श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५/५९-६६ चक्र, दण्डादि और कुम्हार, ये निमित्त कारण हैं। नारायण-कुम्हार-स्थानीय (मुख्य) निमित्त कारण हैं और माया-चक्र-दण्डादि-स्थानीय (गौण) निमित्त कारण है। इसलिये जिस प्रकार कुम्हारके बिना घड़ा नहीं बन सकता है, उसी प्रकार नारायणके बिना भी जगत्की सृष्टि नहीं होती। चक्र-दण्ड-स्थानीय 'गुणरूप' निमित्त-कारण 'मूल' निमित्त-कारण नारायणके सहायक रूपमें कार्य करता है॥५१-६४॥ कारणोदशायीका मायापर ईक्षण और जीवके प्राकट्यका विधान :- दूर हैते पुरुष करे मायाते अवधान। जीवरूप वीर्य ताते करेन आधान ॥ ६५ ॥ अङ्गाभाससे मायास्पर्शके कारण नारायण ही उपादान-कारण :- एक अङ्गाभासे करे मायाते मिलन। माया हैते जन्मे तब ब्रह्माण्डेर गण ॥ ६६ ॥ अनुवाद-दूरसे ही पुरुष (कारणोदकशायी विष्णु) मायापर दृष्टिपातकर जीवरूप वीर्यको उसमें स्थापित करते हैं। उन पुरुषका एक अङ्गाभाससे मायासे मिलन होता है और उसके फलस्वरूप मायासे असंख्य ब्रह्माण्डोंका जन्म होता है ॥ ६५-६६ ॥ अनुभाष्य-वैदिक विचारके अनुसार वस्तुसे शक्तिके योगसे बद्धजीवोंके निकट प्रकाशित जगत्की सृष्टि होती है। अवैदिक विचारसे यह दृश्यमान् जगत् प्रकृतिसे उत्पन्न हुआ है। वस्तुशक्तिकी तीन प्रकारकी वृत्ति हैं-चित्, अचित् और चित्-अचित्मिश्र (तटस्था)। अश्रौत-पन्थामें कोई-कोई मानते हैं कि जड़ा-प्रकृतिसे जगत्की उत्पत्ति होती है; वैदिक-विचारमें वह स्वीकृत नहीं है। भगवत्-वस्तु चिन्मयी शक्तिसे अभिन्न है। अचिन्मयी शक्तिमें चित्-शक्ति सञ्चारित होनेपर तात्कालिक नश्वर चिद्भावाभास प्रकाशित होता है। भगवान्की चित्-अचित्-मिश्र तटस्था नामक जीवशक्ति नित्यकाल चिन्मयी शक्तिके अनुगत होनेपर भी अनादिकालसे अचित्-शक्ति-परिणत दृश्यमान् जगत्में भ्रमणके उपयोगी है। चिन्मात्र स्वतन्त्रताके अपव्यवहारसे वस्तुसे विच्छिन्न होकर जीवकी बद्धानुभूति होती है। जीव वास्तवमें अपने स्वरूपसे अवगत होनेपर ही जान पाता है कि भगवत्-सेवोन्मुखता ही उसके नित्य चरम मङ्गलका आधार है। जिस समय जीव सेवासे विमुख होता है, उसी समय वह 'शक्ति' होनेपर भी स्वयंको 'शक्तिमान्' मानकर भोगोंमें प्रवृत्त हो पड़ता है। वह अपनी इन्द्रियोंसे अचित् जगत्का प्रभु बननेके लिये अपनी चिन्मात्र-शक्तिके विपरीत अनुष्ठान (कार्य) कर बैठता है। श्रीकृष्णकी निजशक्तिके द्वारा ही उनकी विजातीय अचित्-शक्तिमें शक्ति अर्पित होती है। उदाहरणस्वरूप-अग्नि और अग्निकी दाहिका शक्ति निरग्निक लोहेमें सञ्चारित होनेपर लोहेका अग्नि रूपमें परिचय प्रकाशित करती है। वास्तवमें अचित्-शक्ति श्रीकृष्णकी चित्-शक्तिसे ही क्रिया लाभ करती है। अचित्-शक्तिके प्रभावसे बद्धजीव जड़जगत्को प्रकृतिसे उत्पन्न समझता है, किन्तु चिन्मात्रमें अवस्थित मुक्तजीव यह समझ पाता है कि शक्तिमान्की चित्-शक्ति ही अचित्-शक्तिमें आंशिक बल विधानकर उसे क्रियावती करती है। अचित्-शक्तिकी मूल कारण 'प्रकृति' अनेक प्रकारसे जीवके लिये अकल्याण, बन्धन और विमुखताका आह्वान करती है। बद्ध-अभिमानमें तर्कपन्थी २८६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत