श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
५/४१-४८ ] है। क्योंकि आप कृपावशतः अपने आश्रित देवताओंके पराधीन दिखायी देते हैं, इसलिये इसमें आपकी स्वतन्त्रताकी हानि नहीं होती। आप इसलिये स्वकृत अर्थात् अपने देवताओंके द्वारा अर्जित सुख-दुःखादि रूप शुभाशुभ फलको क्या अपना मानते हैं? अथवा आत्मारामताके कारण उसमें सम्पूर्णरूपसे उदासीन रहते हैं? यह हम नहीं जानते हैं। किन्तु (विरुद्धगुणशाली) आपमें ये दोनों ही असम्भव नहीं है। 'भगवति' आदि दो विशेषण और 'ईश्वरमें' आदि पाँच विशेषण इसके कारण हैं। उसमें 'भगवत्' शब्दके द्वारा सर्वज्ञता, 'अपरिगणित' आदि विशेषणके द्वारा सद्गुणशालिता और 'केवल' पदके द्वारा ब्रह्मत्वकी सुस्पष्ट उपलब्धि होती है। ब्रह्मत्वके कारण सर्वत्र उदासीनताकी सम्भावना होनेपर भी 'भगवति' आदि दो गुणोंके द्वारा भक्त पक्षपातकी सम्भावना है। यदि कहें कि एक ही स्वरूपके एक साथ दो रूप किस प्रकार सम्भव हैं? इस आशङ्काके उत्तरमें “अर्वाचीन” आदि कहा है, अर्थात् जिस वस्तुके स्वरूपसे अवगत नहीं हुआ जा सकता, आप उन वादियोंके विवादसे अगोचर हैं। इसलिये अचिन्त्य आत्मशक्तिके कारण विरुद्ध होनेपर भी आपमें कौनसा विषय दुर्घट हो सकता है? आपका स्वरूप विवाद करनेवाले अभक्तोंके लिये अचिन्त्य हैं और उसी प्रकार आपकी शक्ति भी अचिन्त्य है। आपको नाना प्रकारके विरुद्धकार्योंका आश्रय देखकर यही अनुमान किया जा सकता है कि आपकी शक्ति अचिन्त्य है। ब्रह्मसूत्रकारोंने कहा है—'अचिन्त्य सेव्य-विषय एकमात्र श्रुति अर्थात् शब्द-प्रमाणके द्वारा गोचर होता है।” और स्कन्दपुराणमें भी कहा गया है—“अचिन्त्य विषयमें तर्कका कोई स्थान नहीं है।” जैसे प्राकृत मणि-महौषधादिमें भी यह अचिन्त्य प्रभाव दिखायी देता है, उसी प्रकार अचिन्त्यशक्तिके अतिरिक्त परमेश्वरका परमेश्वरत्व सिद्ध हो नहीं सकता। इस अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे ही ईश्वरके माहात्म्यको समझना अत्यन्त कठिन कहा गया है। अज्ञान और इन्द्रजालविद्या जहाँ-तहाँ दिखलायी देती है, इसलिये अज्ञान और इन्द्रजालादिके द्वारा परमेश्वरका पारमैश्वर्य सिद्ध नहीं होता है। क्योंकि 'उपरत' आदि विशेषणके द्वारा ईश्वरमें इन दोनोंका अभाव प्रतिपादित हुआ है। ईश्वरमें अज्ञान और इन्द्रजाल स्वीकार करनेपर 'भगवति' इत्यादि छः प्रकारके विशेषण-प्रयोगका तात्पर्य निष्फल हो जाता है। इसलिये अचिन्त्यशक्ति निरूपक शास्त्रों और युक्तिके द्वारा, विश्वपालकत्व और उसमें उदासीनता, ये दो गुण विरोधी नहीं हो सकते। अज्ञानवशतः जिनका चित्त सर्पादि भावसे भावित है, उनकी बुद्धिमें रस्सी जिस प्रकार सर्प प्रतीत होती है, उसी प्रकार जिनकी मति नाना भावोंसे भावित है, इसलिये जो वास्तविक तत्त्व-ज्ञानशून्य हैं, आप भी उनके मतोंके अनुसार उन-उन भावोंमें प्रकाशित होते हैं। यदि कहें कि केवल-ज्ञानको 'ब्रह्म' और नाना प्रकारके धर्मोंकी आश्रय वस्तुको 'भगवान्' कहा जाता है, तो क्या ये दो भिन्न-भिन्न स्वरूप दिखायी देते हैं? इस आशङ्काको दूर करनेके लिये कहा है—'स्वरूपद्वयाभावात्'। इसके द्वारा कभी भी उनके स्वरूपमें द्वैतत्व नहीं कहा गया, केवल एक ही स्वरूपके दो प्रकारके धर्मोंका निर्णय किया गया है। इसलिये उनकी शक्ति-विलासकी जो विरोध प्रतीति होती है, उसीको ही उनका अचिन्त्य ऐश्वर्य कहा जाता है। यह उनका दोष ना होकर भूषण ही है। तीसरे स्कन्धमें भी इस प्रकार विरोध वर्णित हुआ है— 'प्राकृत-चेष्टाहीनता और कर्म, अजन्माका जन्म, कालस्वरूप होकर भी शत्रुके पाँचवाँ अध्याय | २७७
[ ५/४१-४८ भयसे दुर्गमें आश्रय लेना और मथुरासे पलायन तथा आत्माराम होकर भी सोलह हजार रमणियोंके साथ विलास, इन सब विषयोंमें तत्त्वज्ञानीकी बुद्धि भी भ्रान्त हो जाती है।' यदि ये सभी कर्मादि वास्तविक ना हों, तो कभी भी तत्त्वज्ञानीकी बुद्धि भ्रान्त नहीं होगी। इसलिये भगवान्की अचिन्त्यशक्ति ही लीलाका कारण है। उनकी जैसी-जैसी इच्छा प्रकटित होती है, अचिन्त्यशक्ति भी उन-उन रूपोंमें ही लीलाका आविष्कार करती रहती है।' पञ्चरात्र-शास्त्र सम्पूर्ण वेदोंके द्वारा अनुमोदित उपासनाकाण्डमय वेदोंका विस्ताररूपी ग्रन्थ है। यह राजस या तामस तन्त्र नहीं है, अपितु विद्वान लोग इसे 'सात्वत-संहिता' नामसे कहते हैं। इस ग्रन्थके वक्ता स्वयं श्रीनारायण हैं, ऐसा महाभारतमें शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्म-पर्वमें ३४९/६८ श्लोकमें विशेषरूपसे उल्लेख हुआ है। श्रीनारदादि दिव्य विद्वान, जो भ्रम-प्रमादादि चार दोषोंसे रहित हैं, वे लोग ही इस ग्रन्थके प्रवर्त्तक हैं। श्रीभागवत ग्रन्थ भी 'सात्वत-संहिता' नामसे परिचित है। श्रीपाद शङ्करका पाञ्चरात्रिक मतके सम्पूर्ण विपरीत होकर विरुद्ध बातको पाञ्चरात्रिक-मतरूपमें पूर्वपक्ष प्रस्तुतकर उसके खण्डनका प्रयास, केवल न्याय और सत्यको नकारना ही है। इस प्रयासका संक्षेपमें खण्डन करनेके उद्देश्यसे नीचे वर्णन किया जा रहा है- (१) ब्रह्मसूत्रके ४२-संख्या सूत्रके भाष्यमें श्रीपाद शङ्करने सङ्कर्षणको 'जीव' कहा है। वास्तविक वैष्णवोंने कभी भी सङ्कर्षणको 'जीव' नहीं कहा है। वे (सङ्कर्षण) स्वयं अधोक्षज, अच्युत, विष्णुवस्तु, जीवके अधिष्ठातृ-देवता, पूर्ण, अंशी, विभुचैतन्य, समस्त प्राकृत-अप्राकृत सृष्टिके कारण हैं। वे कभी भी अणुचैतन्य और अंश जीव नहीं हैं। जीवात्माका जन्म और मृत्यु नहीं है-इसको वैष्णव और कोई भी श्रौतपन्थी शास्त्रद्रष्टा तथा शास्त्रश्रोता स्वीकार करेंगे। (२) ४३-संख्या सूत्रके भाष्यके उत्तरमें मूल-सङ्कर्षणसे अन्य-अन्य समस्त प्रकारके विष्णुतत्त्वके प्राकट्यके विषय 'ब्रह्मसंहिता' में उल्लेख किया गया है-'दीपाचिरिव हि दशान्तरमभ्युपेत्य दीपायते विवृतहेतु-समानधर्मा। यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभाति गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥' अर्थात् 'जिस प्रकार मूल प्रदीपसे प्रज्ज्वलित होकर अन्य दीप मूल प्रदीपके तुल्य ही प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार जो आदिपुरुष गोविन्द विष्णु होकर प्रकाश पा रहे हैं, उनका मैं भजन करता हूँ।' (३) ४४-संख्या सूत्रके भाष्यमें 'ये परस्पर भिन्न हैं, एकात्मक नहीं हैं'-श्रीशङ्कराचार्यके इस पूर्वपक्षको पाञ्चरात्रिकगण कभी भी अपने मतके रूपमें स्वीकार नहीं करते हैं। श्रीपाद शङ्करने अपने ही ४२वें सूत्रके भाष्यमें स्वीकार किया है (“स आत्मात्मानमनेकधा व्यूह्मावस्थित इति, तन्न निराक्रियते” अर्थात् “वे स्वयं अपने ही अनेक प्रकारके व्यूहरूपोंमें अवस्थित या विराजमान हैं, यह श्रुतिसङ्गत है, इस बातको हमलोग स्वीकार करते हैं।) यह बात उनकी इस सूत्रमें पूर्वपक्षकी आपत्तिकी विरोधी है अर्थात् उनके ४४वें सूत्रके भाष्य और ४२वें सूत्रोंके भाष्यके वक्तव्य परस्पर विरोधी हैं-जिसे वे पहले स्वीकार कर चुके हैं, पूर्वपक्षके रूपमें अब उसका खण्डन करनेकी चेष्टा कर रहे हैं। भागवत-लोगोंने नारायणके चतुर्व्यूहको स्वीकार करनेपर भी 'बहुईश्वरवाद' को स्वीकार नहीं किया। वे लोग तत्त्व-वस्तुको अद्वयज्ञान भगवान्के रूपमें २७८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/४१-४८ ] स्वीकार करते हैं, वे कभी भी वेदविरोधी बहु-ईश्वरवादी नहीं हैं। उनका श्रीनारायणकी अचिन्त्य-महाशक्तिमत्तामें दृढ़ विश्वास है। लघुभागवतामृतका मर्मानुवाद द्रष्टव्य है। वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-इन चार तत्त्वोंमें कारण-कार्य-भाव नहीं है। 'नान्यत् यत् सदसत्परम्', 'देहदेहि-विभेदोऽयं नेश्वरे विद्यते क्वचित्' (कूर्म पुराण), वे सभी मायाधीश तत्त्व, शुद्धसत्त्वके अधिष्ठाता और तुरीय हैं, उनके प्रकाशोंमें भी मायाका कोई विक्रम या विकार अथवा परिणाम या खण्डत्व नहीं रह सकता। वे एक ही अद्वयज्ञान, अधोक्षज और पूर्णवस्तु हैं। श्रुतिप्रमाण (बृः आः ५/१)-“ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥” ब्रह्मासे लेकर घासके तिनके तक या भगवान् विष्णुके स्थूल बाह्य-अङ्ग विश्वरूपको त्रिशक्तिके (अन्तरङ्गा, तटस्था और बहिरङ्गा शक्तिके) अधीश श्रीचतुर्व्यूहके साथ एक अथवा समज्ञान-'चित्-अचित्-समन्वयवादियों'का वृथा प्रयास और नितान्त भगवत्-विरोधमूलक नास्तिकवाद मात्र है। ब्रह्मासे लेकर घासके तिनके तक या विश्वरूप विष्णुका बहिरङ्गवैभव-एकपादविभूति है। यह माया या प्रकृति-सम्बन्धी होनेके कारण प्राकृत है। इसके साथ चित्-अचित्के ईश्वर चतुर्व्यूहका साम्यज्ञान या प्रयास-यह मायावादियोंका धर्म है। (४) ४५-संख्या भाष्यके उत्तरमें लघुभागवतामृतमें भगवत्-गुणोंके अप्राकृतत्व-वर्णन प्रसङ्गमें (९७-९९ संख्यामें) उद्धृत वाक्यका मर्मानुवाद-'यदि कहें कि गुणमात्र ही प्रकृतिका कार्य है, इसलिये मरीचिकाके समान उसकी गिनती नहीं की जाती है। इससे और अधिक आश्चर्यकी बात क्या हो सकती है? आप यह बात कह नहीं सकते, क्योंकि भगवान्के गुण कभी भी प्राकृत नहीं हो सकते। उनके सारे गुण ही उनके स्वरूपभूत हैं, इसलिये वे सभी गुण निश्चय ही सुखस्वरूप हैं। जैसे ब्रह्मतर्कमें-'भगवान् हरि निज-स्वरूपभूत गुणोंसे गुणवान् हैं, इसलिये विष्णु और मुक्तजीवोंके गुण कभी भी उनके निज-स्वरूपसे पृथक् नहीं हैं।' श्रीविष्णुपुराणमें— 'जिन परमेश्वरमें सत्त्वादि प्राकृतगुणोंका संसर्ग नहीं है, वही परमशुद्ध आदिपुरुष हरि प्रसन्न हों।' और उसी विष्णुपुराणमें—'हेय अर्थात् प्राकृत-गुणोंसे परे समग्र ज्ञान, शक्ति, बल, ऐश्वर्य, वीर्य और तेज-ये भगवत्शब्दके अभिधेय हैं।' पद्मपुराणमें भी- 'परमेश्वरको जिन शास्त्रोंमें 'निर्गुण' कहा गया है, उसके द्वारा उनमें हेय या प्राकृत गुणका अभाव ही कहा गया है।' प्रथम स्कन्ध, सोलहवें अध्यायमें भी - 'हे धर्म, मैंने जो सब गुण बतलाये, वह सब गुणपरम्परा और अन्य महागुणराशि जो श्रीकृष्णमें नित्यरूपमें विराजमान हैं, महत्त्वाभिलाषी व्यक्ति भी जिन सभी गुणोंके लिये प्रार्थना करते हैं, वह सभी गुणावली कभी भी श्रीकृष्णसे अलग नहीं होती।' इसलिये ये श्रीकृष्ण असंख्य-अप्राकृत-गुणशाली, असीम-शक्तिशाली और पूर्ण-आनन्द-घनविग्रह हैं।” भागवत ३/२६/२१,२५,२७,२८ श्लोक द्रष्टव्य हैं।” श्रीरामानुजका 'श्रीभाष्य' जिसमें शाङ्कर युक्तियोंका खण्डन किया गया है, उसका मर्मानुवाद इस प्रकार है- 'श्रीशङ्करने श्रीभगवान्के द्वारा कहे गये परममङ्गल-साधन पञ्चरात्र-शास्त्रके किसी-किसी अंशको कपिलादि-शास्त्रोंकी भाँति श्रुतिविरुद्ध मानकर पञ्चरात्र-शास्त्रको अप्रमाणिक होनेकी पाँचवाँ अध्याय | २७९
[ ५/४१-४८ आशङ्का करके उसका त्याग किया है।' पञ्चरात्र-शास्त्रमें कहा गया है—'परमकारण ब्रह्मस्वरूप वासुदेवसे 'सङ्कर्षण' नामक जीवकी उत्पत्ति हुई है, सङ्कर्षणसे 'प्रद्युम्न' नामक मनकी उत्पत्ति और मनसे 'अनिरुद्ध' नामक अहङ्कारकी उत्पत्ति हुई है।' किन्तु यहाँपर जीवकी उत्पत्ति कहा नहीं जा सकता, क्योंकि यह श्रुतिविरुद्ध है। (कठोपनिषद् २/१८) में कहा है—'चिन्मय जीवात्माका कभी भी जन्म या मृत्यु नहीं होती।' यह वाक्य और सभी श्रुतियाँ ही जीवको अनादि या उत्पत्तिरहित कहती हैं। इसलिये यहाँपर सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धको क्रमशः जीव, मन और अहङ्कारके अधिष्ठातृदेव कहा गया है और उत्पत्ति शब्दके द्वारा उनका आविर्भाव ही उद्दिष्ट हुआ है (४२ सू०)। सङ्कर्षणसे प्रद्युम्न नामक मनकी उत्पत्ति कही गयी है। यहाँ भी कर्त्ता-जीवसे करण-मनकी उत्पत्ति सम्भव नहीं है, क्योंकि श्रुतिमें कहा गया है—“परमात्मासे ही प्राण, मन और इन्द्रियों, सभीकी उत्पत्ति होती है।" इसलिये यदि जीवसे मनकी उत्पत्ति कही गई है, तब 'परमात्मासे इन सबकी उत्पत्ति होती है', इस प्रकार श्रुतिवचनसे उसका विरोध होता है। यह वाक्य श्रुतिविरुद्ध अर्थका प्रतिपादन करता है, इसलिये इसका प्रमाणके रूपमें निषेध किया है (४३ सू०)। सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इनमें परब्रह्मभाव विद्यमान रहनेके कारण उसके प्रतिपादक शास्त्रोंकी प्रमाणिकताको कभी भी अस्वीकार नहीं किया जा सकता। अर्थात् ये सङ्कर्षणादि व्यूह साधारण जीवकी भाँति मायावशयोग्य रूपमें अभिप्रेत नहीं हैं—ये सभी ईश्वर हैं—सभी ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज आदि षडैश्वर्यसम्पन्न हैं, इसलिये पञ्चरात्रका मत अप्रमाणिक नहीं है। जो पञ्चरात्र या भागवत-प्रक्रियासे अनभिज्ञ हैं, उनके पक्षमें ही ‘(पञ्चरात्रादिमें) जीवोंकी उत्पत्तिरूपा विरुद्धकथा अभिहित हुई है'—इस प्रकार अशास्त्रीय बात कहना सम्भव है। भागवत-प्रक्रिया इस प्रकार है—'जिन्हें स्वाश्रितभक्तवत्सल, वासुदेव नामक परब्रह्म कहा गया है, वे स्वेच्छासे स्वाश्रित और समश्रेणियताके लिये चार प्रकारसे अवस्थान करते हैं। जैसे पौष्कर-संहितामें कहा गया है—'जो शास्त्र ब्राह्मणोंके द्वारा क्रमागत (वंशपरम्पराप्राप्त) संज्ञाओंके द्वारा अवश्य-कर्त्तव्य रूपमें चतुर्व्यूहकी उपासनाका निर्देश करते हैं, वे शास्त्र ही 'आगम' हैं।' सात्वत-संहितामें भी कहा गया है कि इन चतुर्व्यूहकी उपासना वासुदेव नामक परब्रह्मकी ही उपासना है। वासुदेव नामक परब्रह्म, सम्पूर्ण षडैश्वर्ययुक्त विग्रह, सूक्ष्म, व्यूह और विभव, इन सब भेदभिन्न और अधिकारानुसारसे भक्तोंके द्वारा ज्ञानपूर्वक कर्मके द्वारा अर्चित होकर सम्यक् रूपसे उनको प्राप्त होते हैं। विभव अर्थात् नृसिंहदेव, रघुनाथ (रामचन्द्र) या मत्स्य-कूर्मादि अवतारोंके अर्चनसे सङ्कर्षणादि व्यूहकी प्राप्ति होती है और उस व्यूहके अर्चनसे वासुदेव-नामक परब्रह्मकी प्राप्ति होती है। क्योंकि पौष्कर-संहितामें कहा है—'इस शास्त्रकी विधि अनुसार ज्ञानपूर्वक कर्मोंके द्वारा वासुदेव-नामक अव्यय परमब्रह्मकी प्राप्ति होती है।' इसलिये सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्धका भी परब्रह्मत्व सिद्ध हुआ है, क्योंकि वे भी स्वेच्छासे विग्रह-विशिष्ट हैं अर्थात् उन्होंने स्वेच्छासे वे विशिष्ट विग्रह धारण किये हैं। 'वे प्राकृत प्राणीकी भाँति जन्म ग्रहण ना कर अनेक रूपोंमें अवतीर्ण अथवा प्रकटित होते हैं', २८० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
