहित हैं, वे लोग ही इस ग्रन्थके प्रवर्त्तक हैं। श्रीभागवत ग्रन्थ भी 'सात्वत-संहिता' नामसे परिचित है। श्रीपाद शङ्करका पाञ्चरात्रिक मतके सम्पूर्ण विपरीत होकर विरुद्ध बातको पाञ्चरात्रिक-मतरूपमें पूर्वपक्ष प्रस्तुतकर उसके खण्डनका प्रयास, केवल न्याय और सत्यको नकारना ही है। इस प्रयासका संक्षेपमें खण्डन करनेके उद्देश्यसे नीचे वर्णन किया जा रहा है- (१) ब्रह्मसूत्रके ४२-संख्या सूत्रके भाष्यमें श्रीपाद शङ्करने सङ्कर्षणको 'जीव' कहा है। वास्तविक वैष्णवोंने कभी भी सङ्कर्षणको 'जीव' नहीं कहा है। वे (सङ्कर्षण) स्वयं अधोक्षज, अच्युत, विष्णुवस्तु, जीवके अधिष्ठातृ-देवता, पूर्ण, अंशी, विभुचैतन्य, समस्त प्राकृत-अप्राकृत सृष्टिके कारण हैं। वे कभी भी अणुचैतन्य और अंश जीव नहीं हैं। जीवात्माका जन्म और मृत्यु नहीं है-इसको वैष्णव और कोई भी श्रौतपन्थी शास्त्रद्रष्टा तथा शास्त्रश्रोता स्वीकार करेंगे। (२) ४३-संख्या सूत्रके भाष्यके उत्तरमें मूल-सङ्कर्षणसे अन्य-अन्य समस्त प्रकारके विष्णुतत्त्वके प्राकट्यके विषय 'ब्रह्मसंहिता' में उल्लेख किया गया है-'दीपाचिरिव हि दशान्तरमभ्युपेत्य दीपायते विवृतहेतु-समानधर्मा। यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥' अर्थात् 'जिस प्रकार मूल प्रदीपसे प्रज्ज्वलित होकर अन्य दीप मूल प्रदीपके तुल्य ही प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार जो आदिपुरुष गोविन्द विष्णु होकर प्रकाश पा रहे हैं, उनका मैं भजन करता हूँ।' (३) ४४-संख्या सूत्रके भाष्यमें 'ये परस्पर भिन्न हैं, एकात्मक नहीं हैं'-श्रीशङ्कराचार्यके इस पूर्वपक्षको पाञ्चरात्रिकगण कभी भी अपने मतके रूपमें स्वीकार नहीं करते हैं। श्रीपाद शङ्करने अपने ही ४२वें सूत्रके भाष्यमें स्वीकार किया है (“स आत्मात्मानमनेकधा व्यूह्मावस्थित इति, तन्न निराक्रियते” अर्थात् “वे स्वयं अपने ही अनेक प्रकारके व्यूहरूपोंमें अवस्थित या विराजमान हैं, यह श्रुतिसङ्गत है, इस बातको हमलोग स्वीकार करते हैं।) यह बात उनकी इस सूत्रमें पूर्वपक्षकी आपत्तिकी विरोधी है अर्थात् उनके ४४वें सूत्रके भाष्य और ४२वें सूत्रोंके भाष्यके वक्तव्य परस्पर विरोधी हैं-जिसे वे पहले स्वीकार कर चुके हैं, पूर्वपक्षके रूपमें अब उसका खण्डन करनेकी चेष्टा कर रहे हैं। भागवत-लोगोंने नारायणके चतुर्व्यूहको स्वीकार करनेपर भी 'बहुईश्वरवाद' को स्वीकार नहीं किया। वे लोग तत्त्व-वस्तुको अद्वयज्ञान भगवान्के रूपमें २७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत