भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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५/४१-४८ ] है। क्योंकि आप कृपावशतः अपने आश्रित देवताओंके पराधीन दिखायी देते हैं, इसलिये इसमें आपकी स्वतन्त्रताकी हानि नहीं होती। आप इसलिये स्वकृत अर्थात् अपने देवताओंके द्वारा अर्जित सुख-दुःखादि रूप शुभाशुभ फलको क्या अपना मानते हैं? अथवा आत्मारामताके कारण उसमें सम्पूर्णरूपसे उदासीन रहते हैं? यह हम नहीं जानते हैं। किन्तु (विरुद्धगुणशाली) आपमें ये दोनों ही असम्भव नहीं है। 'भगवति' आदि दो विशेषण और 'ईश्वरमें' आदि पाँच विशेषण इसके कारण हैं। उसमें 'भगवत्' शब्दके द्वारा सर्वज्ञता, 'अपरिगणित' आदि विशेषणके द्वारा सद्गुणशालिता और 'केवल' पदके द्वारा ब्रह्मत्वकी सुस्पष्ट उपलब्धि होती है। ब्रह्मत्वके कारण सर्वत्र उदासीनताकी सम्भावना होनेपर भी 'भगवति' आदि दो गुणोंके द्वारा भक्त पक्षपातकी सम्भावना है। यदि कहें कि एक ही स्वरूपके एक साथ दो रूप किस प्रकार सम्भव हैं? इस आशङ्काके उत्तरमें “अर्वाचीन” आदि कहा है, अर्थात् जिस वस्तुके स्वरूपसे अवगत नहीं हुआ जा सकता, आप उन वादियोंके विवादसे अगोचर हैं। इसलिये अचिन्त्य आत्मशक्तिके कारण विरुद्ध होनेपर भी आपमें कौनसा विषय दुर्घट हो सकता है? आपका स्वरूप विवाद करनेवाले अभक्तोंके लिये अचिन्त्य हैं और उसी प्रकार आपकी शक्ति भी अचिन्त्य है। आपको नाना प्रकारके विरुद्धकार्योंका आश्रय देखकर यही अनुमान किया जा सकता है कि आपकी शक्ति अचिन्त्य है। ब्रह्मसूत्रकारोंने कहा है—'अचिन्त्य सेव्य-विषय एकमात्र श्रुति अर्थात् शब्द-प्रमाणके द्वारा गोचर होता है।” और स्कन्दपुराणमें भी कहा गया है—“अचिन्त्य विषयमें तर्कका कोई स्थान नहीं है।” जैसे प्राकृत मणि-महौषधादिमें भी यह अचिन्त्य प्रभाव दिखायी देता है, उसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिके अतिरिक्त परमेश्वरका परमेश्वरत्व सिद्ध हो नहीं सकता। इस अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे ही ईश्वरके माहात्म्यको समझना अत्यन्त कठिन कहा गया है। अज्ञान और इन्द्रजालविद्या जहाँ-तहाँ दिखलायी देती है, इसलिये अज्ञान और इन्द्रजालादिके द्वारा परमेश्वरका पारमैश्वर्य सिद्ध नहीं होता है। क्योंकि 'उपरत' आदि विशेषणके द्वारा ईश्वरमें इन दोनोंका अभाव प्रतिपादित हुआ है। ईश्वरमें अज्ञान और इन्द्रजाल स्वीकार करनेपर 'भगवति' इत्यादि छः प्रकारके विशेषण-प्रयोगका तात्पर्य निष्फल हो जाता है। इसलिये अचिन्त्यशक्ति निरूपक शास्त्रों और युक्तिके द्वारा, विश्वपालकत्व और उसमें उदासीनता, ये दो गुण विरोधी नहीं हो सकते। अज्ञानवशतः जिनका चित्त सर्पादि भावसे भावित है, उनकी बुद्धिमें रस्सी जिस प्रकार सर्प प्रतीत होती है, उसी प्रकार जिनकी मति नाना भावोंसे भावित है, इसलिये जो वास्तविक तत्त्व-ज्ञानशून्य हैं, आप भी उनके मतोंके अनुसार उन-उन भावोंमें प्रकाशित होते हैं। यदि कहें कि केवल-ज्ञानको 'ब्रह्म' और नाना प्रकारके धर्मोंकी आश्रय वस्तुको 'भगवान्' कहा जाता है, तो क्या ये दो भिन्न-भिन्न स्वरूप दिखायी देते हैं? इस आशङ्काको दूर करनेके लिये कहा है—'स्वरूपद्वयाभावात्'। इसके द्वारा कभी भी उनके स्वरूपमें द्वैतत्व नहीं कहा गया, केवल एक ही स्वरूपके दो प्रकारके धर्मोंका निर्णय किया गया है। इसलिये उनकी शक्ति-विलासकी जो विरोध प्रतीति होती है, उसीको ही उनका अचिन्त्य ऐश्वर्य कहा जाता है। यह उनका दोष ना होकर भूषण ही है। तीसरे स्कन्धमें भी इस प्रकार विरोध वर्णित हुआ है— 'प्राकृत-चेष्टाहीनता और कर्म, अजन्माका जन्म, कालस्वरूप होकर भी शत्रुके पाँचवाँ अध्याय | २७७