यह श्रुतिके द्वारा सिद्ध है। भक्तवात्सल्यके कारण वे स्वेच्छासे कोई भी रूप धारण कर सकते हैं, यह बात पञ्चरात्र-शास्त्रके विरुद्ध नहीं है। इस शास्त्रमें सङ्कर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध-क्रमशः जीव, मन और अहङ्कार सत्त्वसमूहके अधिष्ठातृदेव हैं, इसलिये 'जीवादि' शब्दके द्वारा इनका जो उल्लेख किया गया है, वह शास्त्र विरुद्ध नहीं है। जैसे 'आकाश' और 'प्राणादि' शब्दोंसे कभी ब्रह्मको सम्बोधित किया जाता है (४४ सूः)। इस शास्त्रमें जीवोत्पत्तिका निषेध हुआ है। क्योंकि परम-संहितामें कहा है-'अचेतन, दूसरोंके द्वारा प्रयोगके योग्य और सदा विकारयोग्य त्रिगुण ही कर्मियोंका क्षेत्र है-यही प्रकृतिका रूप है। इसका परब्रह्मके साथ सम्बन्ध व्याप्ति रूपमें है, वे भी अनादि हैं और यह भी सत्य है।' इस प्रकार सभी संहिताओंमें ही 'जीव' को नित्य कहा गया है, इसलिये पञ्चरात्र-मतमें उसकी उत्पत्तिका निषेध हुआ है। जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका विनाश अवश्यम्भावी है,-यदि जीवकी उत्पत्तिको स्वीकार किया जाता है, तो उसके विनाशको भी स्वीकार करना होगा। किन्तु जीव जब नित्य है, तब नित्यत्व होनेके कारण उसकी उत्पत्तिका स्वयं ही निषेध होगा। परमसंहिताके प्रारम्भमें कहा गया है-'प्रकृतिका रूप सदा विकारयुक्त है', इसलिये उत्पत्ति और विनाशादिको इस 'सदा विकार'के अन्तर्गत जानना होगा। इसलिये सङ्कर्षणादि जीवरूपसे उत्पन्न होते हैं, ऐसा कहकर श्रीशङ्कराचार्यने जो दोष दिखलाये हैं, उसका खण्डन हुआ है (४५ सूः)। भागवत ३/१/३४ श्लोककी श्रीधरस्वामीकी टीका द्रष्टव्य है। 'श्रीशङ्कराचार्यके चतुर्व्यूहवादखण्डन'के खण्डनको विस्तृत रूपसे जाननेके इच्छुक श्रीभाष्यकी श्रीमत्सुदर्शनाचार्यकृत "श्रुतप्रकाशिका" टीकाकी आलोचना करें॥४१-४८॥ अष्टम श्लोकेर कैल संक्षेप विवरण। नवम श्लोकेर अर्थ शुन दिया मन॥४९॥ अनुवाद-आठवें श्लोकका मैंने संक्षेपमें वर्णन किया। नवें श्लोकका अर्थ अब ध्यानपूर्वक श्रवण करो॥४९॥ मङ्गलाचरणके चौदह श्लोकोंमें नवें श्लोकका अर्थ :- श्रीस्वरूपगोस्वामीके कड़चासे- मायाभर्त्ताजाण्डसङ्घाश्रयाङ्गः शेते साक्षात् कारणाम्भोधि-मध्ये। यस्यैकांशः श्रीपुमानादिदेव- स्त श्रीनित्यानन्दरामं प्रपद्ये ॥५०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-जिनके एक अंशस्वरूप मायाके स्वामी, ब्रह्माण्डोंके आश्रयरूप कारणाब्धिशायी, आदिदेव पुरुषावतार हैं, उन श्रीनित्यानन्द-रामको मैं प्रणाम करता हूँ॥५०॥ अनुभाष्य-साक्षात् मायाभर्त्ता (मायायाः भर्त्ता अधीश्वरः) अजाण्डसङ्घाश्रयाङ्ग (अजाण्डानां ब्रह्माण्डानां सङ्घः समूहः तस्य आश्रयः अङ्ग यस्य सः) कारणाम्भोधिमध्ये (कारणसमुद्र-जलोपरि) शेते, असौ श्रीपुमान् आदिदेवः (आदिपुरुषावतारः) यस्य (श्रीनित्यानन्दस्य) एकांश तं श्रीनित्यानन्दरामम् [अहं] प्रपद्ये। पाँचवाँ अध्याय | २८१
[ ५/५०-५६ श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५०॥ कारणजलका वर्णन :- वैकुण्ठ-बाहिरे सेइ ज्योतिर्मय धाम। ताहार बाहिरे 'कारणार्णव' नाम॥५१॥ परव्योमकी सीमापर कारण-सागर :- वैकुण्ठ बेड़िया एक आछे जलनिधि। अनन्त, अपार-तार नाहिक अवधि॥५२॥ अनुवाद-परव्योमधामके बाहर ज्योतिर्मय ब्रह्मधाम है और उसके बाहर 'कारण-समुद्र' है। वैकुण्ठके बाहर एक अनन्त-अपार जलराशि है, जिसके विस्तारकी कोई सीमा नहीं है॥५१-५२॥ अनुभाष्य-'जलनिधि'-'विरजा' या 'कारणजल' (मध्यलीला १५/१७५-१७६, मध्यलीला २०/२६८-२६९ और मध्यलीला २१/५२ द्रष्टव्य हैं)॥५२॥ वैकुण्ठमें स्थित महाभूतादि मायातीत :- वैकुण्ठेर पृथिव्यादि सकल चिन्मय। मायिक भूतेर तथि जन्म नाहि हय॥५३॥ अनुवाद-वैकुण्ठके पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाशादि शुद्धसत्त्वसे उत्पन्न होनेके कारण पूर्ण रूपसे चिन्मय है, उसमें मायाके पञ्चमहाभूतोंका लेशमात्र भी नहीं है॥५३॥ अनुभाष्य-'मायिक भूत' अर्थात् पृथ्वी आदि पञ्चमहाभूत॥५३॥ कारणजलकी चिन्मयता :- चिन्मय-जल सेइ परम-'कारण'। यार एक कणा गङ्गा पतितपावन॥५४॥ अनुवाद-कारण-समुद्र इस जगत्का मूल कारण है और उसका जल पूर्ण चिन्मय है। उसकी एक बूँद स्वरूप गङ्गा हैं, जो पतितोंको पवित्र करनेवाली हैं॥५४॥ अनुभाष्य-'कारण'-माया-सम्बन्धयुक्त उपाधि होनेपर भी वस्तुतः मिश्र रज-तमसे शून्य या सत्त्वमय है। आदिलीला २/५३ द्रष्टव्य है॥५४॥ परव्योममें स्थित सङ्कर्षण ही एकांशसे कारणोदशायी :- सेइ त' कारणार्णवे सेइ सङ्कर्षण। आपनार एक अंश करेन शयन॥५५॥ अनुवाद-उस कारण समुद्रमें वे सङ्कर्षण अपने एक अंश कारणोदशायी विष्णु रूपमें शयन करते हैं॥५५॥ वे ही आदि पुरुषावतार और मायाके ईक्षणकर्त्ता :- महत्स्रष्टा पुरुष, तिँहो जगत्-कारण। आद्य-अवतार करे मायार दरशन॥५६॥ २८२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/५६-५८ ] कारण-समुद्र मायाके स्पर्शसे अतीत :- मायाशक्ति रहे कारणाब्धिर बाहिरे। कारण-समुद्र माया परशिते नारे॥५७॥ अनुवाद—आदि-अवतार, महत्-तत्त्वकी सृष्टि करनेवाले और जगत्के कारणस्वरूप, कारणोदशायी विष्णु मायापर दृष्टिपात करते हैं। कारण-समुद्र चिन्मय होनेके कारण मायाशक्ति उसके बाहर ही अवस्थान करती है, वह उसे स्पर्श नहीं कर सकती॥५६-५७॥ मायाके दो रूप, प्रधान और प्रकृति :- सेइ त' मायार दुइविध अवस्थिति। जगतेर उपादान 'प्रधान', 'प्रकृति'॥५८॥ अनुवाद—मायाशक्तिकी दो प्रकारसे अवस्थिति है। एक वह जगत्के उपादान कारण 'प्रधान' के रूपमें और दूसरे वह जगत्के निमित्त कारण 'प्रकृति' के रूपमें अवस्थान करती है॥५८॥ अनुभाष्य—'प्रधान' और 'प्रकृति' इस विषयमें मध्यलीला २०/२७१ द्रष्टव्य है। श्रीजीव गोस्वामीकृत परमात्मसन्दर्भ (४९ संख्या)में— “तस्याः मायायाश्चांशद्वयम्। तत्र गुणरूपस्य मायाख्यस्य निमित्तांशस्य, द्रव्यरूपस्य प्रधानाख्यस्योपादानांशस्य च परस्परं भेदमाह चतुर्भिः (भाः ११/२४/१)”×× (५३ संख्या) “अन्यत्र तयोरुपादाननिमित्तयोरंशेन वृत्तिभेदेनभेदानप्याह (भाः १०/६३/२६)— 'कालो दैवं कर्म जीवः स्वभावो, द्रव्यं क्षेत्रं प्राणमात्मा विकारः। तत्सङ्घातो बीजरुहप्रवाहस्तन्मायैषा तन्निषेधं प्रपद्ये॥' अत्र कालदैवकर्मस्वभावा निमित्तांशाः, अन्ये उपादानांशाः, तद्वान् जीवस्तूभयात्मकस्तथोपादानवर्गे निमित्तशक्त्यंशोऽप्यनुवर्त्तते।' ×× (५५ संख्यामें) “निमित्तांशरूपया मायाख्ययैव प्रसिद्धा शक्तिस्त्रिधा दृश्यते—ज्ञानेच्छाक्रियारूपत्वेन। ×× अथोपादानांशस्य प्रधानस्य लक्षणः (भाः ३/२६/१०)—'यत्तत् त्रिगुणमव्यक्तं नित्यं सदसदात्मकम्। प्रधानं प्रकृतिं प्राहुरविशेषं विशेषवत्॥' यत् खलु त्रिगुणं सत्त्वादिगुणत्रय- समाहारस्तदेवाव्यक्तं प्रधानं प्रकृतिञ्च प्राहुः। तत्राव्यक्तसंज्ञत्वे हेतुः—'अविशेषं गुणत्रयसाम्यरूपत्पादनभि-व्यक्तविशेषम्, अतएवाव्याकृतसंज्ञञ्चेति गमितम्। प्रधानसंज्ञत्वेहेतुः—विशेषवत् स्वकार्यरूपाणां महदादिविशेषाणामाश्रयरूपतया तेभ्यः श्रेष्ठम्।' ×× निमित्तांशो माया, उपादानांशः प्रधानमिति।” ‘भगवान्की बहिरङ्गा-शक्ति मायाके दो अंश हैं—निमित्तांश 'गुणरूपा माया' और उपादानांश 'द्रव्यरूप प्रधान'—इन दोनों संज्ञाका भेद भागवतके चार श्लोकों (११/२४/१-४) में वर्णित हुआ है।' अन्यत्र १०/६३/२६ में उपादान और निमित्त, इन दो अंशोंका वृत्ति भेदसे विभाग वर्णित हुआ है—“हे भगवन्! क्षोभक 'काल', निमित्त 'कर्म', फलरूपमें प्रकाशित 'दैव' और उसका संस्कार 'स्वभाव'—ये चारों निमित्तांशयुक्त बद्धजीव—सूक्ष्मभूतसमूह 'द्रव्य', प्रकृति 'क्षेत्र', सूत्र 'प्राण', अहङ्कार आत्मा और ग्यारह इन्द्रियाँ और पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एवं आकाश—ये सोलह विकार',—इन सबका एकत्रित रूप 'देह' है। देहसे बीजरूप कर्म और कर्मसे अङ्कुररूप देह, इस प्रकारका पुनः-पुनः प्रवाह—यही 'माया' है। हे प्रभो! आप मायाके निषेध-अवधिभूत तत्त्व हैं, मैं आपका भजन करता हूँ।” जीव निमित्तशक्त्यांश होनेपर भी उभयात्मक अंशविशिष्ट जीव उपादानवर्गका भी अनुसरण करते हैं। निमित्तांशरूपा 'माया' शक्तिके—'ज्ञान', 'इच्छा' और 'क्रिया' रूप तीन विभाग देखे जाते हैं। उपादानांश 'प्रधान'के लक्षण—'जहाँ सत्त्व, रजो और तमो गुणोंकी साम्यावस्था
पाँचवाँ अध्याय | २८३
[ ५/५८-६१ है, उसे ही 'अव्यक्त', 'प्रधान' और 'प्रकृति' कहा जाता है। 'अव्यक्त'-संज्ञा निर्देश करनेका कारण यह है—यह विशेषरहित है अर्थात् तीनों गुण साम्यावस्थामें होनेके कारण उनका विशेषधर्म अप्रकाशित है, इसलिये प्रधानको 'अव्याकृत' कहा जाता है। 'प्रधान'-संज्ञाका कारण—विशेषकी भाँति मायाके स्वकार्यरूप महात्तत्त्वादि विशेषसमूहका आश्रयरूप होनेके कारण उनसे श्रेष्ठ है।"॥५८॥ गुणमयी माया कभी भी जगत्का मुख्य कारण नहीं :- जगतकारण नहे, प्रकृति जड़रूपा। शक्ति सञ्चारिया तारे कृष्ण करे कृपा॥५९॥ भगवान्के ईक्षणके प्रभावसे प्रकृति जगत्का गौण-कारण :- कृष्णशक्त्ये प्रकृति हय गौण-कारण। अग्निशक्त्ये लौह यैछे करये जारण॥६०॥ भगवान् ही जगत्के मूलकारण :- अतएव कृष्ण मूल-जगतकारण। प्रकृति-कारण, यैछे अजा-गलस्तन॥६१॥ अनुवाद—माया जगत्का कारण नहीं है, क्योंकि प्रकृति जड़रूपा है। श्रीकृष्ण ही कृपा करके उसमें अपनी शक्ति सञ्चारित करते हैं। जैसे अग्निसे शक्ति प्राप्त करके लोहा जला सकता है, वैसे ही कृष्णशक्तिके द्वारा प्रकृति सृष्टिका गौण कारण है। इसलिये श्रीकृष्ण ही जगत्के मूल कारण हैं। बकरेके गलेमें स्तन जैसे मांसपिण्ड [जो दूध नहीं दे सकते], उसके समान ही प्रकृति भी जगत्का कारण दिखलायी देती है॥५९-६१॥ अनुभाष्य—मध्यलीला २०/२५९-२६१ संख्या द्रष्टव्य है। बहिरङ्गा मायाशक्ति जगत्के उपादानांशसे 'प्रधान' और 'प्रकृति' [प्रकृतिको कहीं प्रधान और कहीं माया भी कहा गया है] नामसे प्रसिद्ध है और जगत्के निमित्तांशसे 'माया' नामसे परिचित है। जड़रूपा प्रकृति जगत्का कारण नहीं है, क्योंकि श्रीकृष्ण कारणोदकशायी महाविष्णुरूपमें प्रकृतिमें उपादान या द्रव्यशक्ति प्रदानकर 'शक्ति' सञ्चार करते हैं। उदाहरण स्वरूप, जिस प्रकार लोहेकी जलाने या ताप देने आदिकी शक्ति नहीं है, किन्तु अग्निके स्पर्शसे तप्त लोहा दूसरे वस्तुओंको जलानेमें या ताप प्रदान करनेमें समर्थ हो जाता है, उसी प्रकार लोहेकी भाँति जड़ा-प्रकृतिकी भी द्रव्य या उपादान होनेकी स्वतन्त्रता नहीं है। [अग्नि-सदृश] कारणोदकशायीकी ईक्षणशक्ति सञ्चारित होनेपर ही [लोहे-सदृश] प्रकृति उपादानके समान शक्तिविशिष्टा हो जाती है। उपादानके रूपमें परिचित प्रकृतिको उपादान-कारण मानना भ्रान्ति मात्र है। श्रीकपिलदेवने भी कहा है (भाः ३/२८/४०)— “यथोल्मुकाद्विस्फुलिङ्गात् धूमाद्वापि स्वसम्भवात्। अप्यात्मत्वेनाभिमताद् यथाग्निः पृथगुल्मुकात्॥” अर्थात् “अग्निके साथ आपाततः एक प्रतीत होनेपर भी जिस प्रकार धुआँ, जलती हुई लकड़ी और चिङ्गारियाँ—तीनों ही अग्निसे पृथक् हैं, उसी प्रकार जलती हुई लकड़ी स्थानीय 'प्रधान', धुआँ स्थानीय 'पञ्चभूत, इन्द्रियों और अन्तकरण' (स्थूल और सूक्ष्म देह) तथा चिङ्गारी २८४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
स्थानीय 'जीव', सभी अग्नि स्थानीय सर्व-उपादान भगवान्से शक्ति प्राप्तकर अपना-अपना पृथक् परिचय देते हैं; इसलिये भगवान् ही सबके उपादान हैं।" जगत्का उपादान कहकर जिस 'प्रधान' को स्थिर किया जाता है, उस प्रधानमें भगवान्के द्वारा प्रदत्त उपादानसे ही उसका इस प्रकार परिचय है। 'प्रधान' का उपादानत्व भगवान्से स्वतन्त्र विषय नहीं हो सकता। उपादानके मूलाश्रय श्रीकृष्णको भूलकर सांख्यवादियोंका प्रकृतिमें उपादानत्व आरोप करना-बकरेके गलेमें स्थित स्तनाकृति-मांसपिण्डकी दूध देनेमें असमर्थताके समान निष्फल प्रयास मात्र है॥५९-६१॥ श्रीनारायण ही निमित्त कारण :- माया-अंशे कहि तारे निमित्त-कारण। सेइ नहे, याते कर्त्ता-हेतु-नारायण॥६२॥ मूल-परिचालक विभु-चैतन्य भगवान् :- घटेर निमित्त-हेतु यैछे कुम्भकार। तैछे जगतेर कर्त्ता-पुरुषावतार ॥६३॥ मायाके द्वारा श्रीकृष्णकी जगत्की सृष्टि :- कृष्ण-कर्त्ता, माया ताँर करेन सहाय। घटेर कारण-चक्र-दण्डादि उपाय॥६४॥ अनुवाद-'माया' अंशसे जिसे निमित्त कारण कहा जाता है, वह भी सत्य नहीं है, क्योंकि नारायण ही वास्तविक निमित्त-कारण हैं। कुम्हार जैसे घटका निमित्त-कारण है, वैसे ही प्रथम पुरुषावतार ही जगत्के निमित्त कारण हैं। श्रीकृष्ण ही जगत्के सृष्टिकर्त्ता हैं। इस कार्यमें माया केवल उनकी सहायिका है, जैसे चक्र-दण्डादि घट निर्माणमें उपाय (सहायक) हैं॥६४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-परव्योमधामके बाहर ज्योतिर्मय 'ब्रह्मधाम' है और उसके बाहर 'कारणसमुद्र' है। चिन्मय जगत् कारण-शून्य है अर्थात् उसका कोई कारण नहीं है और माया कारणमयी है। इन दोनोंके मध्यवर्ती-स्थलको चिन्मयजलनिधिके रूपमें 'कारण-समुद्र' कहा गया है; क्योंकि उसी जलमें शयन करनेवाले महाविष्णुका ईक्षण ही उसके बाहर स्थित मायाको लक्ष्य करके सृष्टि आदि क्रिया करता है। सृष्टिादि-क्रियाशून्य श्रीकृष्ण और परव्योमनाथ नारायणके स्वरूपमें कोई माया-सम्बन्धी क्रिया नहीं होती। महासङ्कर्षण कारणजलमें शयन करते हुए अपने सुदूर ईक्षणांशसे महत्तत्त्वकी सृष्टि करते हैं, ये आदि-अवतार हैं। कारणजलके बाहर मायाशक्तिकी अवस्थिति है; भगवान् उसके प्रति दृष्टिपात करते हैं। माया कारण-समुद्रको स्पर्श नहीं कर सकती। भगवान्का ईक्षण मायामें प्रवेश करके मायाको क्रियाशील बनाता है। मायाशक्तिकी दो रूपोंमें अवस्थिति है-जगत्के उपादानरूपमें 'प्रधान' और जगत्के निमित्तरूपमें 'माया'। वास्तवमें प्रकृति जड़रूपा है। जिस प्रकार आग लोहेके अन्दर प्रवेशकर जलानेकी शक्ति प्रदान करती है, उसी प्रकार भगवान्की ईक्षणशक्ति सञ्चारित होनेसे प्रकृति उस शक्तिबलसे जगत्-सृष्टिका 'गौण कारण' होती है। इसलिये श्रीकृष्ण ही जगत्के मूल कारण हैं, बकरेके गलेके स्तनकी भाँति प्रकृतिका केवल द्रव्यरूप कारणत्व है। माया-अंशसे अर्थात् गुणरूप अंशसे जिसे निमित्त कारण कहा जाता है, उसमें भी नारायण ही निमित्त कारण हैं। घड़ेके निर्माणमें
[ ५/५९-६६ चक्र, दण्डादि और कुम्हार, ये निमित्त कारण हैं। नारायण-कुम्हार-स्थानीय (मुख्य) निमित्त कारण हैं और माया-चक्र-दण्डादि-स्थानीय (गौण) निमित्त कारण है। इसलिये जिस प्रकार कुम्हारके बिना घड़ा नहीं बन सकता है, उसी प्रकार नारायणके बिना भी जगत्की सृष्टि नहीं होती। चक्र-दण्ड-स्थानीय 'गुणरूप' निमित्त-कारण 'मूल' निमित्त-कारण नारायणके सहायक रूपमें कार्य करता है॥५१-६४॥ कारणोदशायीका मायापर ईक्षण और जीवके प्राकट्यका विधान :- दूर हैते पुरुष करे मायाते अवधान। जीवरूप वीर्य ताते करेन आधान ॥ ६५ ॥ अङ्गाभाससे मायास्पर्शके कारण नारायण ही उपादान-कारण :- एक अङ्गाभासे करे मायाते मिलन। माया हैते जन्मे तब ब्रह्माण्डेर गण ॥ ६६ ॥ अनुवाद-दूरसे ही पुरुष (कारणोदकशायी विष्णु) मायापर दृष्टिपातकर जीवरूप वीर्यको उसमें स्थापित करते हैं। उन पुरुषका एक अङ्गाभाससे मायासे मिलन होता है और उसके फलस्वरूप मायासे असंख्य ब्रह्माण्डोंका जन्म होता है ॥ ६५-६६ ॥ अनुभाष्य-वैदिक विचारके अनुसार वस्तुसे शक्तिके योगसे बद्धजीवोंके निकट प्रकाशित जगत्की सृष्टि होती है। अवैदिक विचारसे यह दृश्यमान् जगत् प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ है। वस्तुशक्तिकी तीन प्रकारकी वृत्ति हैं-चित्, अचित् और चित्-अचित्मिश्र (तटस्था)। अश्रौत-पन्थामें कोई-कोई मानते हैं कि जड़ा-प्रकृतिसे जगत्की उत्पत्ति होती है; वैदिक-विचारमें वह स्वीकृत नहीं है। भगवत्-वस्तु चिन्मयी शक्तिसे अभिन्न है। अचिन्मयी शक्तिमें चित्-शक्ति सञ्चारित होनेपर तात्कालिक नश्वर चिद्भावाभास प्रकाशित होता है। भगवान्की चित्-अचित्-मिश्र तटस्था नामक जीवशक्ति नित्यकाल चिन्मयी शक्तिके अनुगत होनेपर भी अनादिकालसे अचित्-शक्ति-परिणत दृश्यमान् जगत्में भ्रमणके उपयोगी है। चिन्मात्र स्वतन्त्रताके अपव्यवहारसे वस्तुसे विच्छिन्न होकर जीवकी बद्धानुभूति होती है। जीव वास्तवमें अपने स्वरूपसे अवगत होनेपर ही जान पाता है कि भगवत्-सेवोन्मुखता ही उसके नित्य चरम मङ्गलका आधार है। जिस समय जीव सेवासे विमुख होता है, उसी समय वह 'शक्ति' होनेपर भी स्वयंको 'शक्तिमान्' मानकर भोगोंमें प्रवृत्त हो पड़ता है। वह अपनी इन्द्रियोंसे अचित् जगत्का प्रभु बननेके लिये अपनी चिन्मात्र-शक्तिके विपरीत अनुष्ठान (कार्य) कर बैठता है। श्रीकृष्णकी निजशक्तिके द्वारा ही उनकी विजातीय अचित्-शक्तिमें शक्ति अर्पित होती है। उदाहरणस्वरूप-अग्नि और अग्निकी दाहिका शक्ति निरग्निक लोहेमें सञ्चारित होनेपर लोहेका अग्नि रूपमें परिचय प्रकाशित करती है। वास्तवमें अचित्-शक्ति श्रीकृष्णकी चित्-शक्तिसे ही क्रिया लाभ करती है। अचित्-शक्तिके प्रभावसे बद्धजीव जड़जगत्को प्रकृतिसे उत्पन्न समझता है, किन्तु चिन्मात्रमें अवस्थित मुक्तजीव यह समझ पाता है कि शक्तिमान्की चित्-शक्ति ही अचित्-शक्तिमें आंशिक बल विधानकर उसे क्रियावती करती है। अचित्-शक्तिकी मूल कारण 'प्रकृति' अनेक प्रकारसे जीवके लिये अकल्याण, बन्धन और विमुखताका आह्वान करती है। बद्ध-अभिमानमें तर्कपन्थी २८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/५९-६७ ] जीवका बकरीके दूध प्रसव करनेवाले स्तन देखकर भी उसके गलेमें स्तनाकृति मांसपिण्डसे दुग्धके लिये प्रार्थना करना जिस प्रकार विफल मनोरथ होता है, उसी प्रकार अचित्-मूला प्रकृतिको अचित्-जगत्का कारण कहना मूर्खता ही है। भगवान्की अचित्-शक्ति 'माया'-'निमित्त' और 'उपादान'के रूपमें हरिविमुख जीवोंके निकट प्रकट होकर उनको सत्यवस्तु ग्रहण करनेसे विमुख कराती है। जीव, स्वरूप-ज्ञान उदय होनेपर ही अचित्-शक्तिकी 'आवरणी' और 'विक्षेपात्मिका'-इन दो प्रकारकी चेष्टाओंको समझ पाता है। निमित्त-कारणरूपमें कुम्हार और उपादान-कारण एवं उपायरूपमें मिट्टी तथा चक्र-दण्डादि जैसे घड़ा बनानेमें जैसे दो कारण हैं, वैसे दृश्यजगत् और भूतसमूहके भी नियामकरूपमें वस्तुविचारसे शक्तिमान् तत्त्व ही निर्दिष्ट हुए हैं। शक्तिभेद-विचारसे त्रिगुणमयी माया गुणोंके द्वारा उपादानांश भूतसमूहका परिचालन करती है। तटस्थाशक्ति जीव इस दृश्यजगत्में हरिविमुख होकर भोक्ता होनेका अभिमान ग्रहण करता है। दृश्यजगत्में वस्तुकी अचित् प्रतीति श्रीकृष्ण-विमुखताका ही फलमात्र है। अचित् प्रतीतिमें भोग-प्रवृत्ति अर्थात् इन्द्रिय-परायणता दिखलायी देती है, किन्तु सेवोन्मुखतासे भगवत्-प्रतीतिमें अपने सम्बन्धका दर्शन होता है। श्रीकृष्ण ही नित्य चित्-जगत्का कारण हैं, वे ही आवृत-सत्य अचित्-जगत्का कारण हैं और वे ही तटस्था नामक जीवका मूल-कारण तथा विधाता हैं। अचित्-प्रतीति भगवान्की बहिरङ्गा-शक्तिकी क्रिया और चित्-प्रतीति अन्तरङ्गा-शक्तिकी क्रिया हैं। चिन्मय-प्रतीतकी वाणीसे अर्थात् गुरु-परम्परासे प्राप्त शास्त्रज्ञानसे हम लोग जान पाते हैं कि सभी स्वतःकर्तृत्व-धर्म और सबका मूल कारण भगवत्तामें प्रतिष्ठित हैं। वही वस्तु बृहद् है, उनके खण्डांश ही 'जीव' कहलाते हैं। वही भगवत्-वस्तु विभक्त होकर भी खण्डित होनेका धर्म प्रकाश नहीं करती अर्थात् विभक्त होनेपर भी वह पूर्ण ही रहती है, परन्तु खण्ड-प्रतीति कभी भी अखण्ड-प्रतीतके साथ अभिन्न नहीं होती अर्थात् उनमें सदा भेद रहता है। व्याप्य-व्यापक विचारमें ब्रह्म और जीव सजातीय होनेपर भी ईशवस्तु-मायाके प्रभु, और वश्यवस्तु (जीव) - मायाके अधीन है। जब मायाधीन मायाधीशके अधीन हो जाता है, तब उसकी मायाधीनता और नहीं रहती ॥ ५९-६६॥ मध्यलीला २०/२७१-२७३ और भागवत ३/५/२६ एवं ३/२६/१८ श्लोक द्रष्टव्य हैं॥६५-६६॥ कारणोदशायीके ईक्षणका फल :- अगण्य, अनन्त यत अण्ड-सन्निवेश। ततरूपे पुरुष करे सबाते प्रवेश ॥ ६७ ॥ अनुवाद-इस प्रकार अगणित, अनन्त जितने भी ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि होती है, वे पुरुष उतने रूप धारण करके उन सभी ब्रह्माण्डोंमें प्रवेश कर जाते हैं॥६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-कारणाब्धिशायी पुरुष दूरसे ही मायाके प्रति दृष्टिपात करते हैं, वह दृष्टि चित्फलस्वरूप होकर दो प्रकारसे कार्य करती है। अर्थात् वह उनके किरणकलारूपसे अनन्त जीवोंको मायामें प्रवेश कराती है और स्वयं अङ्गाभाससे मायासे योग करके अगण्य अनन्त ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करती है। उन प्रत्येक ब्रह्माण्डमें वे पुरुष एक-एक पुरुषाकारमें प्रवेश कर जाते हैं। 'अङ्गाभास'का अर्थ अङ्गमिलनका आभासमात्र है, वास्तविक अङ्गमिलन नहीं॥६५-६७॥ पाँचवाँ अध्याय | २८७
[ ५/६८-७२ उनके निश्वाससे ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि और प्रश्वाससे लय :- पुरुष-नासाते यबे बाहिराय श्वास। निश्वास सहिते हय ब्रह्माण्ड-प्रकाश॥६८॥ पुनरपि श्वास यबे प्रवेशे अन्तरे। श्वास-सह ब्रह्माण्ड पैशे पुरुष-शरीरे॥६९॥ अनुवाद-आदि पुरुषावतार जब नासिकासे श्वासको बाहर छोड़ते हैं, तब उस श्वासके साथ सभी ब्रह्माण्ड प्रकट हो जाते हैं। पुनः जब वे श्वासको भीतर लेते हैं, तब उस श्वासके साथ सभी ब्रह्माण्ड उनके शरीरमें प्रवेश कर जाते हैं॥६८-६९॥ उनके लोमकूपमें अनन्त ब्रह्माण्ड-समूह :- गवाक्षेरे रन्ध्रे येन त्रसरेणु चले। पुरुषेर लोमकूपे ब्रह्माण्डरे जाले॥७०॥ अनुवाद-झरोखेके छिद्रोंमेंसे जैसे धूलिकण आते-जाते हैं, वैसे ही उन पुरुषके रोमकूपोंमेंसे ब्रह्माण्ड आते-जाते हैं॥७०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-तीन परमाणुओंका एक त्रसरेणु होता है॥७०॥ अनुभाष्य-मध्यलीला २०/२७७-२८० संख्या द्रष्टव्य है॥६९-७०॥ ब्रह्मसंहिता (५/४८)- यस्यैकनिश्वासित-कालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः। विष्णुर्महान् स इह यस्य कलाविशेषो गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि॥७१॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ब्रह्माण्डनाथ अर्थात् ब्रह्मा-विष्णु-महेश, जिनके रोमकूपोंसे जन्म ग्रहण करते हैं और उनके निःश्वास-काल तक अवस्थित रहते हैं, वे महाविष्णु जिनकी कला हैं, उन आदिपुरुष गोविन्दका मैं भजन करता हूँ॥७१॥ अनुभाष्य-अथ यस्य लोमविलजाः (लोमकूपात् जाताः) जगदण्डनाथाः (ब्रह्माण्डपतयः समष्टिविष्णवादयः) एकनिश्वासितकालं (निश्वासैकपरिमितकालम्) अवलम्ब्य (आश्रित्य) इह जीवन्ति (आविर्भूताः भवन्ति) सः महान् विष्णुः यस्य (गोविन्दस्य) कलाविशेषः, तमादिपुरुषं गोविन्दम् अहं भजामि। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७१॥ श्रीमद्भागवत (१०/१४/११)- क्वाहं तमो-महदहं-ख-चराग्निवार्भू- संवेष्टिताण्डघट-सप्तवितस्तिकायः क्वेदृग्विधाऽविगणिताण्डपराणुचर्या- वाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम्॥७२॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ २८८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/७२-७६ ] अमृतप्रवाह भाष्य-प्रकृति, महत्तत्त्व, अहङ्कार और पञ्चभूतोंसे बना अपने हाथसे मापकर सात हाथके जितना बड़ा कहाँ मैं, और समस्त ब्रह्माण्ड परमाणुरूपमें जिनके रोमकूपोंमें विचरण करते हैं, कहाँ वे आप ? आपकी महिमा कैसी है ? अर्थात् मेरा ब्रह्माण्ड-विग्रह आपकी महिमाकी तुलनामें कुछ भी नहीं है ॥ ७२ ॥ अनुभाष्य-ब्रह्माजीने गो-वत्स हरण करनेके बाद अपना अपराधके निवारणके लिये जो स्तव किये, उनमेंसे यह एक है, - तमोमहदहं-ख-चराग्नि-वार्भू-संवेष्टिताण्ड-घट-सप्तवितस्ति कायः (तमः अव्यक्तं, महत्तत्त्वम् अहङ्कारः, खम् आकाशम्, चरः वायुः, अग्निस्तेजः वार्ज्जलं, भूः पृथिवी, एतैः प्रधानादि-क्षित्यन्तैः संवेष्टितः यः अण्डघटः ब्रह्माण्डरूपः घटः देहः स एव तस्मिन् निजमानेन सप्तवितस्तिकायः यस्य सः) अहं क्व, ईदृग् विधाविगणिताण्डपराणुचर्यावाताधवरोमविवरस्य (ईदृग्विधानि यानि अगणितानि अण्डानि तानि एव परमाणवः तेषां चर्या परिभ्रमणं तदर्थं वाताधवनः गवाक्षाः इव रोमविवराणि यस्य तस्य) ते (तव) महित्वं च क्व ? श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ७२ ॥ मूलसङ्कर्षण, महासङ्कर्षण और तीन पुरुषावतारोंका सम्बन्ध :- अंशेर अंश येइ, 'कला' तार नाम। गोविन्देर प्रतिमूर्त्ति श्रीबलराम ॥ ७३ ॥ ताँर एक स्वरूप-श्रीमहासङ्कर्षण। ताँर अंश 'पुरुष' हय कलाते गणन ॥ ७४ ॥ याँहाके त' कला कहि, तिँहो महाविष्णु। महापुरुषावतारी तेँहो सर्वजिष्णु ॥ ७५ ॥ अनुवाद-अंशके अंशको कला कहते हैं। श्रीबलराम श्रीकृष्णकी प्रतिमूर्ति अर्थात् उनसे अभिन्न हैं। उनका एक स्वरूप महासङ्कर्षण है। महासङ्कर्षणके अंश 'पुरुष' की गणना कलामें होती है। जिनको वह कला कहा है, वे कारणाब्धिशायी महाविष्णु हैं और वे अन्य पुरुषावतारोंके अवतारी हैं तथा सर्वव्यापी हैं ॥ ७३-७५ ॥ अनुभाष्य-'प्रतिमूर्त्ति'-द्वितीय देह (आदिलीला ५/४-५; मध्यलीला २०/१७४ द्रष्टव्य है)। 'महाविष्णु', 'महापुरुषावतारी' शब्दसे कारणाब्धिशायीको समझना चाहिये ॥ ७३-७५ ॥ गर्भोद-क्षीरोद-शायी दोँ हे 'पुरुष' नाम। सेइ दुइ, याँर अंश, - विष्णु, विश्वधाम ॥ ७६ ॥ अनुवाद-महाविष्णु समस्त ब्रह्माण्डोंके आश्रय हैं, दो पुरुषावतार गर्भोदशायी और क्षीरोदशायी उनके अंश हैं ॥ ७६ ॥ अमृतप्रवाहभाष्य-श्रीकृष्णकी विलासमूर्त्ति श्रीबलराम ही मूलसङ्कर्षण हैं। उनके स्वरूपांश परव्योममें सङ्कर्षण हैं। उनके अंश कारणाब्धिशायी महाविष्णु हैं, वे श्रीबलरामके अंशके अंश हैं, इसलिये उन्हें कला कहा जाता है। गर्भोदशायी और क्षीरोदशायी, ये दोनों पुरुष महाविष्णुके अंश हैं॥ ७३-७६ ॥ अनुभाष्य-लघुभागवतामृतमें अवतार वर्णन प्रसङ्ग (संख्या ४) में उद्धृत विष्णुपुराणके (६/८/५९) श्लोकका अनुवाद- "षड्विकारहीन पुरुषोत्तम श्रीकृष्णके जो अंश गुणोंके संसर्गको पाँचवाँ अध्याय | २८९
[ ५/७६-७९ स्वीकार करते हैं अर्थात् प्रकृति और महत्तत्त्वादि प्राकृत तत्त्वोंके ईक्षणकर्त्ता हैं, जो तत्त्वतः एक स्वरूपका त्याग ना करके अनेक स्वांश विभाग करके सभी प्राणियोंके विस्तारकर्त्ता हैं और जो शुद्ध अर्थात् मायासङ्ग-रहित होकर भी अवतीर्ण होकर अशुद्धकी अर्थात् मायासङ्गीकी भाँति प्रकाशित होते हैं तथा जो नित्य चिन्मय हैं, उन्हीं अव्यय पुरुषके प्रति (मैं) सदा प्रणत होता हूँ।” इस श्लोककी श्रीरूप गोस्वामीकृत कारिका— “परमेशांशरूपो यः प्रधानगुणभागिव। तदीक्षादिकृतिर्नानावतारः पुरुषः स्मृतः ॥ ” अर्थात् “परमेश्वरके जो अंश प्रधानके गुणोंसे संलग्न व्यक्तिकी भाँति प्रकृति और महत्तत्त्व आदिके ईक्षणकर्त्ता हैं, जो नाना प्रकारके अवतारोंके प्रकटकर्त्ता हैं, शास्त्रोंमें उनको ही 'पुरुष' नामसे कहा गया है॥”७६॥ लघुभागवतामृतमें पूर्वखण्डमें (३३) सात्वततन्त्र-वचन :— विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणि पुरुषाख्यान्यथो विदुः। एकन्तु महतः स्रष्टृ तृतीयं सर्वभूतस्थं तानि ज्ञात्वा विमुच्येत ॥ ७७ ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ७७ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—नित्यधाममें विष्णुके तीन रूप हैं। प्रथम—महत्तत्त्वके स्रष्टा कारणाब्धिशायी महाविष्णु; द्वितीय—गर्भोदशायी और समष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष; तृतीय—क्षीरोदशायी व्यष्टिब्रह्माण्डगत पुरुष, वे प्रत्येक जीवके अन्तर्यामी ईश्वर और परमात्मा हैं। इन तीनोंको तत्त्वसे जान लेनेपर जीव जड़बुद्धिसे मुक्त हो जाता है॥ ७७॥ अनुभाष्य—विष्णोस्तु पुरुषाख्याणि त्रीणि रूपाणि विदुः। अथ तेषु एकम् (आद्यं) तु महतः (महत्तत्त्वस्य) स्रष्टृ रूपाणि ज्ञात्वा विमुच्यते (मायाबन्धनात् विज्ञो मुक्तो भवति)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७७॥ मत्स्यादि समस्त अवतारोंके अंशी कारणोदशायी :— यद्यपि कहिये ताँरे कृष्णेर 'कला' करि। मत्स्य-कूर्माद्यवतारेर तिँहो अवतारी ॥ ७८ ॥ अनुवाद—यद्यपि कारणोदशायी विष्णुको श्रीकृष्णकी 'कला' कहा जाता है, तो भी मत्स्य-कूर्मादि अवतारोंके ये अवतारी हैं॥७८॥ श्रीमद्भागवत (१/३/२८)— एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्। इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥ ७९ ॥ अनुवाद—राम-नृसिंहादि, पुरुषावतारके अंश या कला (अंशके अंश) हैं, किन्तु श्रीकृष्ण स्वयं भगवान् हैं। दैत्योंके द्वारा पीड़ित लोगोंकी प्रत्येक युगमें ये (अवतार) रक्षा करते हैं॥७९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आदिलीला २/६७ द्रष्टव्य है॥७९॥ २९० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
५/८०-८१ ] तीन पुरुषावतारोंके कार्य :- सेइ पुरुष सृष्टि-स्थिति-प्रलयेर कर्त्ता। नाना अवतार करे, जगतेर भर्त्ता॥८०॥ अनुवाद—वे पुरुष सृष्टि, पालन और प्रलयके कर्त्ता हैं, वे नाना अवतार ग्रहण करते हैं और वे जगत्का पालन करनेवाले हैं॥८०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जगत्पालकरूपमें वे पुरुषावतार क्षीरोदशायी हैं॥८०॥ अनुभाष्य—(भाः ३/१/५)— “एतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम्। यस्यांशांशेन सृज्यन्ते देव-तिर्यङ्-नरादयः।” अर्थात् “वे कारणाब्धिशायीरूपमें सृष्टि-स्थिति-प्रलयके कारण हैं, गर्भोदशायीरूपमें विभिन्न अवतारोंका सूतिकाधाम (उद्गमस्थल) और क्षीरोदशायीरूपमें क्षौणी (जगत्) के भर्त्ता हैं॥८०॥ अवतारगण अंशमात्र :- सृष्ट्यादि-निमित্তে येइ अंशेर अवधान। सेइ त' अंशেরে कहि 'अवतार' नाम॥८१॥ अनुवाद—भगवान् श्रीकृष्णके जो अंश जगत्की सृष्टि-पालन-संहारके लिये प्रकट होते हैं, उनको 'अवतार' कहा जाता है॥८१॥ अनुभाष्य—लघुभागवतामृतमें अवतार-लक्षण वर्णन प्रसङ्गमें प्रथम संख्यामें— “पूर्वोक्ता विश्वकार्यार्थमपूर्वा इव चेत् स्वयम्। द्वारान्तरेण वाविःस्युरवतारास्तदा स्मृताः॥ तच्च द्वारं तदेकात्मरूपस्तद्भक्त एव च। शेषशायादिको यद्वद् वसुदेवादिकोऽपि च॥” अर्थात् “पहले वर्णन किये गये स्वयंरूप श्रीकृष्ण विश्वकार्यके लिये स्वयं अथवा द्वारोंके द्वारा आविर्भूत होनेपर उनको 'अवतार' कहा जाता है। वे 'द्वार' दो प्रकारके हैं—तदेकात्मरूप (जैसे शेषशायी) और भक्त (जैसे वसुदेवादि)।” श्रीबलदेव विद्याभूषणकृत टीकामें— “स्वयम् अद्वारकत्या, द्वारान्तरेण वा जगति आविः स्युः, तदा अवताराः स्मृताः। अप्रपञ्चात् प्रपञ्चेऽवतरणं खल्ववतारः। सद्बारकस्तु—यथा शेषशायिनः कारणार्णवशयात् गर्भोदकशयः, यथा वसुदेवात् कृष्णः, दशरथात् रामः। कार्यं—प्रकृतिक्षोभ-महदाद्युत्पादनं, दुष्टविमर्द्देन देवादीनां सुखवर्धनं, समुत्कण्ठितानां साधकानां स्वसाक्षात्कारेण प्रेमानन्दवितरणं, विशुद्धभक्तिप्रचारणञ्च, तदर्थमित्यर्थः।” अर्थात् “भगवत्स्वरूप जब स्वयं अर्थात् अद्वारक-रूपमें (अर्थात् किसीका आश्रय स्वीकार ना करके स्वयं ही) अथवा किसीके द्वारा जगत्में आविर्भूत होते हैं, तब उनको अवतार कहा जाता है। वैकुण्ठधामसे प्रपञ्चमें अवतीर्ण होनेवाले ही अवतार कहलाते हैं। श्रीमत्स्य, श्रीहंस आदि अद्वारक-रूपमें आविर्भूत हुए। सद्बारक-अवतार; जैसे—शेषशायी श्रीकारणोदशायीसे श्रीगर्भोदकशायी, और जैसे—श्रीवसुदेवसे श्रीकृष्णचन्द्र, श्रीदशरथसे श्रीरामचन्द्र आदि। अवतारगण विभिन्न कार्योंके उद्देश्यसे अवतीर्ण होते हैं, जैसे—प्रकृतिको क्षुभितकर महत्तत्त्वादिका उत्पादन पाँचवाँ अध्याय | २९१
[ ५/८१-८३ करना, दुष्टोंके दमनके द्वारा देवताओंके सुखका वर्धन करना, समुत्कण्ठित साधकोंको अपना दर्शन देकर प्रेमानन्द वितरण करना और विशुद्धभक्तिका प्रचार करना।” देश-काल-पात्र भेदसे खण्डित मायाराज्यमें खण्डक्रियाके निमित्त या उपादानांशमें भगवत्स्वरूपकी जो क्रिया दिखायी देती है, उस कार्यकी कारणस्वरूपा महाविष्णुरूप भगवत्ता ही श्रीकृष्णका अंश है। इस अंशको ही ‘अवतार’ कहा जाता है। साधारणतः स्थूलदृष्टिसे ‘पङ्गु-अन्ध’ न्यायके द्वारा जड़ा-प्रकृतिको ‘उपादान’ और भोक्ता तथा त्रिगुणमय पुरुष जीवको ‘निमित्त’ कहा जाता है। किन्तु प्रकृति जगत्का ‘उपादान’ या ‘निमित्त’ नहीं है,—सूक्ष्म रूपसे देखनेपर भागवत-लोगोंने यह उपलब्धि की है। जिनकी ईक्षणशक्तिके प्रभावसे प्रकृति जगत्का ‘उपादान’ और माया जगत्की ‘निमित्त-कर्त्ती’ नामसे प्रसिद्ध हैं, ये दोनों शक्तियाँ ही उन्हीं भगवान्के द्वारा प्रदान की गयी हैं। भगवान्के जो प्रकाशस्वरूप मायामें विश्वसृष्टिके उद्देश्यसे या विश्वके हितके लिये मायाको शक्तिप्रदान-लीलाका प्रदर्शन करते हैं, उन सब प्रकाशमूर्त्तियोंको ही ‘अंश’ या ‘अवतार’ कहा जाता है। (ब्रह्मसंहितामें-एक दीपसे अन्य दीपोंको प्रज्ज्वलित करनेपर सभी दीप एक समान होते हैं)—इस उदाहरणसे वस्तुतत्त्वसे दीपकके उपमेय सभी अवतार विष्णु होनेपर भी उनका मायाके ऊपर कर्तृत्व रहनेके कारण उनको मायिक भाषामें ‘अंश’ या ‘अवतार’ कहा मात्र जाता है। मध्यलीला २०/२६३-२६४ द्रष्टव्य है॥८१॥ आद्यावतार, महापुरुष, भगवान्। सर्व-अवतार-बीज, सर्वाश्रय-धाम॥८२॥ अनुवाद—कारणोदशायी विष्णु भगवान् श्रीकृष्णके प्रथम अर्थात् आदि अवतार हैं, वे सब अवतारोंके बीजरूपी गर्भोदशायी विष्णुके भी आश्रय (मूल) हैं, इसलिये वे सभी आश्रयोंके भी आश्रय हैं॥८२॥ अनुभाष्य—सर्वावतार-बीजरूपी गर्भोदशायीके प्रसङ्गके लिये भागवत ३/१/५ द्रष्टव्य है॥८२॥ कारणोदशायी महाविष्णु :- श्रीमद्भागवत (२/६/४२)— आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य कालः स्वभावः सदसन्मनश्च। द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि विराट् स्वराट् स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः॥८३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—कारणाब्धिशायी पुरुष ही भगवान्के आदि अवतार हैं। काल, स्वभाव, कार्य-कारणरूप प्रकृति, मनादि महत्तत्त्व, महाभूतादि अहङ्कार, सत्त्वादि गुण, इन्द्रियस समूह, विराट्, स्वराट्, स्थावर और जङ्गम प्राणी, सभी उनके विभूतिरूप हैं। अन्य संस्करणमें ये श्लोक भी देखे जाते हैं- “अहं भवो यज्ञ इमे प्रजेशा दक्षादयो ये भवदादयश्च। स्वर्लोकपालाः खगलोकपाला नृलोकपालास्तललोकपालाः॥ २९२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
गन्धर्व-विद्याधर-चारणेशा ये यक्षरक्षोरग-नागनाथाः। ये वा ऋषीणामृषभाः पितॄणां दैत्येन्द्रसिद्धेश्वरदानवेन्द्राः। अन्ये च ये प्रेतपिशाचभूत-कुष्माण्ड-यादो-मृगपक्ष्यधीशाः॥ यत् किञ्च लोके भगवन्महस्वदोजः सहस्वद्वलवत् क्षमावत्। श्रीह्रीविभूत्यात्मवदद्भुतार्णं तत्त्वं परं रूपवदस्वरूपम्॥” (भाः २/६/४३-४५) अर्थात् “मैं (ब्रह्मा), श्रीरुद्र, श्रीविष्णु, दक्षादि प्रजापति, तुम (नारद) और तुम्हारे जैसे सनकादि, स्वर्गलोकके अधिपति इन्द्रादि, पक्षियोंके राजा गरुड़ादि, मनुष्यलोकके समस्त राजा, पातालादि नीचेके लोकोंके राजा, गन्धर्व, विद्याधर, चारणोंके अधिनायक, यक्ष, राक्षस, सर्प, नागोंके स्वामी, ऋषिगण, पितरोंमें श्रेष्ठगण, दैत्येन्द्र, सिद्धेश्वर और समस्त दानवराज, अन्यान्य समस्त प्रेत-पिशाच, भूत, कुष्माण्ड, जल-जन्तु, मृग, पक्षियोंके अधिपति तथा लोकमें जो कुछ भी ऐश्वर्ययुक्त, तेजयुक्त, इन्द्रियशक्तियुक्त, मनःशक्तियुक्त, बलवान, शोभासम्पन्न, लज्जायुक्त, विभूतिसम्पन्न, बुद्धियुक्त, आश्चर्यवर्ण (अर्थात् अद्भुत वर्णोंसे युक्त), रूपवान (हमारे समान साकार) अथवा अरूप (निराकार) है, वे सभी कुछ परमपुरुषकी विभूतियाँ हैं, किन्तु उनका स्वरूप नहीं॥”८३॥ अनुभाष्य—ब्रह्माजी नारदको भगवान् कारणार्णवशायीकी विभूतियोंका वर्णन कर रहे हैं— परस्य भूम्नः (भगवतः) पुरुषः (कारणार्णवशायी) आद्यः अवतारः। कालः (गुण-क्षोभकः), स्वभावः (तत्संस्कारः), सदसत् (कार्यकारणात्मिका प्रकृतिः) मनः (महत्तत्त्वं), द्रव्यं (भूतसूक्ष्माणि पञ्चमहाभूतानि), विकारः (अहङ्कारः), गुणः (सत्त्वादिः), इन्द्रियाणि (एकादश), विराट् (समष्टिशरीरं), स्वराट् (वैराजं), स्थास्नु (स्थावरं), चरिष्णु (जङ्गमं व्यष्टिशरीरं) च [सर्वं तद्विभूतिरूपम्]। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८३॥ महत्सृष्टा आदिपुरुषावतार :— श्रीमद्भागवत (१/३/१)— जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः। सम्भूतं षोडशकलमादौ लोकसिसृक्षया॥८४॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८४॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भगवान्ने लोकसृष्टि करनेकी इच्छासे महत्तत्वादिके साथ और सोलह कलायुक्त ‘पुरुष’ कहलानेवाले रूपको धारण किया॥८४॥ अनुभाष्य—शौनकादि ऋषियोंके पाँचवें प्रश्नके उत्तरमें सूत गोस्वामी भगवान्की अवतार-कथा वर्णन कर रहे हैं,— आदौ (सर्गारम्भे) भगवान् (महासङ्कर्षणः) लोकसिसृक्षया (लोकानां भुवनानां स्रष्टुमिच्छया) महदादिभिः (महदहङ्कारपञ्चमहाभूतैकादशेन्द्रियपञ्चतन्मात्रैः) सम्भूतं (मिलितं) षोडशकलं (तत्स्सृष्ट्युपयोगिपूर्णशक्तिमत्) पौरुषं रूपं जगृहे (प्रकटयामास)। श्लोक-भावानुवाद—“सृष्टिके आरम्भमें भगवान् महासङ्कर्षणने लोकसृष्टि करनेकी इच्छासे महत्तत्त्व, अहङ्कार, पञ्चमहाभूत, ग्यारह इन्द्रियों और पञ्चतन्मात्राओंके साथ सोलह कलायुक्त (सृष्टिके उपयोगी पूर्ण शक्तिमान्) ‘पुरुष’ कहलानेवाले रूपको प्रकट किया।”
[ ५/८४-८६ षोड़शकलं—लघुभागवतामृतमें पुरुष वर्णन प्रसङ्ग (संख्या ६८) में— “श्रीर्भूःकीर्त्तिरिला लीला कान्तिर्विद्येति सप्तकम्। विमलाद्या नवेत्येता मुख्याः षोड़श शक्तयः ॥” १) श्री, २) भू, ३) लीला, ४) कान्ति, ५) कीर्त्ति, ६) तुष्टि, ७) गीः, ८) पुष्टि, ९) सत्या, १०) ज्ञानाज्ञाना, ११) जया उत्कर्षिणी, १२) विमला, १३) योगमाया, १४) प्रह्वी, १५) ईशाना और १६) अनुग्रहा—वैकुण्ठमें ये सोलह शक्तियाँ विद्यमान हैं। इस श्लोककी श्रीबलदेव विद्याभूषणकृत टीकामें— “विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया योगा तथैव च। प्रह्वी सत्या तथेशानानुग्रहेति नव स्मृताः॥” अर्थात् “विमला, उत्कर्षिणी, ज्ञाना, क्रिया, योगा, प्रह्वी, सत्या, ईशाना और अनुग्रहा—ये नौ शक्तियाँ शास्त्रोंमें स्मरण की गयी हैं।” भगवत्सन्दर्भमें (११७ संख्या)— “श्रिया पुष्ट्या गिरा कान्त्या कीर्त्त्या तुष्ट्येळयोर्जया। विद्ययाविद्यया शक्त्या मायाया च निषेवितम्॥ सन्धिनीसम्वित्ह्लादिनीभक्त्याधारशक्तिमूर्त्तिविमलाजया योगा प्रह्वीशानानुग्रहादयश्च ज्ञेयाः। ततः श्रियेत्यादौ शक्तिवृत्तिरूपया मायावृत्तिरूपया चेति सर्वत्र ज्ञेयम्। तत्र पूर्वस्याः भेदः श्रीर्भागवतीसम्पत्। उत्तरस्याः भेदः श्रीर्जागती-सम्पत्। ××तत्र इला भूस्तदुपलक्षणत्वेन लीला अपि। अत्र सन्धिन्त्येव सत्या, जयैवोत्कर्षिणी, योगैव योगमाया, सम्विदेव ज्ञानाज्ञानशक्तिः शुद्धसत्त्वञ्चेति ज्ञेयम्; प्रह्वी विचित्रानन्तसामर्थ्यहेतुः, ईशाना सर्वाधिकारिता-शक्तिहेतुरिति भेदः।” अर्थात् श्री, पुष्टि, गीः, कान्ति, कीर्त्ति, तुष्टि, इला, ऊर्जा, विद्या, अविद्या, शक्ति और मायाके द्वारा भगवान् सेवित होते हैं। (‘च’ शब्दसे) सन्धिनी, सम्वित्, ह्लादिनी, भक्त्याधारशक्ति, मूर्त्ति, विमला, जया, योगा, प्रह्वी, ईशाना, अनुग्रह आदिको समझना होगा। उक्त ‘श्री’ आदिसे (अन्तरङ्गा) शक्तिवृत्तिरूपा और (बहिरङ्गा) मायावृत्तिरूपा नामक दो प्रकारकी वृत्तियोंको सर्वत्र जानना होगा। इनमेंसे जो प्रथम अर्थात् शक्तिवृत्तिका भेद है, वह ‘श्री’—भागवती सम्पद् है। और जो दूसरी अर्थात् मायावृत्तिका भेद है, वह ‘श्री’—जागती सम्पद् है। उनमें इला भूशक्ति है और उपलक्षणमें लीलाशक्ति भी है। यहाँपर सन्धिनी ही सत्या, जया ही उत्कर्षिणी, योग ही योगमाया और सम्वित् ही ज्ञानाज्ञानशक्ति एवं शुद्धसत्त्व है। प्रह्वी विचित्र और अनन्त सामर्थ्यका कारण है। ईशाना सर्वाधिकारिता शक्तिका कारण है। श्रीमद्भागवतके गौड़ीयभाष्यके अन्तर्गत श्रीमध्वकृत भागवत तात्पर्य और तथ्य द्रष्टव्य हैं॥८४॥ सबके आश्रय और अन्तर्यामी :— यद्यपि सर्वाश्रय तिँहो, ताँहाते संसार। अन्तरात्मा-रूपे तिँहो जगत्-आधार॥८५॥ ईक्षणादिके द्वारा मायासे सम्बन्ध होनेपर भी वस्तुतः विष्णु मायातीत :— प्रकृति सहिते ताँर उभय सम्बन्ध। तथापि प्रकृति-सह नाहि स्पर्शगन्ध॥८६॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥८५-८६॥ २९४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
अमृतप्रवाह भाष्य-यद्यपि सबका आश्रय होनेके कारण संसार उनमें अवस्थित है, तथापि अन्त़रात्माके रूपमें वे जगत्का आधार हैं। प्रकृतिके साथ उनका यह दो प्रकारका सम्बन्ध रहनेपर भी वे प्रकृतिस्पर्श-दोष स्वीकार नहीं करते॥८६॥ अनुभाष्य-मध्यलीला २०/२८२ द्रष्टव्य है। लघुभागवतामृतमें विष्णुकी निर्गुणताके प्रसङ्गमें श्रीरूप गोस्वामीकी कारिका- “योगो नियामकतया गुणैः सम्बन्ध उच्यते। अतः स तैर्न युज्यते तत्र स्वांश परस्य यः॥” अर्थात् नियमकरूपमें गुणके साथ विष्णुका जो सम्बन्ध है, उसको 'योग' कहा जाता है। इसलिये वे पुरुष गुणके द्वारा कभी भी बद्ध नहीं होते। विशेषतः परम-पुरुषसे तत्त्वतः अभिन्न स्वांश-विष्णुगण, कोई भी, कभी भी, किसी प्रकारसे भी गुणके साथ युक्त नहीं होते। श्रीबलदेव विद्याभूषणकी टीका- “ननु परस्य पुंसः कथं गुणसम्बन्धः, 'माया परैत्यभिमुखे च विलज्जमाना' (भाः २/७/४७) इत्यादि वाक्य विरोधादिति चेत्? तत्राह-योग इति। गुणा नियमाः, त्रिधाविर्भूतः पुरुषस्तु नियामक इति सम्बन्धः, स इह योग उच्यते, न तु तैर्बन्ध इत्यर्थः। स तु विष्णुर्नैव युज्यते, द्रुमिलयोगीशवाक्ये (भाः ११/४/५) तत्र गुणसम्बन्धानुल्लेखात्।” यदि कहें कि महाविष्णुका तो गुणके साथ सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता है? क्योंकि ऐसा होनेपर 'माया लज्जित होकर भगवान्से दूसरी ओर मुख करके अवस्थान करती है' इस वाक्यके साथ विरोध होता है। इसके उत्तरमें कहते हैं, - 'गुण' का अर्थ नियम है; विष्णु, ब्रह्मा और शिव-इन तीन रूपोंमें आविर्भूत 'पुरुष' का इस प्रकृतिसे उसके नियामक रूपमें सम्बन्ध है। जगत्में उस सम्बन्धको ही 'योग' नामसे कहा जाता है और उसे कभी भी तीन गुणोंके द्वारा 'बन्धन' नहीं कहा जाता। वे विष्णु कभी भी मायाके गुणोंके साथ युक्त नहीं होते, क्योंकि नवयोगेन्द्रोंमेंसे अन्यतम द्रुमिलके वाक्यमें विष्णुके साथ तीन गुणोंके सम्बन्धका कोई उल्लेख नहीं दिखलायी देता है। जगत्की सृष्टिमें उपादान और निमित्त, इन दो प्रकारके कारणोंमें भगवान्का ईक्षण-कर्त्तृत्व सम्बन्ध रहनेपर भी वे मायाके द्वारा किसी भी प्रकारसे प्रभावित नहीं होते हैं। भगवान्की इच्छाशक्तिका परिणाम यह विकारविशिष्ट जगत् है, किन्तु उनमें किसी जड़ विकारकी सम्भावना नहीं है। आदिलीला २/५२, ५४ द्रष्टव्य हैं॥८५-८६॥ श्रीमद्भागवत (१/११/३८)- एतदीशनमीशस्य प्रकृतिस्थोऽपि तद्गुणैः। न युज्यते सदात्मस्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया॥८७॥ अनुवाद-प्रकृतिमें रहकर उसके गुणोंके द्वारा वशीभूत नहीं होना ही भगवान्की भगवत्ता है। मायाबद्ध जीवोंकी बुद्धि जब भगवान्का आश्रय लेती है, तब मायाके समीप रहकर भी वे मायाके गुणोंसे संयुक्त नहीं होते हैं॥८७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-आदिलीला २/५५ द्रष्टव्य है॥८७॥ पाँचवाँ अध्याय | २९५
[ ५/८८-९० अचिन्त्यशक्तिमान् ईश्वरके साथ जगत्का भेदाभेद-सम्बन्ध :- एइ मत गीतातेह पुनः पुनः कय। सर्व्वदा ईश्वर-तत्त्व अचिन्त्यशक्ति हय॥८८॥ अनुवाद—इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीतामें भी बारम्बार कहा गया कि ईश्वर-तत्त्व सदा अचिन्त्य शक्तिसम्पन्न हैं॥८८॥ आमि त' जगते बसि, जगत् आमाते। ना आमि जगते बसि, ना आमा जगते॥८९॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है।॥८९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—(श्रीकृष्णने कहा)—मैं जगत्में अवस्थित हूँ और जगत् भी मुझमें अवस्थित है। तो भी मैं जगत्में नहीं हूँ और जगत् भी मुझमें नहीं है—इसीको ‘अचिन्त्य अर्थ (ऐश्वर्य)’ कहा जाता है॥८९॥ अनुभाष्य—भगवान्के अस्तित्वके बिना दृश्य जगत्में किसीके भी अस्तित्वकी सम्भावना नहीं है। भगवान्में जगत् अवस्थित है, यह कहकर अचित्भोगमय दर्शनकी बाह्य प्रतीतिका भगवान् नहीं मानना चाहिये, भोगमय जगत्को भगवत्ता नहीं जानना चाहिये। भगवद्विमुखतारूप भोग या माया भगवान्में अवस्थित नहीं है, भगवद्विमुखता किसी प्रकारसे भी भगवत्-वस्तुमें नहीं रह सकती। जब अधोक्षज भगवान् जगत् या प्रपञ्चमें अवतीर्ण होते हैं, तब भी वे जगत्के अंश या नश्वर वस्तु नहीं होते और हो भी नहीं सकते। प्रकट और अप्रकट, दोनों लीलाओंमें ही वे मायासे अतीत और मायाके अधीश हैं अर्थात् निर्गुण-वैकुण्ठता उनमें नित्य वर्तमान होती है। विभिन्न लीलाभेदसे वे जगत्में अवतीर्ण होते हैं और जगत्की सभी वस्तु-सत्ताके वे मूल अधिष्ठातृदेव हैं। जगत् भी कभी उनसे अलग अस्तित्वयुक्त होकर किसी दूसरी वस्तुके रूपमें अवस्थान नहीं कर सकता। विष्णु स्वयं कभी भी प्राकृत जगत् या मायाके साथ संस्पर्शयुक्त नहीं होते। उनका अपना स्वरूप और तद्रूपवैभव भी किसी प्रकारसे भोगमय, सीमित जगत् या उनसे विमुख प्रकृतिके अन्तर्गत नहीं है—यही स्वेच्छामय, अचिन्त्य-ऐश्वर्यमय भगवान्का स्वतःकर्त्तृत्व और भगवत्ता है। श्रीमद्भागवत चतुःश्लोकीके अन्तर्गत २/९/३४ “यथा महान्ति” श्लोककी विभिन्न टीकाओंसे समन्वित ‘गौड़ीयभाष्य’ और (भागवत ११/१५/३६) श्लोक द्रष्टव्य हैं॥८९॥ अचिन्त्य ऐश्वर्य एइ जानिह आमार। एइ त' गीतार अर्थ कैल परचार॥९०॥ अनुवाद—हे अर्जुन! इसे मेरा अचिन्त्य ऐश्वर्य जानो—श्रीकृष्णने इसी अर्थका गीतामें प्रचार किया है॥९०॥ अनुभाष्य—गीता (९/४-५) में— “मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्त्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥ २९६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत